तुम जहाँ कहीं भी हो.. February 5, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.trackback
…..कई बार व्यवस्था के प्रति जब हम सवाल उठाते हैं तो जाहिर है एक सवाल खुद अपने लिये भी होता है कि हम क्या कर रहे हैं! अपने आप को देने के लिये तो मेरे पास जवाब होता है लेकिन किसी और को बताने का औचित्य नही लगता क्यों कि जो मै और मेरा परिवार करते हैं वो बिल्कुल अनियोजित तरीके से( यानि जब जैसी मर्जी हो तब जितना हो सके वैसा कर दिया),बिना किसी योजना के तहत होता है मतलब जरूरत के महा सागर मे एक बूँद (या आधी ही समझ लें) भर! मेरे पिताजी कहा करते थे कि यदि कुछ अच्छा काम कर पाओ तो उसका हिसाब मत रखो और जितनी जल्दी हो सके भूल जाओ.वे हमेशा एसा किया भी करते थे. उनके असामयिक निधन के बाद कुछ अनजाने लोग हमारे घर आये तभी हमे इसका पता चला.
हममे से कई लोग शायद अपने अपने स्तर पर कुछ न कुछ करते हैं कुछ दिनो पहले आशीष और अनुराग ने अपने चिट्ठों पर इसका जिक्र किया भी है…
….सीमा मेरी एक छोटी मित्र थी. वो मेरे घर मे काम करने वाली कमला बाई की १२/१३ वर्षीय बेटी थी.उसके पिताजी नही थे और घर मे उससे और छोटे दो भाई थे.हमारे नये घर मे पहले दिन जब वो मुझसे पूछने आई कि मुझे काम वाली की जरूरत है क्या? तभी मुझे उसने आकर्षित किया और मैने उसे हाँ कहा.हालाँकि मेरी पडोसिनो ने मुझे उसे नही रखने की सलाह दी थी, कुछ तो जाति का चक्कर था और कुछ उसकी माँ के बीमार होने से होने वाली कभी कभी की छुट्टीयाँ थीं. लेकिन मैने उसे ही रखा क्यूँ कि जाति का मसला मेरे घर मे कोई मायने नही रखता था और मुझे लगा कि उन्हे बहुत जरूरत है पैसों की. हर दिन स्कूल जाने से पहले वो अपनी माँ के साथ काम करती..उसे पढाई करने मे रूचि थी और काम करने से भी कोई शिकायत नही थी..जीवटता से भरपूर मेहनती लडकी थी वो
…दो तीन दिनों की छुट्टियों के बाद एक दिन जब वो अकेली आई, तो उसने बताया कि उसके दोनो छोटे भाई कहीं गुम हो गये हैं और वो और उसकी माँ उन्हे ढूँढने मे लगे थे इसीलिये काम पर नही आ पाये थे..माँ रोती रहती है और काम पर कुछ और दिन नही आयेगी…दूसरे लोगों ने अब उनसे काम नही करवाने का तय किया है..और क्या मै अब भी उससे काम करवाना चाह्ती हूँ या नही…मुझे भी लगा कि मना कर दूँ लेकिन फिर सोचा कि उसे कुछ तो करना ही होगा..शायद पढाई छोडनी पडे और पता नही कैसी मुश्किलों मे काम करेगी…
वो मेरे घर आती रही…कुछ दिनों बाद उसका एक भाई वापिस आ गया..पता चला कि उन्ही के किसी रिश्तेदार के साथ वो सब ट्रेन से मुम्बई भाग गये थे वहीं स्टेशन पर सब अलग अलग हो गये,पोलिस की मदद से ये तो वपिस आ गया लेकिन छोटा भाई वहीं गुम हो गया.सीमा को सबसे ज्यादा जो बात दुखी करती थी वो ये कि उसके भाई को मुम्बई मे भिखारी बना दिया जायेगा!!
…. मैने उसे हर सम्भव मदद की..अन्ग्रेजी और गणित मे उसे दिक्कत रह्ती तो मै उसे पढा देती…उसकी परिक्षाओं के समय मेरी तरफ से उसे छुट्टियाँ मिल जाती और उसके पास हो जाने पर उपहार भी….वो कभी फेल नही हुई थी और उसकी इच्छा थी कि वो बडी होकर शिक्षिका बने….मै उसकी ज्यादा मदद नही कर पाई क्यों कि दो वर्ष बाद हमने वो घर और फिर शहर भी छोड दिया था…पता नही वो फिर वो अपनी पढाई जारी रख सकी या नही..मुझे अफसोस है कि मै उसे अब मदद नही कर सकती…पता नही है वो कहाँ और कैसी है..सिर्फ उसके लिये प्रार्थना कर सकती हूँ….
…”सीमा तुम जहाँ कहीं भी हो मुझे याद आती हो!जितनी हिम्मत तुममे तब थी उतनी ही बनाये रखना….एक दिन तुम जरूर शिक्षिका बन जाओगी!!”
सराहनीय.
प्रशंसनिय कार्य.
मदद करने का यही तरीका सही है की लेने वाले को न लगे की वह अहसान ले रहा है, देने वाले को न लगे की वह भीख दे रहा है.
बहुत बढ़िया और सीख देता आलेख.
काश सबके मन में गरीबों के प्रति ऐसी ही साहनभुति और आत्मियता हो, तो कितने लोगों का भला हो जाये और कितने स्वपन साकार.
सराहनीय प्रयास था आपका। भगवान सीमा की मदद करे।
बहुत खुब प्रयास था…ऐसे है अगर सब हो तो देश मुकाम हासिल कर लेगा…बधाई आपको!!
बच्ची के लिये शुभकामनायें!
काश सभी को ऐसी सोच समझ आजाए - बहुत ही संजीदा बातें लिखी हैं रचना जी आपने
यह लेख पुनः प्रकाशित करने का आभार.
देखो तुमने ब्लोग को छुआ है..अब ब्लॉग जगत को छुओ…सब तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं हमारे साथ..कुछ नया लिखो न!!
चलो अच्छा…जो तुम्हारे दुख हैं न…वो ही लिख दो…मगर लिखो..जो भी अच्छा नहीं लग रहा वो ही लिखो…
हम इन्तजार कर रहे हैं..