रिश्ते….. March 29, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.15 comments
जीवन मे कई रिश्ते बनते- बिगडते, उलझते सुलझते रहते हैं. पारिवारिक, कार्यक्षेत्र के, दोस्ती के, और मानवीय संवेदनाओं के. भारतीय समाज मे हर तरह के रिश्ते का अपना एक विशेष महत्व है. अब धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है.भारतीय माँ को पहले हर रोज एक ‘कार्डॅ‘ दिया जाता था कि सारे दिन क्या किया, किससे मिले, किसी दिन खाना थोडा कम खाया तो क्यों, आदि..लेकिन अब “मदर्स डे” के एक कार्ड से माँ को काम चलाना होता है..दोस्ती का रिश्ता भी अन्धे और लन्गडे की तरह था. अन्धा, लन्गडे को कन्धे पर बैठा कर मेले मे ले जाता, यानि दो पक्ष एक दूसरे के पूरक थे..लेकिन अब दोस्ती के बीच भी “थैंक्स“, “सॉरी” और “फ्रेनशिप बेल्ट” आ गये हैं..और हर छोटी- बडी बात पर “कार्ड्स्” का देना- लेना!
नये जमाने के कुछ नये तरह के रिश्ते भी है जैसे चिट्ठों की दुनिया मे शब्दों और विचारों के! कई बार ऐसा होता है कि किसी मुद्दे पर जैसा आप सोचते हैं, जैसा कहना चाह्ते हैं,ठीक वैसी ही अभिव्यक्ति किसी अजनबी के चिट्ठे पर मिल जाती है…
बदलते दौर मे जिस रिश्ते मे ज्यादा बदलाव आया है वो सम्भवत: पति-पत्नी का है..समर्पण और त्याग की जगह अब दम्भ और स्वार्थ दिखाई देता है…
* अब प्रीत की रीत है बदल गई,
रिश्तों की भाषा हुई नई,
पहले सी बातें नही रही,
जब सब कुछ कह देता था मौन!
इस वाचाल हुए युग मे,
चुप की भाषा को समझे कौन!! *
रिश्तों की कैसी उलझन है,
शर्तों पर होते बन्धन हैं!
अब बन्ध जाने का मोह नही,
बस खुल जाने की तडपन है!!
आज जो दिल को प्यारा है,
कल बेकार बेचारा है,
कभी इस पर तो कभी दूजे पर,
घटती बढती अब धडकन है!
रिश्तों की—
इक जागे दूजा सो जाए,
ना पूछे कुछ, ना बतियाए,
दूजे की चिन्ता करे कौन!
पल- पल होती अब अनबन है!
रिश्तों की—
जिसका उसका सपना न्यारा,
बस “मेरा” ही सबसे प्यारा!
झूठे निज स्वाभिमानों से,
भरे हुए उनके मन हैं!
रिश्तों की—
सब काम भी हैं अब बँटे हुए,
अपने जिम्मे से छँटे हुए!
जिसका उसका जो काम करे,
ना हो पाये तो तन तन है!
रिश्तों की—
अच्छा है मेरी समझ कमजोर है!! March 22, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.7 comments
** परिन्दों को मिलेगी मन्जिल एक दिन,
ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं
वही लोग खामोश रहते हैं अक्सर,
जमाने मे जिनके हुनर बोलते हैं!!**
–अज्ञात
कुछ समझ पाती तो मै भी बोलती, बौखलाती,
चुप्पी को तोड, मुँहजोर हो बतियाती!
मौन है पिछडा हुआ, आवाजों का दौर है,
अच्छा ही है जो मेरी समझ कमजोर है!!
हम भारतीय क्या सार्थक बहस कर पाते हैं?
खुद के अलावा क्या किसी और की सुन पाते हैं?
हर बहस का अन्त है- ढाक के तीन पात!
न तुम हमारी मानो, न हम तुम्हारी बात्!!
ये ऐसा उलझा धागा, जिसका न कोई छोर है!
अच्छा ही है —
जिन्दगी से भी ज्यादा क्यूँ उलझे ये विचार हैं?
शब्द ऐसे तीखे कि मानो तलवार हैं!
तानो और व्यंग की कितनी तेज धार है!
हर शख्स समझे, बस खुद ही होशियार है!
ज्ञानीयों के ज्ञान का हाय कैसा शोर है!!
अच्छा ही है —
क्यूँ न सहज हो हम अपने विचार बाँटें?
क्यूँ किसी के तर्क, अपने कुतर्क से काटें?
सभी को तल्ख होना इतना क्यूँ जरूरी है?
या फिर सनसनी की कोई मजबूरी है?
क्यूँ आपसी समझ की तनी हुई ये डोर है?
अच्छा ही है —
—–
“उनके” लिये! March 20, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.10 comments
यूँ तो जमाना सफल भारतीय महिलाओं का है…इन्द्रा नूयी, किरन मजूमदार , सुधा मूर्ती या निरूपमा राव हों या छोटे शहरों की सफल उद्दमी महिलायें, जो रिक्शा चलाने या पेट्रोल पंप पर काम करने जैसे तमाम पुरुष प्रधान कार्य क्षेत्रों मे अपनी क्षमता दिखा रही हैं….लेकिन फिर भी मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार सबसे ज्यादा सन्तुष्टि तभी पाता है जब उनकी बेटी एक अच्छी पत्नी और माँ भी बने..और इसीलिये उसे तमाम तरह के घरेलू काम भी सिखाये जाने पर जोर होता है…ताकि शादी के लिये उसका ‘प्रोफाइल’ एक दम परफेक्ट हो!
मुझे याद है जब मेरी दीदी की बेटी मेडिकल की पढाई कर रही थी तब मेरी ताई जी उससे कभी कभी रोटियाँ बनवाती थी, उनका तकाजा था कि वो जितनी चाहे आगे पढाई करे, लेकिन उसे अच्छा खाना बनाना जरूर आना चाहिये…
पढी लिखी होने के साथ ही ‘सुन्दर’, ‘गृहकार्य मे दक्ष!’ जैसे विशेषणों के साथ ही आजकल कम्प्यूटर का ज्ञान होना और कार चलाना दो चीजें (अगर लड्के वाले जरा सा उच्च मध्यम वर्गीय हों तो) और भी देखी जाने लगी हैं…
कुछ समय पहले मेरी एक भतीजी के लिये एक रिश्ते की बात चल रही थी..एक दिन लडके के एक रिश्तेदार ( जो मध्यस्थ थे) ने फोन पर पूछा -क्या लडकी कार चलाना जानती है? मेरी भतीजी उनके इस बेतुके तरीके ( मानो वो इस बात पर तय करेंगे कि लडकी पसन्द है या नही! और पूछना ही था तो साधारण बातचीत के दौरान ये पूछा जा सकता था)पर नाराज होकर बोली- उनसे कह दीजिये कि अगर उनके घर मे हवाई जहाज है, तो वो भी चला लूँगी!!
दूसरा किस्सा कुछ वर्षों पहले का है.तब मेरे घर मे कम्प्यूटर नही था और मै सीखने के लिये एक क्लास मे जाती थी..मेरी बेटियों की देखभाल और अन्य जिम्मेदारियों के चलते ये तय ही था की मै इस शिक्षा का कोइ व्यावसायिक उपयोग नही कर पाऊँगी, लेकिन फिर भी मुझे सीखने की इच्छा थी..वहीं एक नवविवाहिता भी आती थी..वो एक संभ्रान्त परिवार की लगती थी..उसे जरा भी रूचि नही थी कम्प्यूटर मे..पेंट ब्रश जैसे साधे अप्लिकेशन को भी ठीक से उपयोग नही कर पाती…वो उबासियाँ लेते हुए यूँ ही वक्त बिताती…उसे जरूरत होती तो शायद दोपहर की एक अच्छी सी नींद की! एक दिन मैने उससे पूछा कि उसे बिल्कुल रुचि नही है तो आखिर वो सीख ही क्यूँ रही है..उसने बताया कि वो एक सफल व्यवसायी परिवार के इकलौती बहू है और उसे कोई नौकरी नही करनी लेकिन उसके घर के लोग चाह्ते हैं कि उनकी बहू को सब आना चाहिये तो वो उनके लिये एक प्रमाणपत्र भर जुटाना चाहती है, ताकि उसके घर के लोग ठप्पे से कह सकें की उनकी बहू को कम्प्यूटर का ज्ञान भी है!..मै दंग रह गई ये सोचकर कि भारत मे बहुत कुछ बदलने के बाद भी बहुत कुछ नही बदला है…और लडकियों को ‘उनके’ लिये अब भी कितना कुछ करना पडता है…लडका चाहे कैसा भी हो लेकिन बहू सुन्दर और सर्व गुण सम्पन्न ही चाहिये..
चलते चलते एक बात और कहना चाहूँगी कि भारत के हर आशीष को ये हक है कि वो पहली मुलाकात मे ही “आलू के पोहे” बनवा कर लडकी की परिक्षा ले सकता है, लेकिन क्या कभी कोइ लडकी ये पूछ सकती है कि फलाँ प्रोग्राम “जावा” मे लिख कर दिखाओ!!
रंगीली राजनीति… March 15, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.7 comments
आम जनता की होली तो हो ली, अब राजनेताओं के रंग देखिये—–
होली के रंगों मे डूबी राजनीति सारी की सारी,
भाजपा है अब लाल खुशी से, दुख से पीली कांग्रेस बेचारी!
सौन्दर्य से हुई गुलाबी राजनीति की हर इक नारी
नई झकाझक इनकी गाडी़, जग मग करती इनकी साडी़!
लालू के तो अपने रंग हैं, उनके रंग ही हुई राबडी,
कल तक जो सूखी थी एनडीए– आज हुई है हरी हरी!
कुछ सफेद नेता हैं जिन्होंने राजनीति में उम्र गुजारी
स्याह रंग के वे नेता हैं जो हैं पक्के भ्रष्टाचारी!
अपनी जिद पर अडे़ हुए हैं, केसरिया दुपट्टा धारी,
बाकी फिर क्यूँ पीछे रहते वे भी दे रहे टक्कर भारी! अब तक की है अपने मन की, अब सुन लो तुम बात हमारी,
रंग जाओ सब देश के रंग मे, बन्द करो अब मारा- मारी!
अदल-बदल कर तुम ही जीते, जनता तो हर बार है हारी,
खुद को थोडा पीछे कर लो, अब आने दो देश की बारी! आओ सब नेता मिल कर के, होली खेलो बिल्कुल न्यारी,
आज जला दो स्वार्थ सब अपने, और जला दो कालिख सारी!!
तुम ही तुम March 8, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.15 comments
इसे आत्म प्रवंचना न समझा जाए..ये सब वही वाक्य हैं जो समय समय पर पुरुष द्वारा स्त्री के लिये कहे गये हैं.. कभी तारीफ मे तो कभी ताने के रूप मे, कभी हँस कर तो कभी गुस्से से, कभी सताने के लिये तो कभी मनाने के लिये..और ” बेचारा” भी पुरुष स्वयं को कहते रहते हैं…..
*आज महिला दिवस है। मैंने पिछले वर्ष इस अवसर पर अपने अंग्रेजी ब्लाग में यह लिखा था। आज सभी महिला साथी चिट्ठाकारों को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूं!!
हालातों का मारा-मारा
मै तो हूँ आदमी बेचारा!
तुम हो, शक्ति तुम हो,
हर कथा की उक्ति तुम हो
चहुँमुखी है ज्ञान तुम्हारा!
मैं…….
तुम तो पूजी जाती जग में,
इस धरती पर और अँबर में,
मैं भी बनना चाहूँ तारा!
मैं….
जन्म भी देती, तुम्हीं पालती,
संस्कारों में तुम्हीं ढालती,
मैं तो हूँ बस एक सहारा!
मैं……
तुम्ही नदी हो, तुम्ही हो धरती,
इस जग को लेकर तुम चलती,
मैं तो हूँ एक बहती धारा!
मैं……
चट्टानों से तुमें टकराती,
कठिन काम को सरल बनाती,
अँधियारे को दूर भगाती,
जग में फैलाती उजियारा!
मैं…..
दुनिया के जुल्मों को सहती,
फिर भी सबको अच्छा कहती,
तुम तो द्रव हो जैसे पारा!
मैं…..
सारे कामों को कर लेती,
हर दम सबके आगे रहती,
ढूँढ रहा हूँ मैं तो किनारा!
मैं…..
सारी दया तुम्ही पर लुटती,
हर इक नजर तुम्ही पर रूकती,
मैं तो तकदीरों से हारा!
मैं……
शातिर तुम हो, फिर भी भोली,
मीठी हो जैसे इक बोली,
तुमसे तो मैं हर पल हारा.
मैं…..
तुम्हे देखकर मैं हूँ दंग ,
आज हुआ है मोह भंग,
इस जगको तुमने ही सँवारा.
मैं….
मौका है अब मैने पाया,
आज मुझे ये समझ मे आया,
क्या कर सकता मैं ये सारा?
मैं….
अब तो कुछ करना ही होगा,
थोडा बहुत बदलना होगा,
व्यर्थ गया ये जीवन सारा.
मैं……