कल मनीष जी के चिट्ठे पर एक मार्मिक गीत पढने को मिला..गीत ‘उमराव जान’ के जमाने का है, लेकिन आज इतने सालों के विकास के बाद भी समाज की कई बेटीयों की कहानी वही पुरानी है…उन्होने इस पर अपने विचार भी लिखे हैं….उसी बात को मैने कुछ इस तरह कहा है—-
मत रोको उसे पढने दो,
मत बाँधो उसे बढने दो,
पत्नी होगी, माँ भी होगी,
उसका जीवन तो गढने दो!
मत खीचों उसे चढने दो,
मत थामो उसे गिरने दो,
आसमानों को छू भी लेगी,
कुछ उसको भी उड लेने दो!
मत टोको उसे हँसने दो,
मत छेडो उसे रोने दो,
सबका तो वो सुन ही लेगी,
कुछ उसको भी कह लेने दो!
तुम जहाँ बढे वो वहाँ बढी,
तुम जहाँ रूके वो वहाँ रूकी,
अपनी मन्जिल पा लेगी वो,
कुछ उसको भी चल लेने दो!
जग सो भी गया वो जगी रही,
कर्तव्यों से वो डगी नही,
सबका जीवन महका देगी,
खुद उसको तो खिल लेने दो!
सब कामों को वो कर लेगी,
सब मुसीबतें वो हर लेगी,
सबके सपने सच कर देगी,
उसके सपने तो बुनने दो!!!

बहुत ही सुन्दरता से बुनी हुई कविता. बहुत खुब.
क्या बात है भई? इतनी सुन्दर कविता पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं!
अतिसाधारण शब्दो से असाधारण प्रयास, आश्वर्य! कैसे किया होगा यह सब?
मान गये रचनाजी, भाव हो तो अभिव्यक्ति शब्दों की मोहताज़ नहीं।
‘कविराज’ ने सही कहा – सादगी की सुंदरता!
बहुत खूबसूरत रचना रचना की. वाह भई, रचना जी, बधाई.
वैसे तो पूरी कविता सुंदर है पर ये पंक्तियाँ खासतौर से पसंद आईं !
जग सो भी गया वो जगी रही,
कर्तव्यों से वो डगी नही,
सबका जीवन महका देगी,
खुद उसको तो खिल लेने दो!
बहुत खूब !
रचनाजी बहुत ही सुंदर कविता है
बधाई
आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद, कविता और सरल भाषा पसंद करने के लिये.
@ गिरिराज जी, कैसे कर लेती हूँ, इसका तो मुझे भी पता नही..
मैं भी यही कहुंगा रचना जी कि
कविता बहुत सुन्दर है, बधाई स्वीकार करें।
अहा.. उत्कृष्ट भाव अभिव्यक्ति. बेटियों को कमतर आंकना बर्बर व मध्यकालीन सोच का परिचायक है. आपकी कविता ने बेटियों के गुणों का सुंदर वर्णन किया है. प्रेरक रचना के लिए रचना जी को हार्दिक साधुवाद.
@ सागर जी, बहुत धन्यवाद.
@ नीरज जी, धन्यवाद्.और आपकी टिप्पणी पर जवाब लिखा लेकिन बहुत प्रयास करने पर भी पोस्ट नही हो पाया..(जीतू भाई के ब्लोग पर) फिर से कोशिश करती हूँ.
तुमने
तुमने दिल के तार हिलाए,
तुमने दिल में स्वप्न जगाए,
मन आँगन में फूल खिलाए,
तुमने मेरे आँसू चुराए।
[...] की प्रतियोगिताऒं में ले गयीं | बेटी के बारें में उनकी सोच सदा धनात्मक रही- मत रोको उसे [...]