फर्क February 12, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.trackback
** नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक भारत मे जितने बच्चे हैं उनमे से लगभग ५०% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं **
खून तो सबका एक सा है,
फिर इतना फर्क है क्यूँ रहता?
तुम नीदों तक की दवा खाते,
वो छोटे मर्ज से मर जाता.
वो भी मानव, तुम भी मानव,
फिर तुमको क्यूँ न रहम आता?
तुम कम्बल ओढ कर सो जाते,
वो ठंडी मे ठिठुरा करता.
उसका भी तन है तुमसा ही,
फिर मन व्याकुल क्यूँ ना होता?
तुम कमरे मे बंद हो जाते,
वो बारिश मे भीगा करता.
बच्चे तो सबके एक से हैं,
फिर उनको प्यार न क्यूँ मिलता?
तुम अपनो को सुविधा देते,
वो बेचारा तकता रहता.
उसके अधिकार भी तुम से ही,
फिर वो ही क्यों पिछडा रहता?
तुम जरूरत से ज्यादा पाते,
वो हक से भी वंचित रहता.
हैं धरती अम्बर सबके ही,
फिर वो ही क्यूँ डरकर रहता?
तुम उसको ना उठने देते,
वो मूक बना सहता रहता…..
—–
क्योंकि सहारा देने वाले ही सहारा छीन लेते है,
मेरा हाथ तुम्हारा हाथ कहाँ मिलता है एक साथ
निकल पड़े अगर सहायता करने आधे से ज्यादा
मुड़कर भाग जाते हैं…।
उत्तम विचार-उत्तम दर्शन का चोंगा पहने हैं यहाँ
के एक तिहाई लोग…पर बढ़कर जो पहनाए उनको
अपना लिबास…ऐसा कोई नहीं इनमें, सच में इनके साथ!!!
यह सच इतना कढ़वा है कि बड़े आसमान में एक छोटे
बादल के समान हैं…अत्यंत सराहनीय प्रस्तुति है सीखे
अगर कुछ इससे हम…तो इस कृति का मोल रख पाएँगे!!!
धन्यवाद!!
सुन्दर कविता और सुन्दर टिप्पणी।
@ दिव्याभ, टिप्पणी मे की गई उम्दा बातों के लिये धन्यवाद!
@ श्रीश, धन्यवाद.
आओ मिलकर हम अब ऐसे पल क निर्माण करे
मिले हाथ से हाथ, कुछ सपना अपना साकार करे
नये दिशा मे, नुतन आशा, लेकर अपने कदम बढे
वंचित है जो सुखसे, उनको मिलकर प्यार करे
बहुत सुन्दर रचना है रचना जी.. बधाई
@ गरिमा, धन्यवाद इन अच्छी पन्क्तियों के लिये!