छोटे बच्चों के किसी काम को करने या नही करने के अपने तर्क होते हैं.कई बार वे अपने उत्सुकता भरे सवालों से अपने माता-पिता को स्तब्ध कर देते हैं.हर दिन सोने के पहले बच्चे के पास माँ के लिये कुछ सवाल जरूर होते हैं, और माँ के लिये सबसे कठिन काम होता है बच्चे को ये समझा पाना कि दुनिया मे कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब उनकी माँ के पास भी नही है! ऐसे ही कुछ सवाल जवाब मेरे और मेरी बेटी के बीच–
बेटी- जब मै बडी हो जाउँगी तब दीदी छोटी हो जायेगी ना? तब वो मुझे दीदी बोलेगी!
मै- नही ऐसा नही हो सकता, उसका जन्म तुमसे पहले हुआ है, तो तुम ही उसे दीदी बोलोगी हमेशा..
बेटी- ये तो गलत बात है! मै ही उसे दीदी बोलूँ?, फिर आपने मुझे आपकी बडी बेटी क्यूँ नही बनाया???
मै———–
बेटी- पापा रोज आफिस क्यूँ जाते हैं?
मै- काम करना पड्ता है….पैसों की जरूरत होती है….
बेटी-क्या?? पैसे हम ‘ए टी एम’ से नही लाते???????
बेटी- आज जी. के. का एक प्रश्न था ना उसके दो सही जवाब थे.
मै- कैसे?
बेटी- प्रश्न था-इनमे से कौनसी चीज ‘वाल्यूम’(*आयतन, ये जानने के लिये वो काफी छोटी थी*) मे बढ सकती है–
१.टी वी २. बुक ३. बलून ४. कम्यूटर.
तो टी वी और कम्यूटर (स्पीकर मे) दोनो मे ‘वाल्यूम’ बढ सकता है ना?
और भी कुछ किस्से देखिये–
एक बार जब मेरी भतीजी अपनी माँ के साथ आपना परिक्षाफल लेकर घर लौट रही थी तब माँ ने उससे पूछा तुमने एक प्रश्न का जवाब छोड क्यूँ दिया?,जबकि वो तुम्हे आता था?’
बेटी का जवाब था-’हाँ मैने ऐसा किया, क्यों कि मै इस बार ‘–’ को प्रथम आने देना चाहती थी, एक बार उसे भी तो आने दो! हर बार उसकी मम्मी उसे परिणाम के दिन डाँटती है, इस बार मै डाँट खा लेती हूँ.’
एक बार मेरी बेटी ने बैंगन के चित्र मे लाल रंग भर दिया, जब मैने उससे पूछा क्या उसे नही पता कि बैंगन कैसा होता है?..’हाँ पता तो है, लेकिन मेरे कलर बाक्स मे सबसे गंदा रंग वो ही है ,इसलिये मै उसे कभी नही उपयोग करूंगी!’उसका जवाब था…
दो साल पहले मेरी बेटी का चुनाव उसकी शाला की तरफ से चित्रकला की किसी स्पर्धा के लिये किया गया, जिसे अन्य शहर की कोई और शाला संचालित कर रही थी..उसके शिक्षक ने मुझे बताया कि उसके ग्रुप मे ज्यादातर बच्चे उससे बडे ही चयनित होते हैं..तो मै वहाँ उसे प्रतियोगिता के उद्देशय से कम और दूसरे बच्चों का काम देखने और सीखने के उद्देश्य से ज्यादा, ले गयी…
जैसे ही वो चित्रकारी करके कक्ष से बाहर आई, मैने पूछा- किसका चित्र तुम्हे सबसे ज्यादा अच्छा लगा?
‘मेरा!!’ उसका जवाब था!
चित्र का विषय था – एक अन्धा भिखारी और एक छोटा बच्चा.
उसने चित्र तो अच्छा बनाया लेकिन भिखारी और उसके साथ वाली बच्ची को बढिया कपडे पहनाये और सजे सँवरे बाल बनाये.तर्क था- “मुझे उनको गन्दे कपडे पहनाना पसन्द नही है!”
प्रतियोगिता के अन्त मे वहाँ पुरस्कृत चित्रों की प्रदर्शनी थी….एक चित्र को देख उसकी टीप्पणी थी-”कैसा चित्र बनाया है१ सब औरतें कितनी मोटी बनाईं हैं!”( वो द्वितीय स्थान प्राप्त चित्र था!)
एक ‘माडर्न आर्ट’ के जैसे चित्र को देखकर बोली–’क्या बनाया है!! कुछ समझ ही नही रहा!!!
मेरी बेटी को वहाँ कोई इनाम तो नही मिला, लेकिन हम वहाँ से उसके चित्र और टीप्पणीयों कि लिये खूब सारी तारीफ लेकर लौटे!
बड़े मजेदार सवाल-जवाब हैं.
बहुत सुंदरता से पेश किया है वार्तालाप एवं बालमन जिज्ञासा को.
आपकी बेटियां तो कुतूहल जागृत करती हैं, झीवन में अच्छा करेंगी
आपकी बेटियां तो कुतूहल जागृत करती हैं, जीवन में अच्छा करेंगी।
बड़ी होकर आपकी बेटी जरूर हम सबकी तरह महान चिट्ठाकार बनेगी, हे-हे-हे।
झकास । मजेदार और चटपटा ।
बहुत सुन्दर, रचना जी!
मेरी ६ साल की बेटी भी सैकड़ों सवाल करती है, हर नए शब्द का अर्थ पूछती है। उसको अगर कोई शब्द का अर्थ बता दो, तो फट से उसका वाक्य प्रयोग करने के लिए बेचैन हो उठती है। भले ही उसके लिए उसे अपनी फ़्रेन्ड को फोन करके बताना पड़े। ऐसी कई कई घटनाएं हुई है, डिटेल मे अपने ब्लॉग पर लिखूंगा।
वाह रचना जी ! मजा आ गया बच्चों की बातें पढ़कर । बिना किसी पूर्वाग्रह के खुले मन से जिस तरह ये किसी विषय को तौलते परखते हैं और प्रश्न दागते हैं उससे हमें भी सीकने को मिलता है ।
भूल सुधार
‘सीकने’ को सीखने पढ़ें ।
वाक़ई बच्चों के सवाल बड़ों को निरुत्तर कर देते हैं। पढ़कर मज़ा आया।
@ अनूप जी और समीर जी, धन्यवाद.
@ उन्मुक्त जी, धन्यवाद. वैसे इतनी जिज्ञासा तो आज के अमूमन हर बच्चे मे है.जितनी लगन और परिश्रम होगा उतना कर पायेंगे.
@ श्रीश , आप हँस रहे हैं तो थोडा और हँस लीजिये– ‘दुनिया का दस्तूर है ये कि जिनके माता/पिता जिस क्षेत्र मे महान हो चुके हों, उनके बच्चे उस क्षेत्र मे महान नही हुआ करते!’
@ प्रभाकर जी, बहुत धन्यवाद्.
@ जीतू भाई, धन्यवाद. हर बच्चे की बातें अपने ढंग की अलग और मजेदार होती हैं. लिखियेगा जरूर.
@ मनीष जी, ठीक कहा आपने.कई सारी बातें हम बच्चों से सीखते हैं.
@ प्रतीक जी, धन्यवाद.
रचना जी,
मोजिला ब्राउसर में बिखर गये हैं सारे शब्द
।
मेरे ब्लाग में भी हिन्दी भी यही हाल था, टेम्पलेट बदला तो खुश हो गया । प्लीज चैंज करो यह ब्लाग टेम्पलेट । तब मैं भी पढ़ पाऊँगा आपका ब्लाग ।
अंग्रजी में कहते हैं ना – थैंक्स इस एडवांस ।
पीयूष जी, आशा है अब आप ठीक से पढ पायेंगे.
क्षमा कीजिए, वो फायरफॉक्स एक्सटेंशन नहीं बल्कि Greasemonkey User Script थी। उसके लिए पहले Greasemonkey फायरफॉक्स एक्सटेंशन इंस्टाल होनी चाहिए।
रचना जी,
अहा, मन भर गया पढ़कर ।
अरे हाँ, उनके प्रश्न का उत्तर गुगल में भी नहीं मिलता, वो भी बेचारा चकरा जाता है