साक्षात्कार December 19, 2006
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.trackback
(* एक आम गरीब नौजवान से खास मुलाकात *)
मैंने कहा- मुझे आपसे कुछ सवाल पूछने हैं.
वो बोला- वैसे तो किसी भी सवाल का कोई जवाब मेरे पास है नहीं, फिर भी कोशिश करता हूँ.
नाम-
माता-पिता का नाम-
जन्म तारीख-
जन्म स्थान-
यहाँ तक तो उसके सारे जवाब किसी भी सफल नौजवान की तरह ही थे –उसकी माँ का नाम ‘सीता’ था तो किसी का नाम ‘जानकी’ होता, उसके पिता का नाम ‘मोहन’ था तो किसी के पिता का नाम ‘राम’ होता—
लेकिन अब आगे के हर जवाब में अन्तर शुरु होता है–
शिक्षा–
–औपचारिक शिक्षा स्नातक तक है और तमाम व्यावहारिक शिक्षा जीवन से पाई है!
पिता का काम–
–छोटा-सा व्यवसाय करके सारी सामाजिक जिम्मेदारियाँ उन्होंने पूरी कर दी. अब गाँव में इन्तजार कर रहे हैं कि मेरी नौकरी लगते ही मैं उन्हें यहाँ ले आउँगा! वे समझते हैं कि मुझे नहीं पता कि वे रिक्शा ढोते हैं और मैं समझता हूँ उन्हें नहीं पता कि मैं कुली हूँ!
और माँ?–
–शायद जान गईं थीं कि उसकी बीमारी की बोझ ढोना मेरे लिये असम्भव है, सो चल बसी!!
क्या करना चाहते हो?–
–सम्मान से करने लायक कोई भी काम!
कोई सपना?–
–हाँ है न!! मेरे शरीर के हर अंग का अलग-अलग एक सपना है!
हाथों का- वे एक दिन मुझे सुकून देने लायक कोई काम करेंगे!
पैरों का- वे किसी दिन मनचाही दिशा में चल पायेंगे!
पेट का- एक दिन भरपेट खाना मिलेगा!
कानों का- काम मिलने का सुखद समाचार सुनेंगे!
आँखों का- एक दिन चैन की नींद सोयेंगी!!
और मस्तिष्क का भी ये सपना है कि वो भी औरों की तरह सपने देख सके!!!
किसी सफल व्यक्ति से प्रभावित हो?—
—-नहीं!! क्योंकि मै जानता हूँ, अगर वे मेरी जगह जन्मे होते तो आज वे भी वही होते जो मै हूँ और अगर मैं उनकी जगह जन्मा होता तो मैं भी वही होता, जो आज वे हैं!!
कुछ कहना चाहते हो?—
— हाँ, जो सफल हैं उनके लिये–
”हे ईश्वर, मेहरबान उन पर, साथ में उनके जग भी है,
मै थोडा सा पिछ़डा तो क्या, मन में निश्चय तो अब भी है!
आज तो वे जीते सुख से उनके कल भी सुनहरे हैं,
होगा वक्त उन्हीं का सब, कुछ तो अच्छे पल मेरे हैं!
काले सपनों को लिये खडी़ ये रात कभी तो जायेगी,
जिस दिन मुझको भी काम मिले वो सुबह कभी तो आयेगी!!!”
—————————-
#** हम जल्द से जल्द विकसित कहलाने की होड़ मे लगे हैं.हर तरफ बाजार, नफा और नुकसान की बातें हो रही है.हमारे देश में जो व्यवसाय सबसे ज्यादा फल-फूल रहा है, वो है शिक्षा का. हर तरफ ‘इन्जीनियरिंग’ और ‘एम.बी.ए.’की ‘डिग्रियों’ की दूकानें खुल रही हैं और ज्यादातर बडी़ दूकानों के मालिक या तो राजनीतिज्ञ, या फिर राजनीति से पोषित लोग हैं. देश के जो चन्द प्रतिष्ठित संस्थान है, उनमें उपलब्ध सीटों की संख्या पढ़ने वालों की संख्या की तुलना में बेहद कम है. आधे-आधे अँकों को लेकर मारा-मारी है.”केट” हर किसी के पकड़ मे नहीं आती और “गेट” भी हर कोई नहीं खोल पाता! केट और गेट के इस पार और उस पार वालों में बहुत अन्तर है, चाहे कोई उस पार जाने मे जरा-सा ही मात खा गया हो. कहा जा रहा है कि रोजगार के अवसर और लोगों के लिये सुविधा बढ रही है. हाँ काम मिल रहा है बडे़-बडे़ ‘शापिंग माल्स’, ‘मल्टीप्लेक्स’ मे टाई-सूट-बूट पहन कर ‘वेलकम’, ‘मे आय हेल्प यू?’ और ‘थैन्क्यू’ कहने का!! या फिर किसी कम्पनी का प्रोडक्ट बेचने के लिये ‘सेल्स रिप्रेसेन्टेटिव’ बनने का. ये काम तो वो बिना डिग्री के भी कर लेगा, फिर डिग्रियों की दूकानें लगाकर क्यों लूटा जा रहा है? कहते हैं कि कोई भी काम छोटा या बडा़ नहीं होता, तो शायद फिर इसी तरह बडे व्यवसायी बडे़ से बडे़ होते जायेंगे छोटे लोगों की मेहनत के बल पर! **#
सटीक आलेख !
बढ़िया लेख है! पढ़कर अच्छा लगा!
यह तो आजकल हर तीसरे नौजवान की कहानी है।
अच्छा आलेख है.
बहुत अच्छा लिखा है।
मैं इस कथन से सहमत नहीं हूँ। यह कथन मात्र एक कामचोर अथवा कमज़ोर निश्चय वाले का ही हो सकता है। व्यक्ति मन में कुछ करने की ठान ले तो वह करके ही रहता है।
इतिहास ऐसे लोगों की दास्तानों से भरा पड़ा है जो रंक से राजा अपनी मेहनत और ढृढ़ निश्चय से बने। इतिहास ही क्यों, आज वर्तमान में भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो “कुछ नहीं” से “बहुत कुछ” और “सब कुछ” बनें। एकाध को तो मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ जो कभी सड़क पर छोले आदि बेचा करते थे और आज जिनके बड़े रेस्तरां आदि हैं।
संवेदनशीलता से लिखा हुआ बहुत ही अच्छा लेख है .
आप सभी का बहुत धन्यवाद टिप्पणी के लिये.
@ अमित, आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन कई बार ठानने और कडी मेहनत के बाद भी आदमी सफल नही हो पाता है.