jump to navigation

फिर कैसे कह दें? January 26, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
trackback

 आँकडे बताते हैं कि भारत तेजी से आर्थिक विकास के पथ पर अग्रसर है..लेकिन क्या समग्र सामाजिक विकास के बिना इस तरह की आर्थिक उन्नति के कोई मायने हैं…विकसित कहलाने के मायने क्या लोगों के पास चमचमाती गाडियाँ या सेलफोन जैसी चीजों का होना है जिसे पाने की होड़ इस हद तक है कि अवयस्क बच्चे भी अपराधों की ओर बढ़ रहे हैं…व्यवस्था को बाजार और लोगों को उपभोक्ता के रूप में देखा जाना क्या विकास है..

** पैसों की माया वालों का तो ध्यान सभी जन हैं रखते,
मै उनका सोचा करती हूँ, जो फुटपाथों पर ही रह्ते.
जो फूल खिले हैं वृक्षों पर, उनको तो लोग सभी तकते,
मै उन फूलों को चुनती हूँ, जो मुरझा कर नीचे गिरते.
हैं इस दुनिया में लोग बहुत, जो बहती धारा संग बहते,
मै उनको शीश झुकाती हूँ, जो खुद अपनी राह बना चलते.
हैं वो ऊँची किस्मत वाले, जो जीवन में सब सुख पाते,
लेकिन ऐसे भी लोग यहाँ, जिनके सुख सपनों में बसते.**

हर दिन की मुश्किल से आम आदमी परेशान है,
आज तक भी गुम नारी की पहचान है,
नौकरी विहीन निराश नौजवान है,
फिर कैसे कह दें? ये देश महान है!

बन्दूकों से जूझता कश्मीर का नादान है,
कई प्रान्तों को मिला आपदा का वरदान है,
हर कहीं लूटती गरीबों की जान है,
फिर—-

प्राणियों विहीन हर जंगल वीरान है,
गाँव की चौपालें खामोश सुनसान हैं,
कर्ज मे डूबा हर गाँव का किसान है,
फिर—-

भौतिकता की चीजों से भरी हर दुकान है,
आम लोगों को न मिलता जरूरी सामान है,
मजबूरी मे बेचता बन्दा ईमान है,
फिर—

पैसे वालों की देखो कोठी आलीशान है,
आम जनता के उपर खुला आसमान है,
गरीबों के लिये मुसीबतों का जहान है,
फिर—

मन्दिरों मे पहले जैसा नही भगवान है,
खुदा नही सुनता अब कोई अजान है,
न ही सुनता ईसा, न ही सुलेमान है,
फिर–

गाँव तो आज भी विज्ञान से अनजान है,
कई जगहों मे फैला अभी भी अज्ञान है,
गुम यहाँ बाइबिल, गीता और कुरान है,
फिर—

भारत में कम होता अब अभिमान है,
सुभाष और गाँधी की कम होती शान है,
युवावों के आदर्श संजय, सलमान हैं!!
फिर–

बुद्दिजीवी का तो बस खुद पर ही ध्यान है,
 शिक्षित नहीं करता अपनी शिक्षा का दान है,
गाँव मे जो कम पढा़, सेना का जवान है!
फिर—

नेताओं के कोष में न लिखा बलिदान है,
कछुए की चाल से चलता विधान है,
पाप करके घूमता बेरोक हैवान है,
फिर—

ये हों या वो, सब नेता एक समान हैं,
प्रधानमन्त्री के उपर एक और भी कमान है!
एक कुर्सी छोडने को कहते बलिदान हैं!!
फिर–

लोगों के घर नहीं दीवारों के मकान हैं,
जाने कहाँ गुम हुई लोगों की मुस्कान है,
मुझे नही कहना——

मुझे नही कहना——

Comments»

1. सृजन शिल्पी - January 26, 2007

वाह, भारत की मौजूदा हकीकत का बहुत सटीक तस्वीर खींचा है आपने।

2. dipu - January 26, 2007

हम उन्हीं महान लोगो कि सन्तान हैं
पर आज सभी बातो से हो गऐ अन्जान हैं
मै मानता हूं कि कुछ लोग नादान हैं
मगर ये नहीं मेरे देश कि पहचान हैं
क्यौं कि इस देश कि आप जैसे लोगो से हि जान हैं
आप जैसे यांहा और लोग भी चिन्तावान हैं
ईसीलीये राचना जि मेरा भारत माहान है
मेरा रोम रोम कहता है कि मेरा भारत महान है मेरा भारत महान है

devid17854@gmail.com

3. Divyabh - January 26, 2007

रचना जी एक मौलिक कविता कही है लेकिन मैं कविता के अंतरग
भाव से बिल्कुल खुश नहीं हुआ…मैं हर दिन ब्लाग पे भारत की दुर्दशा का हाल बयान होते देखता हूँ…बहुत कुढ़न होती है मुझे…क्यों आज हमारा पढ़ा लिखा वर्ग एकदम से भारत की बुरी ही तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रहा है…जबकि बुरे हम हैं न समाज,न राजनीतिक लोग…विकास हमेशा स्तरीकृत होता है…एक रिक्साचालक दिनभर कमाता है रात दारू पिकर सब लुटा देता है…दूसरा इन चिजों से दूर है वह कुछ बचाता भी है तो आने वाले 10 साल में
कौन पैसा वाला होगा…?अंबानी कोई ऐसे नहीं बनता उसके लिए कठोर श्रम व सधी युक्ति का होना अनिवार्य है…माफ कीजिएगा मैं भावुक हो गया…लिखा बहुत सुंदर है इस में दो राय नहीं…

4. मनीष - January 26, 2007

गाँव मे जो कम पढा, सेना का जवान है!

वाह ! क्या सटीक व्यंग्य छिपा है इस पंक्ति में ! कविता की दृष्टि से आपकी रचना काबिलेतारीफ है पर दिव्याभ की तरह ही कविता के पीछे के मूलभाव से मैं सहमत नहीं हूँ ।

जहाँ तक मेरा विचार है इस देश में समस्याएँ हैं पर फिर भी विकास हुआ है और वो कुछ हद तक ही सही पर नीचे तक पहुँचा है । सिर्फ समस्याओं को इंगित कर देने से वो हल नहीं हो जातीं । अगर आपको व्यवस्था में दोष नजर आता है तो उसके समाधान पर भी प्रकाश डालिए ।

5. rachana - January 26, 2007

@ सृजन शिल्पी जी, धन्यवाद.

@ दीपू जी, धन्यवाद आपके विचारों को उम्दा तरीके से रखने के लिये. मेरा प्रयास सिर्फ इतना ही था कि विकास की चकाचौन्ध मे हम समस्याओं को न भूल जायें.

@ दिव्याभ, आप दुखी न हो..मेरा प्रयास सिर्फ इतना ही था कि विकास की चकाचौन्ध मे हम समस्याओं को न भूल जायें..विकास होने का मुझसे बढिया उदाहरण और क्या हो सकता है?.मै एक साधारण आम स्त्री अन्तर्जाल का सहज उपयोग कर अपनी बात रख पा रही हूँ! लेकिन क्या मैने जो कहा वो उतना ही सच नही है, जितना की विकास की बातें? खैर,जैसे आप भावुक हो गये मै भी हो जाती हूँ और लिख डालती हूँ ठीक वही जो चल रहा होता है मेरे मन मे..

@ मनीष जी, जैसा मैने उपर ही कहा कि विकास का उदाहरण मै खुद ही हूँ…मुझे नही पता समाधान कैसे हो इन समस्याओं का, क्या इसीलिये बिल्कुल आँखें बन्द कर लेनी चाहिये? जो लोग पीछे रह गये हैं उन्हे साथ लेकर नही चला जा सकता?

6. अनूप शुक्ला - January 26, 2007

मैं तो यही कहूंगा कि ये दोनों कवितायें दो अलग-अलग पोस्ट में लिखी जाती तो अच्छा रहता। बाकी अच्छी लगीं दोनों कवितायें।

7. समीर लाल - January 27, 2007

मेरा मानना है (पूर्णत: व्यक्तिगत)( दिव्याभ भाई, कृप्या अन्यथा न लेना भाई और मै आपकी बात काटने का प्रयास कतई नहीं कर रहा क्योंकि मैं मानता हूँ आपका पहलू सकारात्मक दृष्टिकोण रख रहा है और वह एक बहुत आवाश्यक अंग है साहित्य का) कि कविता हमेशा से मनोभाव और मन के भीतर चल रहे अंतर्द्वदों को शाब्दिक जामा पहना कर समाज के सामने पेश करने की विधा रही है. जितना व्यवहारिक विकास की बात करना है, उतना ही व्यवाहरिक दोष दर्शन भी. दोष दर्शन के साथ उसका समाधान पेश करना मैं कतई जरुरी नहीं समझता, जब तक की दोष दर्शन मात्र दोष दर्शन के उद्देश्य से न किया गया हो. यह ठीक वैसा ही है कि मैं बताऊँ कि मुझे कम्प्यूटर मे क्या दोष दिखता है और मैं क्या चाहता हूँ. अर्थात जो कम्प्यूटर विधा के महारथी हों, वो बतायें कि क्या समाधान होना चाहिये मेरी सम्स्याओं का. आशा है मै अपना मत रख पाया हूँ. ज़ंत मे, रचना जी से, एक सुंदर कविता के लिये बधाई और आगे भी मनोभाव को स्वतंत्र रुप से प्रकाशित करते रहें, स्वागत होगा. आप में प्रतिभा है, अभी भी मान जायें और चिठ्ठा चर्चा शुरु करें. लेखनी को एक नया आयाम मिलेगा. सबने एक दिन पहली बार लिखा था, चाहे अनूप भाई जैसे धुरंधर हों या हम जैसे नौसिखिये.

8. SHUAIB - January 27, 2007

बहुत ख़ूब रचना जी, आपकी नज़र और विचार बहुत गहरे हैं। आज के हालात को आपने बारीकी से मगर बहुत अच्छे अंदाज़ मे बयान किया है।

9. rachana - January 28, 2007

@ अनूप जी, धन्यवाद. पहली कविता,दूसरी कविता लिखने का कारण बताने के लिये लिखी थी.

@ समीर जी, मेरी बात समझ पाने और उसे और स्पष्ट करने के लिये धन्यवाद. कभी-कभी अति आशावादिता से परे कडवे सच के करीब जाने का मन करता है और इसीलिये ऐसा लिख दिया, वरना “आव्हान” और “छोड निराशा आशा बाँधो” भी मैने ही लिखा है! और मेरे लेखन के प्रति आपके इतने विश्वास के लिये कृतज्ञ हूँ!

@ शुएब भाई, धन्यवाद.

10. मनीष - January 29, 2007

“दोष दर्शन के साथ उसका समाधान पेश करना मैं कतई जरुरी नहीं समझता”

समाधान से मेरा मतलब इसी कविता में समाधान दिखाना नहीं है । :)
एक बार फिर ये कहना चाहूँगा कि ये कविता अपने आप में पूर्ण है और बहुत अच्छी लिखी गई है । वैसे ये बात दिव्याभ और मैने पहले भी लिखी थी ।

मुझे दोष हम आप जैसे व्यक्तियों में नजर आता है जो इस व्यवस्था को चलाने के लिए उत्तरदायी हैं न कि बाजारी व्यवस्था में जिसका जिक्र रचना जी कर रही हैं । विश्व के कई देशों में ऐसी व्यवस्था में भी आम जन तक फायदा पहुंचा है । मेरी टिप्पणी इसी सोच को व्यक्त करने की कोशिश थी ।

11. समीर लाल - January 29, 2007

मनीष भाई
मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूँ. मैने इसी कविता पर मात्र अपनी सोच रखने का प्रयास किया है. कृप्या अन्यथा न लें जो कि मुझे पहले से ज्ञात है कि आप नहीं लेंगे. :) :)

12. rachana - February 3, 2007

@ मनीष जी और समीर जी, फिर से टिप्पणी के लिये शुक्रिया. अब हम ठीक से आपस मे एक दूसरे की बात को समझ गये हैं!!