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लक्ष्मी की दीवाली November 9, 2006

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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लक्ष्मी पूजन का दिन था. घर मे पूजा की तैयारियाँ चल रहीं थीं.लक्ष्मी जी की एक बडी सी तस्वीर रखी थी, जिसमे कमल के फूल पर बैठी हुई लक्ष्मी जी हाथ से पैसे बिखरा रही थी.पास ही सरस्वती माँ की एक छोटी तस्वीर रखी थी.लक्ष्मी जी की खूब मेहरबानी थी घर वालों पर.कहते हैं कि लक्ष्मी की भव्यता के साथ रहना सरस्वती कम ही पसंद करती है, तो कुछ ऐसा ही था इस घर मे भी..
घर की ‘गृह-लक्ष्मीयाँ’(दूर्गाएँ??)अपने अपने श्रृंगार मे लगीं थीं..दादी माँ रसोई की तरफ आई और लक्ष्मी के कान मे धीरे से बोली ‘एक बार तुम देख लो बहू ने घर की परंपरा के अनुसार ठीक से तैयारी की है कि नही!’..
दादी माँ को अपनी बहुओं से ज्यादा लक्ष्मी पर भरोसा था..लक्ष्मी, घर की एक बहुत पुरानी नौकरानी की बेटी थी.
बीस वर्षीय लक्ष्मी देखने मे सुन्दर और सुशील थी.. जब से उसकी माँ ज्यादा बीमार रहने लगी थी तब से लक्ष्मी ने इस घर मे उसकी माँ की जगह ले ली थी..लक्ष्मी का दर्जा घर के अन्य नौकर-नौकरानियों की अपेक्षा थोडा ऊँचा था.. वो एक ‘सुपरवाइजर’ की तरह थी..वो घर की हर बात और तौर तरीके जानती थी..उसका सारा दिन इसी घर मे गुजरता..यहीं से उसका और उसकी माँ का गुजारा चलता था..बडे त्यौहारों के दिन उसे नये कपडे मिलते और ‘साहब’ की तरफ से ईनाम भी..इस दीवाली की ‘लक्ष्मी-पूजा’ के बाद भी ‘सफेद’ कपडे पहने ‘काले’ साहब ने लक्ष्मी को आवाज लगा कर कहा-’ये लो तुम्हारा दीवाली का ईनाम’..लक्ष्मी तेज-तेज चलकर आई और उसने सकुचाते हुए ईनाम कबूल कर लिया…वो जानती है साहब की तरफ से मिले त्योहारों के इन ईनामों की कीमत उसे चुकानी पडती है….कल ही बडी बहू अपने मायके जाने वाली है……
आज लक्ष्मी अनमने मन से अपने घर लौटी..उसने माँ से कहा कि वह अब और इस बँगले पर काम नही करेगी..
मजबूर माँ पहले से ही सब कुछ जानती थी.उसने कहा,”मै भी सोचती हूँ अब तुम्हारी शादी कर दूँ लेकिन देखा है अपनी बिरादरी के लडकों को? जुआँरी या शराबी से शादी करके कैसे मैं तुम्हारा भविष्य खराब कर दूँ? यहाँ से कम से कम तुम्हे खाने-कपडे की तो परेशानी नही होगी.”
लक्ष्मी भी दुविधा मे पड गई..सोचने लगी कम से कम साहब मारता-पीटता तो नही..आखिर सहब की भी ईज्जत का सवाल है……..

Comments»

1. समीर लाल - November 9, 2006

बहुत हृदय स्पर्शी कहानी है.

2. अनूप शुक्ला - November 10, 2006

”मै भी सोचती हूँ अब तुम्हारी शादी कर दूँ लेकिन देखा है अपनी बिरादरी के लडकों को? जुआँरी या शराबी से शादी करके कैसे मैं तुम्हारा भविष्य खराब कर दूँ? यहाँ से कम से कम तुम्हे खाने-कपडे की तो परेशानी नही होगी.”
ये बड़ी भयानक बात है. लेकिन क्या सारी साहब बिरादरी सच में ऐसी ही है. बहुत सोचना पड़ेगा इस बारे में.

3. सागर चन्द नाहर - November 10, 2006

बहुत अच्छी कहानी है।

4. मनीष - November 10, 2006

आर्थिक मजबूरी का फायदा उठा कर शारीरिक शोषण तो होता ही रहा है । आपकी कहानी ने इस कड़वे सच पर फिर ध्यान दिलाया है ।

5. rachana - November 10, 2006

@ समीर जी, सागर जी और मनीष जी, धन्यवाद.

@ अनूप जी,/लेकिन क्या सारी साहब बिरादरी सच में ऐसी ही है./ ये कहना गलत होगा..अब भी अच्छे लोग हैं भारत मे.

6. अनुराग श्रीवास्तव - November 11, 2006

इतनी पसंद आई कहानी कि समझ में नहीं आ रहा है कि क्या टिप्पणी करूं.

7. rachanabajaj - November 11, 2006

@ अनुराग जी, आपकी दुविधा मै समझ सकती हूँ.पढने के लिये धन्यवाद.