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हम हारते क्यों हैं? November 24, 2006

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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जी हाँ! मै क्रिकेट के बारे मे ही बात कर रही हूँ. ठीक है मैने कभी क्रिकेट खेला नही, लेकिन देखा, सुना और पढा तो है! और फिर मै भारतीय नागरिक हूँ, ‘अभिव्यक्ति’ की पूरी स्वतंत्रता है मुझे, जिस बारे मे बहुत कुछ नही जानती, जिस बारे मे मै कुछ कर सकती नही, उस पर भी बहस कर लेना, राय जाहिर करना मेरे भारतीय होने को और मजबूत करता है!
मेरा मानना है कि हमारी टीम और दूसरी टीमों (खासकर आस्ट्रेलिया)मे कुछ बुनियादी बातों का अन्तर है जिसकी वजह से ही हम हारते और वे जीतते रहते हैं, जैसे–
१.हमारे लिये हारना कोई दुनिया के खतम होने की बात नही.. अच्छा करने के लिये हमेशा ही एक ‘कल’ होता है हमारे पास.उनके लिये मानो जीतने के लिये दूसरा कल होता ही न हो!
२.हमारे हर खिलाडी के पास ‘ऑफ डे’ या ‘ऑफ टूर’ जैसी सुविधा होती है. उनके पास ये सुविधा कम ही होती है.
३.हमारे किसी खिलाडी ने 8000 से ज्यादा रन बनाये हों या फिर किसी एक या दो टूर्नामेन्ट मे एक-दो चमत्कारिक पारियाँ खेलीं हो तो ७-८ टूर्नामेन्ट मे उसे फेल होते रहने का पूरा हक है. जबकि उन्हें हर मैच मे “प्रूव्ह” या “इम्प्रूव्ह” करना होता है.
४.ऑस्ट्रेलिया के कोच को हार मानों बर्दाश्त ही नही.(याद है ऐडीलेड(शायद) मे भारत से हारने पर उनके कोच ने चिट्ठी द्वारा कैसे फटकार लगाई थी और होशियारी से वो जानकारी मीडीया मे दे दी गई थी.)
हमारे कोच और कप्तान का एक ही बयान चलता रहता है- “बाॉयज आर वर्किंग हार्डॅ”!! अब जब सबको “हार्ड वर्क” का फल मिलता है तो इन्हे क्यो नही?
५.हमारे खिलाडियों को क्रिकेट के सिवा रेस्तराँ,हेयर सलून चलाना, विज्ञापन आदि दूसरे काम भी तो हैं!
६.हमारे देश मे क्रिकेट धर्म है!!(अब ये बात समझ से परे है,क्या पहले से मौजूद इतने धर्म कम हैं,जो समय समय पर परेशानी का सबब बने हैं हमारे लिये? जो खेल को भी धर्म मान लिया जाये?)

तो बताइये आप सहमत हैं या नही हार के इन कारणों से?

अब हमारे नये कोच भी लगे हुए हैं नये प्रयोगों मे.इसी के तहत उन्होने एक आस्ट्रेलियन दाँव अपनाया और वेस्ट इंडीज दौरे पर जाते ही घोषणा कर दी कि वेस्ट इंडीज की टीम ‘जीतना’ भूल गयी है! अब बेचारे खुद ये भूल गये कि वे जीतना भूल गये तो क्या हुआ, हम हारना थोडी भूले हैं!!और फिर वो ये भी नही जानते की हमारी टीम मे टीम भावना कूट कूट कर भरी हुई है, एक नही चला तो कोई भी नही चलेगा!!

मै उस परिवार से हूँ जहाँ खेल जीवनशैली का एक हिस्सा रहे हैं. माँ के घर संयुकत परिवार मे लडके ज्यादा और लडकियाँ कम थीं तो हम सब मिलकर ही खेला करते थे.जब हम बहुत छोटे थे तब बडे भाइ हमसे फिल्डिंग करवाते, बदले मे हमे कुछ देर के लिये बल्ले और बाल को छू लेने दिया जाता.घर मे पिताजी और भाई टी वी पर क्रिकेट मैच का मजा लेते तो हम भी उसमे शामिल होते.दो भाईयों के पसंदीदा खिलाडी अलग अलग होते और उनमे से किसी के चलने या नही चलने पर भाईयों मे हुई बेवजह की बहस के हम साक्षी होते.
अब शादी के बाद भी हमे सपोर्टिव रोल अदा करना पड्ता है. मसलन कुछ वर्षों पहले तक जब मोबाइल या नेट ज्यादा प्रचलित नही था तब दिन मे मैच देखकर ‘उन्हे’ स्कोर बताना पड्ता.या फिर जब सुबह बच्चों से वादा किया जाता कि उन्हे शाम को घूमने ले जायेंगे और शाम को पता चलता कि आज कोइ खास मैच है तो बच्चे हमारे जिम्मे होते .भारत कोइ “नेट वेस्ट सीरीज” या फिर पाकिस्तान से मैच जीते तो आधी रात मे हलवा हमे ही बनाना पडता है….. अब बताइये जिसके लिये हम इतना कुछ करें उस पर बोलें क्यूँ नही?

Comments»

1. अनूप शुक्ला - November 24, 2006

अपनी बात कहना आपका मौलिक अधिकार जिसे आपने बखूबी उपयोग किया इसके लिये बधाई।

2. bhuvnesh - November 24, 2006

बहुत सही कहा बेचारे क्रिकेटरों पर इतनी सारी जिम्मेदारियां है तो भला वो मैदान वाली एक जिम्मेदारी नहीं भी निभायें क्या फ़र्क पड़ता है

3. समीर लाल - November 24, 2006

और फिर सटोरियों से जो वादा किया है, उसका क्या? कोई वादा खिलाफ़ी थोडे ही न करते हैं, सिर्फ एक जीत के लिये.
–वैसे आपकी बताई वजहें जायज हैं, सभी.

4. Shrish - November 24, 2006

भई, ये मैच वगैरा पर ध्यान देने लगें तो विज्ञापन कौन करेगा।

5. मनीष - November 25, 2006

तेज उछाल लेती पिचों पर हम हमेशा से फिसड्डी साबित हुए हैं । हमारी बैटिंग लाइन अप जितनी ताकतवर मानी जाती है उतनी बाहर की पिचों पर वो है नहीं । घरेलू क्रिकेट का स्तर को और ऊपर उठाये बिना और भारतीय पिचों को तेज गेंदबाजी के अनुरूप बनाये बिना भविष्य में विश्व कप विजेता बनने का हमारा स्वप्न , स्वप्न ही रह जाएगा ।

6. संजय बेंगाणी - November 25, 2006

इत्ते सारे काम और हम उम्मीद करें की मैदान में भी वे अच्छा खेले, उनके साथ ना इंसाफी है.
आपने सरल मगर चोटदार भाषा में अपनी बात रखी है.
बहुत खुब.

7. उन्मुक्त - November 25, 2006

‘आधी रात मे हलवा’ वाह मजा आ गया।

8. सागर चन्द नाहर - November 26, 2006

लिखने की शैली मजेदार है, मलमल के कपड़े में लपेट कर जूता मारा है आपने :)

9. rachana - November 27, 2006

आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया, अपने विचार यहाँ रखने के लिये.

@ उन्मुक्त जी,
/‘आधी रात मे हलवा’ वाह मजा आ गया।/
घर मे सेवानिवृत्त ससुर हैं मेरे, और भारत की अनपेक्षित जीत पर जश्न मनाने का उनका यही तरीका है!!

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