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तुम ही तुम March 8, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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इसे आत्म प्रवंचना न समझा जाए..ये सब वही वाक्य हैं जो समय समय पर पुरुष द्वारा स्त्री के लिये कहे गये हैं.. कभी तारीफ मे तो कभी ताने के रूप मे, कभी हँस कर तो कभी गुस्से से, कभी सताने के लिये तो कभी मनाने के लिये..और ” बेचारा” भी पुरुष स्वयं को कहते रहते हैं…..

*आज महिला दिवस है। मैंने पिछले वर्ष इस अवसर पर अपने अंग्रेजी ब्लाग में यह लिखा था। आज सभी महिला साथी चिट्ठाकारों को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूं!!

हालातों का मारा-मारा
मै तो हूँ आदमी बेचारा!

 तुम हो, शक्ति तुम हो,
हर कथा की उक्ति तुम हो
चहुँमुखी है ज्ञान तुम्हारा!
मैं…….

तुम तो पूजी जाती जग में,
इस धरती पर और अँबर में,
मैं भी बनना चाहूँ तारा!
मैं….

जन्म भी देती, तुम्हीं पालती,
संस्कारों में तुम्हीं ढालती,
मैं तो हूँ बस एक सहारा!
मैं……

तुम्ही नदी हो, तुम्ही हो धरती,
इस जग को लेकर तुम चलती,
मैं तो हूँ एक बहती धारा!
मैं……

चट्टानों से तुमें टकराती,
कठिन काम को सरल बनाती,
अँधियारे को दूर भगाती,
जग में फैलाती उजियारा!
मैं…..

दुनिया के जुल्मों को सहती,
फिर भी सबको अच्छा कहती,
तुम तो द्रव हो जैसे पारा!
मैं…..

सारे कामों को कर लेती,
हर दम सबके आगे रहती,
ढूँढ रहा हूँ मैं तो किनारा!
मैं…..

सारी दया तुम्ही पर लुटती,
हर इक नजर तुम्ही पर रूकती,
मैं तो तकदीरों से हारा!
मैं……
 

शातिर तुम हो, फिर भी भोली,
मीठी हो जैसे इक बोली,

तुमसे तो मैं हर पल हारा.

मैं…..

तुम्हे देखकर मैं हूँ दंग ,

आज हुआ है मोह भंग,

इस जगको तुमने ही सँवारा.

मैं….

मौका है अब मैने पाया,

आज मुझे ये समझ मे आया,

क्या कर सकता मैं ये सारा?

मैं….

अब तो कुछ करना ही होगा,

थोडा बहुत बदलना होगा,

व्यर्थ गया ये जीवन सारा.

मैं……

Comments»

1. Divyabh - March 8, 2007

उम्दा व्याख्या, हाँ… यह आपकी आत्म प्रवंचना नहीं है अच्छी तरह दिख रहा है…
बहुत दिनों बाद आपको देखकर अच्छा लगा…।
बहुत कुछ कह दिया इतनी सहजता से की कुछ भी कहने को नहीं है…मेरी ओर से भी आपको महिला दिवस पर शुभकामनाएँ!!!

2. TallyHelper - March 8, 2007

वल्लाह क्या खूब कहा है। खुशामदीद !!

3. राम चन्द्र मिश्र - March 8, 2007

बधाइयाँ एवं शुभकामनायें (महिला होने की) । हमने भी आज कुछ लिखा है…सारा पढियेगा :)।
धन्यवाद।

4. maithily - March 8, 2007

धन्यवाद, अब मुझे कभी किसी को मनाने के लिये शब्दों की कमी नहीं रहेगी

5. समीर लाल - March 8, 2007

अरे, किसने कहा कि यह आत्म प्रवंचना है?? किसी ने भी तो नहीं.

बधाई, इस महिला दिवस पर!! :)

6. beji - March 8, 2007

बहुत सुन्दर !!

7. Manish - March 8, 2007

अच्छी तरह लपेटा है आपने हमारी जाति विशेष को :)
महिला दिवस पर आपको बधाई !

8. अफ़लातून - March 8, 2007

महिला दिवस जुझारू हो ।

9. राजीव - March 8, 2007

रचना जी,

आपकी रचना सराहनीय है।
विश्व महिला दिवस पर आपको और अन्यान्य महिला चिट्ठाकारों व पाठकों को शुभकामनाएं

10. प्रियंकर - March 8, 2007

अवसरानुकूल शुभकामनाएं!

11. उन्मुक्त - March 8, 2007

अब मुन्ने की मां को मनानेे का तरीका समझ में आया।

12. Deepak - March 8, 2007

bechara mai!!

13. ghughutibasuti - March 9, 2007

रचना जी, क्या कोई पुरुष सच में ऐसा कह सकता है, क्षणिक जोश में रूठी पत्नी या प्रेमिका को मनाने के लिए नहीं ? अच्छी रचना है ।
घुघूती बासूती

14. अनूप शुक्ला - March 9, 2007

बढ़िया लिखा है। अच्छी रचना है। लेख बहुत दिन से नहीं लिखा!

15. rachana - March 16, 2007

आप सभी का बहुत धन्यवाद..क्षमा करें, देर से जवाब दे पा रही हूँ.