चिडिया January 11, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.trackback
..यूँ तो शहरों के विकास के साथ हरे पेड धीरे धीरे गुम हो रहे हैं और इन्ही के साथ हमारे जीवन से चिडिया, गिलहरियाँ आदि नन्हे जानवर भी गुम होते जा रहे हैं लेकिन सौभाग्य से मेरे घर के आस-पास कई बडे पेड अब भी हैं, घर मे घोंसला बनाने वाली चिडिया तो अब दिखाई नही देती लेकिन दूसरी छोटी-छोटी चिडिया दिखाई दे जाती है…पिछले दिनों समीर जी की “एना” के बारे मे पढा और कल ही ‘परिचर्चा’ पर घुघुति बासुति जी की भी चिडिया पर एक कविता पढी. समीर जी से ही प्रेरित हो मैने अपनी नन्ही चिडिया मित्र के लिये ये पन्क्तियाँ लिखीं——
बडे बाग के बडे पेड पर छोटी चिडिया रहती है,
मौज-मजे से जीवन जी लो, सबसे वो ये कहती है
दाना चुनती, तिनका चुनती,तिनके से अपना घर बुनती,
आँधी आये,या फिर तूफाँ, सबसे डटकर लडती है!
हल्का फुल्का तन है उसका,चपल और चन्चल मन है उसका
छुपकर कभी ना घर मे बैठे, हरदम आगे रहती है!
खूब भरा है साहस उसमे, खूब भरी है हिम्मत उसमे,
है खुद पर विश्वास गजब का, कभी नही वो डरती है!
उस जैसा साहस मै चाहूँ, उस जैसा सन्कल्प मै चाहूं,
तपती धूप और भारी बारिश जाने कैसे सहती है!
कभी नही वो घबराती है, कभी नही वो थक जाती है,
नन्हे पंखों से उडकर वो नभ को टक्कर देती है!!
बडे बाग के बडे पेड पर छोटी चिडिया रहती है,
मौज-मजे से जीवन जी लो, सबसे वो ये कहती है!
——
बस ऐसे ही कविता की तळाश है आज के
नौजवानों को…जिसमें कुछ कर गुजरने की
चाहत हो…परेशानियों में हीं न उलझे रहें…
संधर्ष को साथी बनायें…सुंदर व्यंजना एक
मौलिक कविता…
सुंदर रचना.एक सार्थक संदेश के साथ. बधाई.
सहज सरल सुन्दर चित्रण है आप करें स्वीकार बधाई
अभिनन्दन समीर का भी है, जिसने यह पंक्तिं लिखवाई
सीधे सादे भोले भाले भावों को जो लिख जाती है
सत्य मानिये वही एक कविता होती मन को सुखदाई
बहुत ही सुन्दर रचना ।
अच्छी लगी आपकी ये कविता !
बहुत-बहुत धन्यवाद आप सभी का, छोटी और सरल भावों वाली कविता पसन्द करने का.
Saral kavita,
jatil bhav,
aage padhne ki ikshaa…
ये कविता बहुत अच्छी लगी! सहज, सरल, सुंदर! इसे लिखने के लिये बधाई!
@ रविन्द्र जी और अनूप जी, बहुत धन्यवाद्.