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भारतीय राजनीतिक परिदृष्य January 30, 2007

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….राजनेताओं के एक दूसरे के लिये शर्मनाक बयान.. प्रधानमन्त्री और अच्छे नेताओं का मौन…पता नही इन सबके भरोसे हम कहाँ चले जा रहे हैं…

आजादी की उम्र पचास हो गई,
राजनीतिज्ञों से जनता हताश हो गई.
दूर की पार्टियाँ अब पास हो गईं,
वामपंथियों के लिये अब काँग्रेस खास हो गई.
मन्त्रियों की कुर्सियाँ अब टास हो गई,
पार्टियाँ अब निर्दलियों की दास हो गईं.
प्रधानमन्त्री की भी और कोई बास हो गई!
भारतीय राजनीति एक उपहास हो गई!!
—-
हैं वायु जैसे हल्के वे, लेकिन उस जैसे विरल नही!
हैं पानी जैसे ही पतले, लेकिन उस जैसे तरल नही!
हैं अग्नि जैसे गरम तो वे, लेकिन उस जैसी तपन नही!
हैं सागर जैसे बडे बहुत, लेकिन उस जैसे गहन नही!
हैं लोहे जैसे कठोर वे, लेकिन उस जैसे सघन नही!
हैं सोने से चमकीले भी, लेकिन उस जैसे नरम नही!
उनमे हर तत्व के गुण मिलते, पर थोडी-सी न मानवता!
जाने क्यूँ ऐसे लोग जो हैं, वे मेरे देश के हैं नेता!!

इसी बीच एक खबर…
कुछ दिनों पहले एक समाचार सुना, जिसमे कहा गया कि जनवरी २००७ मे विदर्भ के ३७ किसानो ने आत्महत्या कर ली..मुझे लगा कि मैने गलत सुना होगा…लेकिन अभी अभी फिर सुना की ये संख्या ६२ हो गई है..

फिर कैसे कह दें? January 26, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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 आँकडे बताते हैं कि भारत तेजी से आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर है..लेकिन क्या समग्र सामाजिक विकास के बिना इस तरह की आर्थिक उन्नति के कोई मायने हैं…विकसित कहलाने के मायने क्या लोगों के पास चमचमाती गाडियाँ या सेलफोन जैसी चीजों का होना है जिसे पाने की होड़ इस हद तक है कि अवयस्क बच्चे भी अपराधों की ओर बढ़ रहे हैं…व्यवस्था को बाजार और लोगों को उपभोक्ता के रूप में देखा जाना क्या विकास है..

** पैसों की माया वालों का तो ध्यान सभी जन हैं रखते,
मै उनका सोचा करती हूँ, जो फुटपाथों पर ही रह्ते.
जो फूल खिले हैं वृक्षों पर, उनको तो लोग सभी तकते,
मै उन फूलों को चुनती हूँ, जो मुरझा कर नीचे गिरते.
हैं इस दुनिया में लोग बहुत, जो बहती धारा संग बहते,
मै उनको शीश झुकाती हूँ, जो खुद अपनी राह बना चलते.
हैं वो ऊँची किस्मत वाले, जो जीवन में सब सुख पाते,
लेकिन ऐसे भी लोग यहाँ, जिनके सुख सपनों में बसते.**

हर दिन की मुश्किल से आम आदमी परेशान है,
आज तक भी गुम नारी की पहचान है,
नौकरी विहीन निराश नौजवान है,
फिर कैसे कह दें? ये देश महान है!

बन्दूकों से जूझता कश्मीर का नादान है,
कई प्रान्तों को मिला आपदा का वरदान है,
हर कहीं लूटती गरीबों की जान है,
फिर—-

प्राणियों विहीन हर जंगल वीरान है,
गाँव की चौपालें खामोश सुनसान हैं,
कर्ज मे डूबा हर गाँव का किसान है,
फिर—-

भौतिकता की चीजों से भरी हर दुकान है,
आम लोगों को न मिलता जरूरी सामान है,
मजबूरी मे बेचता बन्दा ईमान है,
फिर—

पैसे वालों की देखो कोठी आलीशान है,
आम जनता के उपर खुला आसमान है,
गरीबों के लिये मुसीबतों का जहान है,
फिर—

मन्दिरों मे पहले जैसा नही भगवान है,
खुदा नही सुनता अब कोई अजान है,
न ही सुनता ईसा, न ही सुलेमान है,
फिर–

गाँव तो आज भी विज्ञान से अनजान है,
कई जगहों मे फैला अभी भी अज्ञान है,
गुम यहाँ बाइबिल, गीता और कुरान है,
फिर—

भारत में कम होता अब अभिमान है,
सुभाष और गाँधी की कम होती शान है,
युवावों के आदर्श संजय, सलमान हैं!!
फिर–

बुद्दिजीवी का तो बस खुद पर ही ध्यान है,
 शिक्षित नहीं करता अपनी शिक्षा का दान है,
गाँव मे जो कम पढा़, सेना का जवान है!
फिर—

नेताओं के कोष में न लिखा बलिदान है,
कछुए की चाल से चलता विधान है,
पाप करके घूमता बेरोक हैवान है,
फिर—

ये हों या वो, सब नेता एक समान हैं,
प्रधानमन्त्री के उपर एक और भी कमान है!
एक कुर्सी छोडने को कहते बलिदान हैं!!
फिर–

लोगों के घर नहीं दीवारों के मकान हैं,
जाने कहाँ गुम हुई लोगों की मुस्कान है,
मुझे नही कहना——

मुझे नही कहना——

उफ्फ! ये कहाँ आ गये हम!! January 24, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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कुछ दिनों पहले जब मै हिन्दी चिट्ठा-जगत से परिचित हुई और अपना लिखना शुरु किया तब मुझे हिन्दी टाइपिंग बिल्कुल भी नही आती थी और लगता था जैसे-तैसे कुछ लिख भी लिया तो पढे़गा कौन? जबकि यहाँ सब लोग इतना अच्छा लिख रहे हैं!!…लेकिन फिर टाइपिंग की गति भी तेज़ होती गई और न ही कभी लिखने के विषयों की समस्या आई और न ही पाठकों की! तो ये पढने लिखने का सिलसिला बदस्तूर जारी है! किताबों और पत्रिकाओं से अलग ये दुनिया बहुत आकर्षक है और जानकारी से भरपूर भी!..लेकिन अब अन्य जिम्मेदारियों और रूचियों और चिट्ठों का तालमेल मुश्किल होता जा रहा है….देखिये कितनी दुविधा है…

(** यदि आप हिन्दी चिट्ठा-जगत के बारे मे ज्यादा नही जानते तो ये पोस्ट पढकर समय न गवाएँ, हाँ! अगली पोस्ट पढने फिर से यहाँ जरूर आएँ!!**)

//किसको छोडूँ, क्या पढ डालूँ!
  यहीं रहूँ या विदा कह दूँ!! //

‘रत्ना की रसोई’ से व्यन्जनों की खूशबू आती है,
तो ‘मुन्ने की माँ’ ‘छुट-पुट’ बातें बताती हैं!

किसी की ‘चौपाल‘ पर बैठ ‘पानी के बताशे’ खाएँ,
या किसी के साथ गीतों की ‘एक शाम’ बिताएँ!

कोई ‘आईना’ दिखाता है तो कोई ‘मेरा पन्ना’,
कोई ‘दस्तक‘ देता है तो किसी को है ‘कुछ कहना’!

‘जो कह नही सकते’ वे हैं ‘छायाकार’,
और ‘देसी-टून्ज़’ बनाने वाले ‘रचनाकार‘!

‘फुरसतिया‘ जी के फुरसत से लिखे लेख पढें,
या ‘कविराज‘ पर टिप्पणी के रुप मे अपने ‘हायकू‘ गढें!

अफलातून सुनाते हैं ‘शैशव’ की बातें,
तो शुएब की होती हैं ‘खुदा‘ से मुलाकातें!

‘किसी की नजर से दुनिया’ देखें,
या फिर ‘सृजन शिल्पी’ जी का शब्द-सृजन परखें!

देखना है, ‘की बोर्ड के सिपाही’ किस मोर्चे पर खडे हैं,
या ‘जोगलिखी‘ के ‘मन्तव्य‘ किस बात पर अडे़ हैं!

‘ई-पंडित’ के पास जाकर उनसे ले ज्ञान,
या फिर ‘उन्मुक्त‘ के ‘लेख‘ से सीखें विज्ञान!

देखना है ‘उड़न तश्तरी’ किस मुद्दे पर मँडरा रही है,
या फिर ‘गीत-कलश’ से किस गीत की आवाज आ रही है!

आशीष करते ‘चिन्तन‘ तो ‘प्रियंकर‘ कविता हैं पढ़वाते,
तो ‘खालीपीली‘ ‘अन्तरिक्ष’ की बातें बताते!
तेजी से भागता ‘तरकश’ पढें या कि रुका हुआ ‘निरन्तर“!!
या सुने ‘प्रत्यक्षा‘ की बातें, जो कहतीं रह्-रह कर!!

शुक्र है ‘रोजनामचा‘ और ‘हिन्दिनी‘की रफ्तार धीमी है,
और अब तो कभी-कभी ही होती ‘नुक्ताचीनी‘ है!!!!

पुनश्च: —
अविनाश की टिप्पणी ( उन्हे क्यूँ छोड दिया?)पर —

अविनाश के “मुहल्ले” की भी “जुगाड” कर लेते हैं,
आओ! “सुख सागर” की कथाएँ भी पढ लेते हैं!

देखें दिव्याभ का ‘डिवाइन इन्डिय़ा”,
और फिर बेजी की “कठपुतलियाँ”!

सुने प्रेमलता जी की ‘मन की बात’,
या करें ‘रजनीगन्धा’ से मुलाकात!

क्या कहा? इन सब के चिट्ठों की लिन्क चाहिये?
जनाब मुझ पर जरा-सा तो रहम खाईये!

“नारद” या “चिट्ठा-चर्चा” के चक्कर लगाइये,
वहीं से सारी लिन्क पाईये!!

अब भी जो रह गये हैं, वे सब भी मुझे पसन्द हैं,
लेकिन भाईयों अब मेरे लेखन के उत्साह की गति मन्द है!

अब आप ही मेरी मदद को आगे आओ!
अपने लिये एक दोहा आप भी तो बनाओ!!

….ओहह! अभी भी कई लोग रह गये हैं..लेकिन अब ये आवाजें सुननीं होंगी…..

बेटी कह रही है- माँ, मुरब्बे के लिये आँवले कब लाओगी!
पिताजी पूछ रहे हैं-नीबू का अचार कब बनाओगी?!!

तो अब चिट्ठों की दुनिया से दूर जाना होगा!
पहले मुरब्बा और अचार बनाना होगा!!!!

आस्था का कुम्भ January 20, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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 जब हम सन २००२ में नासिक रहने के लिये आये तब ये शहर २००३ में होने वाले ‘महा कुंभ’ की तैयारियों मे जुटा था. नई सडकें बन रही थीं और सार्वजनिक स्थानों पर साफ-सफाई और सुधार का काम चल रहा था. नासिक में ‘पंचवटी’ नामक एक जगह है जहाँ गोदावरी के घाट पर कई पुरातन मन्दिर हैं. मई के महीने में जब मैं वहाँ गई तो मुझे वो स्थान देखकर बेहद निराशा हुई. बहुत गन्दगी थी घाट पर. अत्यधिक संख्या मे भिखारी थे. नदी मे पानी काफी कम था और कुछ मुख्य मन्दिरों को छोडकर बाकी मन्दिर निराशाजनक स्थिति मे थे.हालांकि पर्यटक उन दिनों  भी आते हैं यहाँ पर.

वहीं एक मन्दिर मे हमे एक वृद्ध मिले, उनसे हमने एक मन्दिर के बारे मे पूछा तो फिर ये जानने के बाद कि हम इस शहर में नए-नए आए हैं, उन्होंने हमें तमाम जानकारियाँ और कई कथाएँ सुनाईं. उनकी सारी बातें हम ध्यान से सुनते रहे क्योंकि उनके पहले वाक्य से ही हमारा मन प्रसन्न हो गया था! उन्होने कहा था कि हमने बहुत पुण्य किये हैं तभी हमें भगवान ने तब नासिक आने का अवसर दिया है, जब यहाँ कुंभ होने वाला है! और उस वर्ष कुछ विशेष तिथियों पर अतिविशिष्ट संयोग (ग्रहों आदि के)बने थे जो कई सौ सालों में बनते हैं.नासिक में कुंभ मेला तब होता है जब ‘गुरु’ सिंह राशि मे प्रवेश करता है. और ऐसा हर बारह वर्ष के बाद हिन्दू केलेन्डर के हिसाब से ‘श्रावण’ माह मे होता है. उस वर्ष संयोग से उस दिन ३० ता. थी तो “न्यूमरोलाजी” के हिसाब से भी अंक ‘३’ गुरु ग्रह का अंक है और ‘०’याने अनन्त, तो गुरु की शक्ति अनन्त थी!

‘पंचवटी’ स्थान का यह नाम यहाँ स्थित ५ वट (बरगद) वृक्षों की वजह से है, जो आज भी विद्यमान हैं!स्थानीय लोग गोदावरी को गंगा ही कहते हैं और घाट को ‘गंगाघाट’ ही कहते हैं. कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ राजा भगीरथ की तपस्या के बाद गंगा धरती पर आई और राजा के पूर्वज पुनर्जीवित हुए.(** नासिक से २८ कि.मी. दूर त्रयम्बकेश्वर मे एक पर्वत ब्रम्हगिरि है जहाँ एक जगह पर कुछ निशान दिखाई देते हैं जिन्हे शंकर भगवान की जटा कहा जाता है, जिसमें उन्होंने स्वर्ग से उतरी गंगा को धारण किया था.एक कथा के अनुसार गंगा को अपने अतिवेग का घमन्ड हो गया था और उसे यह श्राप दिया गया कि उसका उद्गम एक जगह से नहीं होगा. अत: उसी पर्वत पर दो-तीन छोटे-छोटे मन्दिर हैं जहाँ से गोदावरी(गंगा) का उद्गम बताया जाता है.**)

पंचवटी के घाट पर ‘रामकुन्ड’, ‘लक्ष्मण कुन्ड’, आदि है जहाँ स्नान का विशेष महत्व है. यहीं एक छोटा सा मन्दिर है जो बारह वर्ष मे एक बार कुंभ मेले के समय ही खुलता है.कथा के अनुसार बारह वर्ष में एक बार गंगा नदी अपनी बहन गोदावारी से मिलने यहाँ आती है.ये मन्दिर एक वर्ष तक खुला रहता है.नासिक के कुंभ का महत्व भी एक पूरे वर्ष तक रह्ता है. हालाँकि किन्ही विशेष दिनों मे स्नान का महत्व कुछ बढ जाता है.

ये जानकारी मैने पढ़ या सुन कर अपनी याददाश्त के अनुसार बताईं. अब कुछ अन्य बातें.

 जब कुंभ मेला शुरु होने ही वाला था उससे पहले हमारे घर में ‘कोड आफ कन्डक्ट’ बन गये, मसलन हमें कहा गया कि जो घर मे पानी आता है वो गोदावरी का ही है,तो घाट पर जाकर डुबकी लगाने की कतई जरूरत नहीं है, और हम कोई शाही लोग नहीं हैं तो किसी शाही स्नान में शरीक होने की जरूरत नहीं है! अपने रिश्तेदारों को फोन पर ही स्पष्ट कह दें की वो किसी खास दिन डुबकी लगाने की जिद लेकर ना आयें, बाकी साल भर में कभी भी आ सकते हैं! और इसी तरह कई और बातें.

कुंभ शुरु होने के कुछ दिनों पहले कुछ मेहमानों के साथ मै पंचवटी गई. देखा सब कुछ पहले से बहुत बदला था. काफी बारिश हो चुकी थी नदी में बहुत पानी थी और सब कुछ इतना साफ-सुथरा की मुझे लगा मै नई जगह देख रही हूँ! मेहमानो की इच्छानुसार हम कपडे लेकर गये ही थे. इतनी बेहतर व्यवस्था देखकर हमने भी डुबकी लगा ही ली! और जब हम पुण्य कमा ही चुके थे तो अपने आप घर के पुरुष वर्ग को भी पुण्य दिलाने के लिये बोतल में पानी भरकर ले आये!! फिर तो हर विशेष महत्व की तिथियों के दिन गोदावरी बोतल से निकल कर बाल्टी में होती और घर में ही शाही स्नान होते!! वहाँ उस दिन तट पर मैंने देखा कि दक्षिण से आई एक महिला कुछ बोल कर कई सारी डुबकियाँ लगाती जा रही हैं! मेरी आँखों के आश्चर्य मिश्रित प्रश्न को भाँपते हुए उन्होंने कहा कि ये सब डुबकियाँ वे अपनी मित्रों और रिश्तेदारों के लिये लगा रही है, जो यहाँ नही आ पाये हैं. कमाल की अस्थाओं का है हमारा देश!

ऐसी ही एक आस्था लिये गुजरात से एक दम्पत्ति हमारे पडोस वाले मकान मे रहने आये.उन्हें चार महीने नासिक में रहकर बस पूजा-पाठ करने थे.उन्हें मराठी बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी और हिन्दी भी ठीक से नहीं आती थी.मुझे गुजराती और मराठी दोनो भाषा आने के चलते मैं ही रोज लगने वाली आम बातों मसलन सब्जी,दूध,घर का काम करने के लिये नौकरानी , आदि के लिये उनकी सहायता हेतु दुभाषिये का काम करती. वे रोज नदी की किनारे की रेती लाकर, उसके कई शिवलिंग बनाकर ३-४ घन्टे उसकी पूजा करते और शाम को फिर नदी में जाकर विसर्जित करते! फिर उनकी दिनचर्या नियमित हो गई और मैं अपने में व्यस्त हो गई कुछ ४-५ दिनों बाद उनकी तबियत थोडी़ बिगड़ गई, उन्हे लगा शायद हवा-पानी बदलने की वजह से ऐसा हुआ है, लेकिन तबियत ज्यादा बिगड़ती ही चली गई..उन्हे अस्पताल में भर्ती करवाना पडा..मुझे ये पता तब चला वे आये और उन्होंने कहा कि क्या मैं उनकी पत्नी के पास अस्पताल में कुछ देर रुक सकती हूँ क्यूँ कि उन्हे अपनी पूजा आज पूरी करनी है और वे अब वापस जाने का मन बना चुके हैं..मैं अस्पताल पहुँची तो वे मुझे देखकर रोने लगीं, डीहाइड्रेशन की वजह से उनकी हालत बहुत कमजोर लग रही थी और उन्हें घबराहट हो रही थी. आसपास के लोगों को लगा कि मैं उनकी रिश्तेदार हूँ और उन्होंने लगभग डाँटते हुए ये जताया कि मै कितनी लापरवाह हूँ.जिस तरह से वो मेरा हाथ पकडे थीं..और मेरे मन मे भी उन्हें कुछ हो जाने का डर था…मैने भी नही कहा कि ये मेरे और मै इनके बारे में ज्यादा कुछ नही जानते, हमारा रिश्ता सिर्फ उतना ही है जितना एक इन्सान का दूसरे इन्सान के लिये होना चाहिये!!

कुछ दिनों बाद मेरा भाई, और भाभी आये.भाई जो एक “ग्लोबलाइजर”(* बताऊँगी ये कौन होते हैं!)है, जो ‘हाइजीन’ और ‘पॉल्यूशन’ जैसे जुमले इस्तेमाल करने लगा है, ने आते ही घोषणा कर दी कि उसने रेलवे-स्टेशन पर तरह-तरह के जटाधारी साधुओं को देखा है और उसकी जानकारी मे उसने कोई भी एसा पाप नही किया है जो उसे डुबकी लगा लगाकर धोना है, तो वो इसी शर्त पर हमारे साथ चलेगा कि उसे नहाने को बाध्य नही किया जायेगा, मै और भाभी जितनी चाहे डुबकियाँ लगाने को स्वतंत्र हैं! उस दिन भी हमारा भाग्य अच्छा था, वो विशेष तिथियों के बीच का समय था तो फिर साफ सफाई हुइ थी,बारिश की वजह से छोटे-छोटे पुलों के ऊपर से बहता तेज़ पानी देखकर वहाँ पहुँच कर नदी मे उतरने वाला सबसे पहला मेरा भाई था. हमने बहुत मजे किये!

तो इसी तरह सारे साल भर हमने खूब डुबकियाँ लगाइ और परोक्ष-अपरोक्ष रूप से पुण्य कमाते रहे! और हमारा और हमारे परिवार का मोक्ष कर लिया पक्का!!!

जीवन.. January 17, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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// थोडे-से सुख, थोडे-से दुख, थोडे सपने थोडी आशा!
   इनसे ही बनता है जीवन, ये ही जीवन की परिभाषा!! // 

जीवन मे हम सबको यूँ ही बस आना है,
थोडा ठहर करके फिर सबको जाना है.
थोडा-सा हँसना, और् थोडा-सा रोना है,
अपने-अपने कर्म हम सबको करना है.
हर माँ को अपना एक घर बसाना है,
अपने घरों के लिये पिता को कमाना है.
जीवन हो अच्छा सो बच्चों को पढना है,
बूढों को मृत्यु का इन्तजार करना है.
लोग आते-जाते हैं धरती को थमना है,
रोशनी फैलाने को सूरज को उगना है.
चाहे गिरे कोई पर्वतों को डटना है,
रूक जाए सभी फिर भी हवा को तो चलना है.
पानी जरूरी है नदियों को बहना है,
सबके भोजन के लिये पौधों को बढना है.
तारों को हर रात यूँ ही टिमटिमाना है,
चंदा को हर पल यूँ ही घटना-बढना है.
सदियों से आज तक सबने ही माना है,
निश्चित है सब यहाँ! ना कुछ बदलना है!
जीवन मे हम सबको यूँ ही बस आना है,
थोडा ठहर करके फिर सबको जाना है!!

चाहत January 13, 2007

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//ये भी कर लूँ, वो भी कर लूँ, चाहत मेरी है मोटी-सी,
चाहत को पूरी करने को एक जिन्दगी छोटी-सी!//

मेरा भगवन हर जीव मे हो, हर जीव से हों मेरे नाते
उस धर्म को मै अपनाना चाहूँ, जहाँ क्षमा-दया के तप करते!
उस देश मे मै रहना चाहूँ, जहाँ प्राणी अपना हक पाते
उन कामों को करना चाहूँ, जिनसे मानव के हित होते!
उस शाला मे जाना चाहँ, जहाँ मानवता हो सिखलाते
उस पुस्तक को पढना चाहूँ, जहाँ हर मुश्किल के हल मिलते!
उस गद्य को मै लिखना चाहूँ, जहाँ जीवन के पाठ लिखे जाते
उस पद्य को मै गाना चाहूँ, जहाँ प्रकृति के हों गुण गाते!
उस कथा को मै सुनना चाहूँ, जहाँ प्यार के सन्देशे मिलते
उस रस्ते पर चलना चाहूँ, जो मोक्ष-द्वार तक पहुँचाते!!

चिडिया January 11, 2007

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..यूँ तो शहरों के विकास के साथ  हरे पेड धीरे धीरे गुम हो रहे हैं और इन्ही के साथ हमारे जीवन से चिडिया, गिलहरियाँ आदि नन्हे जानवर भी गुम होते जा रहे हैं लेकिन सौभाग्य से मेरे घर के आस-पास कई बडे पेड अब भी हैं, घर मे घोंसला बनाने वाली चिडिया तो अब दिखाई नही देती लेकिन दूसरी छोटी-छोटी चिडिया दिखाई दे जाती है…पिछले दिनों समीर जी की “एना” के बारे मे पढा और कल ही ‘परिचर्चा’ पर घुघुति बासुति जी की भी चिडिया पर एक कविता पढी. समीर जी से ही प्रेरित हो मैने अपनी नन्ही चिडिया मित्र के लिये ये पन्क्तियाँ लिखीं——

 बडे बाग के बडे पेड पर छोटी चिडिया रहती है,
मौज-मजे से जीवन जी लो, सबसे वो ये कहती है
दाना चुनती, तिनका चुनती,तिनके से अपना घर बुनती,
आँधी आये,या फिर तूफाँ, सबसे डटकर लडती है!
हल्का फुल्का तन है उसका,चपल और चन्चल मन है उसका
छुपकर कभी ना घर मे बैठे, हरदम आगे रहती है!
खूब भरा है साहस उसमे, खूब भरी है हिम्मत उसमे,
है खुद पर विश्वास गजब का, कभी नही वो डरती है!
उस जैसा साहस मै चाहूँ, उस जैसा सन्कल्प मै चाहूं,
तपती धूप और भारी बारिश जाने कैसे सहती है!
कभी नही वो घबराती है, कभी नही वो थक जाती है,
नन्हे पंखों से उडकर वो नभ को टक्कर देती है!!
बडे बाग के बडे पेड पर छोटी चिडिया रहती है,
मौज-मजे से जीवन जी लो, सबसे वो ये कहती है!
——

चुनाव…….. January 9, 2007

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पिछले कुछ दिनों से हिन्दी चिट्ठा-जगत मे श्रेष्ठ चिट्ठाकार के चुनाव की चर्चा रही..कई चिट्ठे और टिप्पणियाँ चुनाव को समर्पित रहे…चुनाव के नतीजे भी आ गये, जो लोग चुनाव मे जीते हैं वो श्रेष्ठ तो पहले से ही थे अब प्रमाणित श्रेष्ठ हो गये हैं!!
इधर महाराष्ट्र मे भी चुनाव की गहमा गहमी है..आईये आपको दिखाती हूँ एक गाँव का दृष्य, जहाँ नेता जी चुनाव के दौरान आने वाले हैं……

गाँव मे खेला जाने वाला था वोट माँगने का खेला,
सारे गाँव मे था लोगों का रेला ही रेला,
मानों गाँव मे लगा था बडा सा मेला,
हर तरफ भीड थी, झमेला ही झमेला!

सरकारी महकमा फूला नही समाया,
कई दिनों बाद, अब हरकत मे आया!

गाँव का रामू, सीधा-साधा इन्सान,
इतनी हलचल देखकर खूब था हैरान!
रामू ने गाँव के समझदार की तरफ दौड लगाई,
उसे अपनी सारी जिज्ञासा बत्ताई.
पूछा-
‘गाँव को ये क्या हो गया है?
दो ही दिन मे इतना कैसे बदल गया है?
क्या कहीं से कोई आ रहे हैं?’

मुखिया ने कहा-
‘हाँ भाई हाँ! कई नेता पधार रहे हैं!

रामू ने पूछा-
‘नेता कैसे होते हैं?’

मुखिया बोले-
‘कहने को तो इन्सान जैसे ही होते हैं!
झकाझक कपडे, पेट सामान्य से बडे होते हैं!
आस-पास कई चेले और सन्तरी खडे होते हैं!
सफेद कपडे हैं, क्यों कि उनमे कर्मों के दाग छुपाना है!
पेट बडे हैं, क्यों कि उनमे घोटालों को समाना है!!’

रामू बोला-
‘क्या इनके आने से अपनी हालत बदलेगी?’

मुखिया ने जवाब दिया-
‘ पागल हो क्या? हमारी हालत तो वैसी ही रहेगी!
बदलनी ही है तो इन्ही की बदलेगी!!
ये भला हमे क्या देंगे?
उलटे हमसे वोट ले लेंगे!
ज्यादा से ज्यादा एक सडक बनवाएँगे,
और उसके नाम पर सालों तक वोट हथियाएँगे!

रामू बोला-
‘सुना है इनकी कृपा से गाँव का भला होता है?’

मुखिया बोले-
‘एसा वही कहता है, जो इनका पला होता है!!
इनकी बातों का तू मत होने दे असर,
यकीन करना ही है तो अपने आप पर कर!!
तू क्या समझता है? ये किस्मत बदल देंगे?
जो भगवान ने नही किया, वो ये कर देंगे?
इनके बहकावे मे तू बिल्कुल मत आना!
कहीं का नही रहेगा, जो इनकी बात माना!!

अब रामू सब कुछ समझ गया…उसने ये कहा—
तो ये वही हैं, जो देश को —- रहे हैं?’
ओह!! शहर तो निगल गये, अब गाँव —– आ रहे हैं!!!!
——————-

अन्त मे श्रेष्ठतम चिट्ठाकार ‘समीर जी’ को ये पन्क्तियाँ भेंट करना चाहती हूँ!
(** समीर जी, आपकी(और मेरी भी!) एक पुरानी पसंदीदा कविता की पन्क्तियाँ बदलकर कुछ लिखा है, आशा ही नही, विश्वास भी है कि आप इसे “अन्यथा” नही लेंगे!)

जनता मुझको कुर्सी दे दे , मै नेता बन जाऊँगा,
अपनों को बाँटूंगा दौलत, मै भी धनी हो जाऊँगा!

काम-धाम कुछ नही करूँगा, मौज-मजे और एश करूँगा,
एक मुझे तू माईक ला दे, भाषण खूब सुनाऊँगा!
जनता मुझको—

कलफ लगे कपडे पहनूँगा, कई-कई कारें रखूँगा,
प्लेन का तू टिक़िट दिलवा दे, विदेश सैर कर आऊँगा!
जनता मुझको—-

अतिक्रमण कर घर बाधूँगा, विदेशों मे खाते खोलूँगा,
एक बार मन्त्री बनवा दे, जीवन भर सुख भोगूँगा!!
जनता मुझको—-
—————