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मै बेरोजगार हूँ!!! August 22, 2006

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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क्या कोई सुन लेगा मेरी गुहार ?
मै हूँ आम आदमी सबसे लाचार
बँगला न चाहता, न चाहता मै कार
चाहता हूँ मै, बस एक रोजगार!
लोग मुझे पूछते हैँ क्यूँ हो बेकार
मुँह मोड लेता हूँ मै उनसे बार बार
कर ही क्या सकता हूँ,बताओ तो यार
न ही मै नेता हूँ, न ही कलाकार!
मँत्रीयोँ के धन देख रोता धार-धार
जाने कब सुध लेगी मेरी सरकार
दाम देना चाहता,न चाहता उधार
क्या करुँ मै मँहगाई की पडती है मार!
समय के रहते ही सुन लो पुकार
फायदा क्या,जब हो जाउँगा तार-तार!!
साथ मुझे चलने दोगे,करो ये करार
जीवन मे भूलूँगा न तुम्हारा आभार
मेरे इस कथन का इतना ही सार
मान से ही उठाउँगा जीवन का भार…

Comments»

1. रवि - August 22, 2006

भाव प्रण है बेरोजगारी की यह कसक!

2. हिमांशु - August 22, 2006

बहुत खूब।

न माँगू मैं भीख नौकरी की, न माँगू कुछ उधार
शिक्षा की पौध लगी है मन में, फले-फूलेगी बनके रोज़गार
मुश्किल है जंग रोटी और छत की, यहँ-वहाँ हर घर-द्वार
दीप से दीप जलाना है और हार नहीं स्वीकार

3. Makarand Ghare - August 23, 2006

The poems by Mrs Bajaj truly speak about a “common man” perceived RK Narayan & accepted by all Indians !! That too in simple to understand Hindi.

After the catoonist, it is the turn of the Poetess to win the hearts of billion of Indians !!

All the Best to her !!!

4. Amit - August 23, 2006

अरे कविताबाज़ी के अतिरिक्त भी तो कुछ कीजिए!!

पहले से ही बहुतेरे कवि हैं यहाँ,
कविता अपनी पढ़ा हमको पल-पल मारते हैं यहाँ,
अब तो बस कीजिए ये सितम,
हमसे और सहा नहीं जाएगा!! ;)

5. Rachana - August 24, 2006

रवि जी और हिमान्शु भाई ,, बहुत धन्यवाद्..

thanks a lot Mr. Ghare for your kind words!

अमित भाई,.क्षमा करेँ आपको कष्ट हुआ इसलिए…और अभी हमारी “शब्द सामर्थ्य” और “टँकण क्षमता” एसा ही लिख पाने की है,१५०० श्ब्दोँ का निबन्ध लिख पाना फिलहाल तो कठिन है…..

6. Amit - August 25, 2006

अजी कष्ट नहीं हुआ रचना जी, मैंने तो बस अर्ज़ी लगाई थी कि आप कविता के अतिरिक्त भी कुछ लिखें। कविता लिखती हैं तो यह भी जानती होंगी की शब्दों का वास्तविक अर्थ न लेकर उनका भाव लिया जाता है, तो मेरे शब्दों का भी मूल अर्थ ना लें। :)