(ये पोस्ट हिन्दी फिल्म ‘अनकही’ के बारे मे नही है.)
रोजमर्रा की जिन्दगी मे कई बार ऐसा होता है कि लोगों से बातें करते समय हमारे मन मे कुछ और होता है लेकिन हम सामने वाले का लिहाज करते हुये,शिष्टता के चलते जवाब कुछ और देते हैं.कुछ उदाहरण—(अनकही बातें ** के साथ लिखी गई हैं)
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जब हम घर से कहीं बाहर जाने को निकले ही होते हैं, कि दरवाजे पर मिलते हैं एक बहुत पुराने मित्र, जो महीनो बाद समय निकाल कर मिलने पहुँचे हैं..
मित्र: ओह! आप लोग कहीं जा रहे हैं?
हम: नही,नही! हम तो बस यूँ ही…आप आईये..बडे दिनों बाद आये हैं आप……
** आपको भी आज ही समय मिलना था!!कम से कम एक फोन तो कर दिया होता!!**
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सार्वजनिक जगहों पर—
“कितने बच्चे है आपके?”
-जी दो बेटियाँ हैं.
“बेटा नही है?”
-जी नही.
” वैसे आजकल तो बेटियाँ भी बेटे की तरह ही होती हैं”
-हाँ….
** जी नही!!!बेटियाँ, बेटियों की तरह ही होती हैं!मै उन्हें उसी तरह सम्मान देना पसन्द करती हूँ!**
—-
“आप करती क्या हैं?”
- जी कुछ नही..
**कई सारे काम करने के बाद भी जवाब ‘कुछ नही’ होता है…पता नही क्यूँ ‘कुछ करने’ का प्रचलित अर्थ पैसे कमाने से है..**
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“सुना है आप कविता वगैरह लिखती हैं”
-जी कभी कभी..
“हमे तो कविता-वविता समझ नही आती!”
-ओह…
** कोशिश भी मत करियेगा!! कविता समझना हर किसी के बस की बात नही होती!!**
“हमारी समझ से तो हर क्षेत्र मे नाकाम हुआ निराश व्यक्ति ही कविता लिखता है”
……..
** हो सकता है..लेकिन देखिये ना! प्रबुद्ध लोगों को उसमे भी आपत्ति है!!उसे चैन से वो भी नही करने दिया जाता!!
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सब्जीमंडी मे—
“कैसी हो रचना? अकेली आई हो?”
-जी मै ठीक हूँ…..
** वो ही आ जाते तो मै भला क्यूँ आती!!! इस मामले मे हम दोनो एक दूसरे पर विश्वास कर लेते हैं! और सब्जी रोज-रोज लगने वाली चीज है..सारे परिवार को यहाँ आने की क्या जरूरत! आप भी अकेले ही आया कीजिये! तमाम भीड हो जाती है यहाँ!!**
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बाजार मे, उस समय जब हम अपना सारा काम कर चुके हैं, और घर जाने की जल्दी मे हैं तब कोई पुराना पडोसी मिल जाये!
” वो—क्या नाम था उनका?—कैसे हैं?”
” एक दिन वो मिले थे——”
–जी अच्छा…….
** उफ्फ्! काॅलोनी मे इस छोर से लेकर उस छोर तक…बडों से लेकर छोटों तक सब कोई बिल्कुल ठीक हैं..मुझे जाने दें..प्लीज……….
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इन बातों के लेकर आप सब मेरे चिट्ठा-मित्र, कृपया मेरे बारे मे कोई गलत धारणा न बनाएँ..मै विशुद्ध भारतीय रूप से व्यवहार कुशल हूँ!!! मेरे मन मे चाहे कुछ भी चलता रहे मै वही कहती या करती हूँ जो कहा या किया जाना चाहिये…
ये मेरी इस वर्ष की आखरी पोस्ट है, अत: मैने अपने मन मे कुछ भी बाकी नही रखते हुए सारी ‘अनकही’बातें कह दीं ताकि आप जरा सा मुस्कुराएँ..
आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ.
मुस्करा तो दिये..
मगर “सुना है आप कविता वगैरह लिखती हैं”–
“सुना है आप कविता वगैरह लिखती हैं”
-जी कभी कभी..
“हमे तो कविता-वविता समझ नही आती!”
-ओह…
हम मुस्कराते हुये पढ़ रहे हैं इसे!
पहले तो आपकी आज्ञानुसार मुस्कुरा देता हूँ..
बहुत बार मुझ से पुछा जाता है, “आपकी पत्नि क्या करती है?”
और मेरे पास तत्काल कोई जवाब नहीं होता. अरे यार जो आम गृहणी करती है वही वो करती है..या गृहणी होना कोई अपराध है?
रचना जी, आप की अनकही बातें भी शिष्ट ही लगती हैं, अगर जिस भाषा में लिखा है उसी में सोचती हैं तो क्या आप अपने अंदर के गुस्से को दबा तो नहीं रहीं? मेरी अपनी अनकही बातें तो इससे बहुत ज़्यादा अशिष्ट होती हैं!
बहुत खूब!!!
नए साल की शुभकामनाएँ।
लीजये
आप सभी का, स्माईली के साथ मुस्कुराने का बहुत शुक्रिया!!
‘हम खुश हैं कि हमने आप-से मित्र पाए!
हमने कहा और आप सब मुस्कुराए!!!’