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नियति December 5, 2006

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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नियति का पहले ही तय सब कुछ होता है,
आखिर फिर आदमी इतना क्यूँ सोचता है?

व्यर्थ ही की लालसाएँ मन मे पनपाता है,
थोडा-सा पाने को ज्यादा ही खोता है.

व्यर्थ ही वो सपनों को काँधों पर ढोता है,
सपनों के टूटने पर सिर धुन कर रोता है.

व्यर्थ ही वो कर्मों के चक्रव्यूह रचता है,
सारे जीवन भर उसी मे उलझता है.

व्यर्थ ही मे शक्ति पर अपनी इतराता है,
नियति के आगे वो कुछ कर न पाता है.

व्यर्थ ही मे चल-चल कर खुद को थकाता है,
मीलों चलकर भी, वो कहीं नही पहुँचता है.

व्यर्थ ही वो जीवन के सागर मे तैरता है,
मृत्यु के भय से कभी नही उबरता है.

व्यर्थ ही की आस लिये जीवन भर जगता है,
अन्त मे खाली हाथ मरकर वो सोता है.

नियति का पहले ही तय सब कुछ होता है,
आखिर फिर आदमी इतना क्यूँ सोचता है?

Comments»

1. समीर लाल - December 6, 2006

वाह वाह, खुब लिखा है!! अच्छा लगा है!

2. अनूप शुक्ला - December 6, 2006

रोना-धोना भी शायद नियति है। आदमी नियति के अधीन होकर हरकतें करता है।

3. Prem Piyush - December 6, 2006

सही कह रही हैं और ऐसा ‘ चिंतन-मनन ‘ ही जीवन है । ऐसे कहूँ तो परमसत्ता को समर्पित किए बिना हरेक कुछ व्यर्थ है ।

4. SHUAIB - December 6, 2006

ये भी सही कहा आपने

5. krishnshanker sonane - December 6, 2006

रचना जी
आपकी गजल बहुत अच्‍छी है । आप और बहुत अच्‍छा लिखते रहे यह कामना करता हूँ।
मुबारकबाद
—कृष्‍णशंकर सोनाने

6. अनूप भार्गव - December 7, 2006

अच्छी गज़ल है ।

जब कुछ भी नहीं रह जाता है उस के पास
आदमी तब अपना ज़मीर खोता है ।

7. मनीष - December 7, 2006

कुछ काम करो कुछ काम करो
जग में रहके निज नाम करो ।
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो ।

आपकी कविता पढ़कर गुप्त जी की ये पंक्तियाँ याद आ गईं । जिंदगी में कुछ तो करना है। और कुछ करते करते व्यक्ति सांसारिक माया जाल में फँस ही जाता है । सिर्फ वो भाग्य के बारे में ही सोचे तो फिर जीवन कैसे कटेगा उसका ? अच्छे या बुरे मनोभावों के साथ इस चक्रव्यूह में चलते रहना ही आदमी की नियति है ।

8. rachana - December 8, 2006

@ समीर जी, बहुत धन्यवाद.

@ अनूप जी, ठीक ही कह रहें हैं आप.

@ पियूष जी, शुक्रिया.

@ शुएब भाई, बहुत धन्यवाद.

@ सोनाने जी, बहुत धन्यवाद आपका. कोशिश करती रहूंगी.

@ अनूप जी, ठीक कहा आपने! कभी परिस्थितीयों से मजबूर हो जाता है आदमी.

@ मनीष जी, वो भी मेरी बहुत पसंदीदा कविता है,लेकिन जैसा आपने कहा, आशा और निराशा दोनो तरह के विचार आते ही रहते हैं.

9. प्रियंकर - December 12, 2006

गज़ल के भाव बहुत सुंदर लगे . नियति से बंधा मनुष्य शतरंज के मोहरों के जितना ही स्वतंत्र होता है .

10. rachanabajaj - December 12, 2006

@ प्रियंकर जी, बहुत धन्यवाद आपकी टिप्पणी के लिये.आशा है आप आगे भी अपनी राय जाहिर करते रहेंगे.

11. उन्मुक्त - December 19, 2006

यदि, ‘नियति का पहले ही तय, सब कुछ होता है,’
तो ‘सब कुछ पहले’ को कौन तय करता है
यह नहीं करती नियति, यह स्वयं करता हैं हम
पर जब नहीं होता मन मुताबिक,
तो छोड़ देतें हैं उसे नियति पर

12. rachana - December 20, 2006

उन्मुक्त जी, कुछ मामलों मे आप जो कह रहे हैं वो सही हो सकता है, लेकिन कुछ मामलों मे मै जो कह रही हूँ वो भी सही है! जैसे कि आपकी और मेरी मित्र के मामले मे.

13. फुरसतिया » जीवन मे हम सबको यूँ ही बस आना है.. - June 10, 2007

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