चाहत

//ये भी कर लूँ, वो भी कर लूँ, चाहत मेरी है मोटी-सी,
चाहत को पूरी करने को एक जिन्दगी छोटी-सी!//

मेरा भगवन हर जीव मे हो, हर जीव से हों मेरे नाते
उस धर्म को मै अपनाना चाहूँ, जहाँ क्षमा-दया के तप करते!
उस देश मे मै रहना चाहूँ, जहाँ प्राणी अपना हक पाते
उन कामों को करना चाहूँ, जिनसे मानव के हित होते!
उस शाला मे जाना चाहँ, जहाँ मानवता हो सिखलाते
उस पुस्तक को पढना चाहूँ, जहाँ हर मुश्किल के हल मिलते!
उस गद्य को मै लिखना चाहूँ, जहाँ जीवन के पाठ लिखे जाते
उस पद्य को मै गाना चाहूँ, जहाँ प्रकृति के हों गुण गाते!
उस कथा को मै सुनना चाहूँ, जहाँ प्यार के सन्देशे मिलते
उस रस्ते पर चलना चाहूँ, जो मोक्ष-द्वार तक पहुँचाते!!

Published in: on January 13, 2007 at 4:40 pm Comments (10)

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10 Comments Leave a comment.

  1. ख़ुदा के सिरीज़ पढ़ पढ़ कर शायद आपकी चोस बदल रही है रचनादी ;) समईली पर ध्यान रहे :)

  2. सुंदर रचना है …रचना जी

    बधाई !!

    रीतेश गुप्ता

  3. माया से निर्वाण की आकांक्षा कुछ करतब
    फिर प्रयाण की आशा…अच्छी है यह कविता
    एवं इसके तत्व…।

  4. अति सुंदर । बहुत ही अच्छी रचना है।

  5. @ शुएब भाई, स्माईली पर ध्यान रखते हुए भी मै ठीक से समझ नही पाई कि आप किस बारे मे चाॅइस बदलने की बात कह रहे हैं? खैर इन दिनों मै कुछ ज्यादा पढ ही नही पा रही हूँ, खुदा की सीरीज भी नही!
    @ रीतेश, दिव्याभ एवं प्रभाकर जी, धन्यवाद.

  6. सुंदर रचना!!

  7. मैं क्षमा चाहूंगा रचना बेहन कि शब्द ‘सोच’ को गलती से ‘चोस’ लिख दिया – आपकी ये रचना बढा जो मुझे बहुत अच्छी लगी – हमेशा की तरह आपकी तारीफ करने की बजाए मैं मज़ाक पर उतर आया क्षमा चाहता हूं।

  8. आपकी ये रचना पढा मुझे बहुत अच्छी लगी

  9. ईश्वर आपकी सारी सदिक्षायें पूरी पूरी करे।

  10. @ समीर जी, सन्जीव जी और अनूप जी बहुत शुक्रिया!

    @ शुएब भाई क्षमा की कोई बात नही..दरअसल मैने ठीक से समझा ही नही! मजाक कर सकते हैं, कोई समस्या नही!


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