यूँ तो जमाना सफल भारतीय महिलाओं का है…इन्द्रा नूयी, किरन मजूमदार , सुधा मूर्ती या निरूपमा राव हों या छोटे शहरों की सफल उद्दमी महिलायें, जो रिक्शा चलाने या पेट्रोल पंप पर काम करने जैसे तमाम पुरुष प्रधान कार्य क्षेत्रों मे अपनी क्षमता दिखा रही हैं….लेकिन फिर भी मध्यम वर्गीय भारतीय परिवार सबसे ज्यादा सन्तुष्टि तभी पाता है जब उनकी बेटी एक अच्छी पत्नी और माँ भी बने..और इसीलिये उसे तमाम तरह के घरेलू काम भी सिखाये जाने पर जोर होता है…ताकि शादी के लिये उसका ‘प्रोफाइल’ एक दम परफेक्ट हो!
मुझे याद है जब मेरी दीदी की बेटी मेडिकल की पढाई कर रही थी तब मेरी ताई जी उससे कभी कभी रोटियाँ बनवाती थी, उनका तकाजा था कि वो जितनी चाहे आगे पढाई करे, लेकिन उसे अच्छा खाना बनाना जरूर आना चाहिये…
पढी लिखी होने के साथ ही ‘सुन्दर’, ‘गृहकार्य मे दक्ष!’ जैसे विशेषणों के साथ ही आजकल कम्प्यूटर का ज्ञान होना और कार चलाना दो चीजें (अगर लड्के वाले जरा सा उच्च मध्यम वर्गीय हों तो) और भी देखी जाने लगी हैं…
कुछ समय पहले मेरी एक भतीजी के लिये एक रिश्ते की बात चल रही थी..एक दिन लडके के एक रिश्तेदार ( जो मध्यस्थ थे) ने फोन पर पूछा -क्या लडकी कार चलाना जानती है? मेरी भतीजी उनके इस बेतुके तरीके ( मानो वो इस बात पर तय करेंगे कि लडकी पसन्द है या नही! और पूछना ही था तो साधारण बातचीत के दौरान ये पूछा जा सकता था)पर नाराज होकर बोली- उनसे कह दीजिये कि अगर उनके घर मे हवाई जहाज है, तो वो भी चला लूँगी!!
दूसरा किस्सा कुछ वर्षों पहले का है.तब मेरे घर मे कम्प्यूटर नही था और मै सीखने के लिये एक क्लास मे जाती थी..मेरी बेटियों की देखभाल और अन्य जिम्मेदारियों के चलते ये तय ही था की मै इस शिक्षा का कोइ व्यावसायिक उपयोग नही कर पाऊँगी, लेकिन फिर भी मुझे सीखने की इच्छा थी..वहीं एक नवविवाहिता भी आती थी..वो एक संभ्रान्त परिवार की लगती थी..उसे जरा भी रूचि नही थी कम्प्यूटर मे..पेंट ब्रश जैसे साधे अप्लिकेशन को भी ठीक से उपयोग नही कर पाती…वो उबासियाँ लेते हुए यूँ ही वक्त बिताती…उसे जरूरत होती तो शायद दोपहर की एक अच्छी सी नींद की! एक दिन मैने उससे पूछा कि उसे बिल्कुल रुचि नही है तो आखिर वो सीख ही क्यूँ रही है..उसने बताया कि वो एक सफल व्यवसायी परिवार के इकलौती बहू है और उसे कोई नौकरी नही करनी लेकिन उसके घर के लोग चाह्ते हैं कि उनकी बहू को सब आना चाहिये तो वो उनके लिये एक प्रमाणपत्र भर जुटाना चाहती है, ताकि उसके घर के लोग ठप्पे से कह सकें की उनकी बहू को कम्प्यूटर का ज्ञान भी है!..मै दंग रह गई ये सोचकर कि भारत मे बहुत कुछ बदलने के बाद भी बहुत कुछ नही बदला है…और लडकियों को ‘उनके’ लिये अब भी कितना कुछ करना पडता है…लडका चाहे कैसा भी हो लेकिन बहू सुन्दर और सर्व गुण सम्पन्न ही चाहिये..
चलते चलते एक बात और कहना चाहूँगी कि भारत के हर आशीष को ये हक है कि वो पहली मुलाकात मे ही “आलू के पोहे” बनवा कर लडकी की परिक्षा ले सकता है, लेकिन क्या कभी कोइ लडकी ये पूछ सकती है कि फलाँ प्रोग्राम “जावा” मे लिख कर दिखाओ!!
अगर कन्या आशीष को देखने जाती तो वह जावा में प्रोग्राम लिखवा के देख सकती थी। अब आशीष को मेहनत का कुछ फल तो मिलना हे चाहिये, नमकीन पोहे ही सही। और आशीष से उसने भी कुछ पूछा होगा जिसे आशीष को दूसरों को बताने से मना भी किया होगा ! क्या पता।
पोस्ट बहुत अच्छी लगी!
पूछ सकती है..पूछना चाहिए..अगर वाकई वो जानने को उत्सुक है तो । जब लड़के स्वतंत्र हैं तो वो क्यूँ नहीं ।आपने सही प्रश्न उठाए हैं।
“शादी के इंटरव्यू” वाली पोस्ट
http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.com/2006/09/blog-post_23.html
में मैंने भी यही मसला उठाया था ।
आपकी बात ग़लत तो नही है लेकिन कुछ हद तक एकतरफ़ा ज़रुर है । बड़े शहरों मे और ख़ासकर ज़्यादा पढ़ी-लिखी लड़कियों (मसलन प्रोफ़ेशनली क्वालिफ़ाइड) की माँगें, लड़कों के बारे मे भी बहुत ज़्यादा होती है । आजकल मेरे कई मित्र शादी-व्याह के दौर से गुज़र रहे हैं इसलिये मुझे थोड़ा बहुत आइडिया है । लड़का एन-आर-आई होना चाहिये । अगर भारत मे ही है तो कम से कम तनख़्वाह ६०-७० हज़ार रुपये होनी चाहिये । सास-ससुर घर पे साथ मे न रहते हों, और ना जाने क्या क्या…
क्या करें सबकी अपनी अपनी परिस्थितियाँ हैं ।
बढ़िया है. ..
वैसे आजकल लड़कियाँ भी कम प्रश्न नहीं कर रहीं है, जो कि गलत भी नहीं …!!
रचना दी,
अईयो, हमने परिक्षा थोड़े ली थी ? हमे तो भूख लगी थी और टेबल पर जो नाश्ता रखा था वो हमे पसंद नही था, बस हमने हल्के फुल्के नाश्ते की फरमाईश कह दी थी
वो तो ऐसा है कि हमने ये नही बताया कि उसने हमसे क्या क्या पुछा था
चलो हम अगली पोष्ट मे दूसरा पक्ष भी पेश करेंगे !
हम सोच रहे है कि शादी से पहले उस कन्या के इतने समर्थक है तो हमारा क्या होगा
वो तो गनिमत है
आपने ठीक लिखा, सगभग सभी मध्यमवर्गीय परिवारों में यही स्थिति है। परंतु उच्च मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग की स्थितियाँ बिलकुल भिन्न है।
वैसे कन्या ने उनसे जो पूछा वो नहीं बताया
आशीषजी की पसंद आलूपोहा बहुत पसंद है इसलिए उन्होंने फरमाईश कर दी थी
@ अनूप जी,क्या पता!! पसन्दगी जाहिर करने का शुक्रिया!
@ मनीष जी, हाँ, आपकी वो पोस्ट पढी थी..
@ अभिषेक जी, आपकी बाते भी ठीक ही हैं..मैने मध्यम वर्ग के लिये कहा था..
@ समीर जी, //वैसे आजकल लड़कियाँ भी कम प्रश्न नहीं कर रहीं है, जो कि गलत भी नहीं …!!//
हाँ जी बिल्कुल!!
@ आशीष, मै भी आपकी तरफ उतनी ही हूँ, जितने कि अनूप जी! और उतनी ही निवेदिता की तरफ भी!
भाई हमे मत बताओ कि उसने क्या क्या पूछा था, उसे बता दिया वो ही बहुत है!
@ अतुल जी, सही है अलग वर्ग की स्थितियाँ बिल्कुल भिन्न हैं. टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद्.
क्यों जी, लड़की पक्ष वाले अपने स्तर पर लड़के की जाँच-पड़ताल नहीं करते? मेरे एक मित्र के विवाह के लिए उसके घर वाले रिश्ते देख रहे हैं, कुछ लड़की वालों ने तो दिल्ली में उसके ऑफ़िस में उसे देखने और उसकी नौकरी की सत्यता को प्रमाणित करने के लिए किसी न किसी को भेजा और तथ्य स्थापित होने पर ही अपनी लड़की की तस्वीर उसके घर भिजवाई। इसे आप क्या कहेंगी?
इसलिए मैं अभिषेक की बात से सहमत हूँ, आपकी बात एकतरफ़ा है, आप केवल कन्या का पक्ष देख रही हैं और लड़कों पर प्रश्न लगा रही हैं। कन्या पक्ष भी आजकल कम नहीं होता, अपनी ओर से वे भी जो पड़ताल कर सकते हैं करते हैं, जो शर्ते लगा सकते हैं लगाते हैं, उदाहरण के लिए किसी भी समाचारपत्र में आने वाले matrimonial के विज्ञापनों में “वर चाहिए” वाले पन्ने देख लें।
ह्म्म्म! बेचारे लडके! कितने दुखी हैं..अरे अमित लडकों का पक्ष मुझे क्या पता? जिसे पता है वो रख दे!
कन्या पक्ष तो पता है ना? तो जो कन्या पक्ष वाले करते हैं वो फिर आपको वर पक्ष से बेहतर पता होगा!!