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चाहत January 13, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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//ये भी कर लूँ, वो भी कर लूँ, चाहत मेरी है मोटी-सी,
चाहत को पूरी करने को एक जिन्दगी छोटी-सी!//

मेरा भगवन हर जीव मे हो, हर जीव से हों मेरे नाते
उस धर्म को मै अपनाना चाहूँ, जहाँ क्षमा-दया के तप करते!
उस देश मे मै रहना चाहूँ, जहाँ प्राणी अपना हक पाते
उन कामों को करना चाहूँ, जिनसे मानव के हित होते!
उस शाला मे जाना चाहँ, जहाँ मानवता हो सिखलाते
उस पुस्तक को पढना चाहूँ, जहाँ हर मुश्किल के हल मिलते!
उस गद्य को मै लिखना चाहूँ, जहाँ जीवन के पाठ लिखे जाते
उस पद्य को मै गाना चाहूँ, जहाँ प्रकृति के हों गुण गाते!
उस कथा को मै सुनना चाहूँ, जहाँ प्यार के सन्देशे मिलते
उस रस्ते पर चलना चाहूँ, जो मोक्ष-द्वार तक पहुँचाते!!

Comments»

1. SHUAIB - January 13, 2007

ख़ुदा के सिरीज़ पढ़ पढ़ कर शायद आपकी चोस बदल रही है रचनादी ;) समईली पर ध्यान रहे :)

2. रीतेश गुप्ता - January 13, 2007

सुंदर रचना है …रचना जी

बधाई !!

रीतेश गुप्ता

3. Divyabh - January 13, 2007

माया से निर्वाण की आकांक्षा कुछ करतब
फिर प्रयाण की आशा…अच्छी है यह कविता
एवं इसके तत्व…।

4. Prabhakar Pandey - January 14, 2007

अति सुंदर । बहुत ही अच्छी रचना है।

5. rachana - January 14, 2007

@ शुएब भाई, स्माईली पर ध्यान रखते हुए भी मै ठीक से समझ नही पाई कि आप किस बारे मे चाॅइस बदलने की बात कह रहे हैं? खैर इन दिनों मै कुछ ज्यादा पढ ही नही पा रही हूँ, खुदा की सीरीज भी नही!
@ रीतेश, दिव्याभ एवं प्रभाकर जी, धन्यवाद.

6. समीर लाल - January 14, 2007

सुंदर रचना!!

7. SHUAIB - January 14, 2007

मैं क्षमा चाहूंगा रचना बेहन कि शब्द ‘सोच’ को गलती से ‘चोस’ लिख दिया - आपकी ये रचना बढा जो मुझे बहुत अच्छी लगी - हमेशा की तरह आपकी तारीफ करने की बजाए मैं मज़ाक पर उतर आया क्षमा चाहता हूं।

8. sanjeev - January 14, 2007

आपकी ये रचना पढा मुझे बहुत अच्छी लगी

9. अनूप शुक्ला - January 14, 2007

ईश्वर आपकी सारी सदिक्षायें पूरी पूरी करे।

10. rachana - January 17, 2007

@ समीर जी, सन्जीव जी और अनूप जी बहुत शुक्रिया!

@ शुएब भाई क्षमा की कोई बात नही..दरअसल मैने ठीक से समझा ही नही! मजाक कर सकते हैं, कोई समस्या नही!