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बेटी November 17, 2006

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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कल मनीष जी के चिट्ठे पर एक मार्मिक गीत पढने को मिला..गीत ‘उमराव जान’ के जमाने का है, लेकिन आज इतने सालों के विकास के बाद भी समाज की कई बेटीयों की कहानी वही पुरानी है…उन्होने इस पर अपने विचार भी लिखे हैं….उसी बात को मैने कुछ इस तरह कहा है—-

मत रोको उसे पढने दो,
मत बाँधो उसे बढने दो,
पत्नी होगी, माँ भी होगी,
उसका जीवन तो गढने दो!

मत खीचों उसे चढने दो,
मत थामो उसे गिरने दो,
आसमानों को छू भी लेगी,
कुछ उसको भी उड लेने दो!

मत टोको उसे हँसने दो,
मत छेडो उसे रोने दो,
सबका तो वो सुन ही लेगी,
कुछ उसको भी कह लेने दो!

तुम जहाँ बढे वो वहाँ बढी,
तुम जहाँ रूके वो वहाँ रूकी,
अपनी मन्जिल पा लेगी वो,
कुछ उसको भी चल लेने दो!

जग सो भी गया वो जगी रही,
कर्तव्यों से वो डगी नही,
सबका जीवन महका देगी,
खुद उसको तो खिल लेने दो!

सब कामों को वो कर लेगी,
सब मुसीबतें वो हर लेगी,
सबके सपने सच कर देगी,
उसके सपने तो बुनने दो!!!

Comments»

1. संजय बेंगाणी - November 17, 2006

बहुत ही सुन्दरता से बुनी हुई कविता. बहुत खुब.

2. Giriraj Joshi - November 17, 2006

क्या बात है भई? इतनी सुन्दर कविता पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं!

अतिसाधारण शब्दो से असाधारण प्रयास, आश्वर्य! कैसे किया होगा यह सब?
मान गये रचनाजी, भाव हो तो अभिव्यक्ति शब्दों की मोहताज़ नहीं।

3. अनुराग श्रीवास्तव - November 17, 2006

‘कविराज’ ने सही कहा - सादगी की सुंदरता!

4. समीर लाल - November 17, 2006

बहुत खूबसूरत रचना रचना की. वाह भई, रचना जी, बधाई.

5. मनीष - November 17, 2006

वैसे तो पूरी कविता सुंदर है पर ये पंक्तियाँ खासतौर से पसंद आईं !

जग सो भी गया वो जगी रही,
कर्तव्यों से वो डगी नही,
सबका जीवन महका देगी,
खुद उसको तो खिल लेने दो!

बहुत खूब !

6. bhuvnesh - November 18, 2006

रचनाजी बहुत ही सुंदर कविता है
बधाई

7. rachana - November 18, 2006

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद, कविता और सरल भाषा पसंद करने के लिये.

@ गिरिराज जी, कैसे कर लेती हूँ, इसका तो मुझे भी पता नही..

8. सागर चन्द नाहर - November 19, 2006

मैं भी यही कहुंगा रचना जी कि
कविता बहुत सुन्दर है, बधाई स्वीकार करें।

9. नीरज दीवान - November 20, 2006

अहा.. उत्कृष्ट भाव अभिव्यक्ति. बेटियों को कमतर आंकना बर्बर व मध्यकालीन सोच का परिचायक है. आपकी कविता ने बेटियों के गुणों का सुंदर वर्णन किया है. प्रेरक रचना के लिए रचना जी को हार्दिक साधुवाद.

10. rachana - November 20, 2006

@ सागर जी, बहुत धन्यवाद.

@ नीरज जी, धन्यवाद्.और आपकी टिप्पणी पर जवाब लिखा लेकिन बहुत प्रयास करने पर भी पोस्ट नही हो पाया..(जीतू भाई के ब्लोग पर) फिर से कोशिश करती हूँ.

11. लक्ष्मीकान्त शांखी - December 14, 2006

तुमने
तुमने दिल के तार हिलाए,
तुमने दिल में स्वप्न जगाए,
मन आँगन में फूल खिलाए,
तुमने मेरे आँसू चुराए।

12. फुरसतिया » जीवन मे हम सबको यूँ ही बस आना है.. - June 10, 2007

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