भाषा August 17, 2006
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.trackback
हिन्दी मे यह मेरी पहली प्रस्तुत है अत:—
“सर्वप्रथम देवोँ का अर्चन, अब कर लेँ प्रकृति का पूजन,
गुरुजनोँ को मेरा वन्दन, माता पिता को भी है नमन”
चलो करेँ मिलकर अब चिन्तन…
भाषा
मानव का भाषा ज्ञान और उसके खुद को अभिव्यक्त करने की क्षमता ही उसे अन्य प्राणियोँ से श्रेष्ठ बनाता है..”भाषा” के बारे मेँ मेरे विचार कुछ इस तरह हैँ.
“भाषा नही जानने का तो आदमी सिर्फ बहाना बनाता है,भाषा जानते हुए भी आदमी,आदमी को कम ही समझ पाता है.”
“तर्क और वितर्क की भाषा समझने के लिये आप जरुर अपना दिमाग लगाईये,लेकिन सँवेदनाएँ समझने के लिए तो एक अच्छा सा दिल ही चाहिये.”
“शब्दकोष से शब्द खोज कर शब्द पिरोये वाक्य बनाया,
कोशिश सारी व्यर्थ ही गई ,जो कहना था कह ना पाया,
जब मैने ग्यानी से पूछा, उसने मुझको ये समझाया,
शब्द तो होते है बस मिथ्या, कौन किसे क्या समझा पाया ? ”
“हमारे शब्द तो अभिव्यक्ति की एक कोशिश भर होते हैँ,
नम आँखेँ और हाथोँ के स्पर्श ही असल मे बोलते हैँ.”
“क्लिष्ट और अति-अलँकृत भाषा के शब्दोँ से अहँकार की बू सी आती है,
भावोँ की सहजता और सरलता कहीँ पिछे रह जाती है.”
“कोई भी हो भाषा भाव पर सरल हो,
शब्द होँ मधुर के जैसे हो अमृत,
ना हो कठिन कि जैसे गरल हो.
कोई भी हो भाषा, भाव पर सरल हो.”
ये हुई ना बात रचना बहन। वास्तव में आपना नाम सार्थक किया है आपने। बहुत प्रेरक विचार हैं आपके। उन्हैं अपने जीवन में उतारनेका प्रयास करूंगा। लिखती रहें और अपने जीवन-मूल्यों और विचारों से हमारा परिचय कराते रहें।
हिमान्शु भाई , बहुत शुक्रिया..कोशिश करती रहूँगी.