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अच्छा है मेरी समझ कमजोर है!! March 22, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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** परिन्दों को मिलेगी मन्जिल एक दिन,

ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं

वही लोग खामोश रहते हैं अक्सर,

जमाने मे जिनके हुनर बोलते हैं!!**

अज्ञात

 

कुछ समझ पाती तो मै भी बोलती, बौखलाती,

चुप्पी को तोड, मुँहजोर हो बतियाती!

मौन है पिछडा हुआ, आवाजों का दौर है,

अच्छा ही है जो मेरी समझ कमजोर है!!

 

हम भारतीय क्या सार्थक बहस कर पाते हैं?

खुद के अलावा क्या किसी और की सुन पाते हैं?

हर बहस का अन्त है- ढाक के तीन पात!

तुम हमारी मानो, हम तुम्हारी बात्!!

ये ऐसा उलझा धागा, जिसका कोई छोर है!

अच्छा ही है

 

जिन्दगी से भी ज्यादा क्यूँ उलझे ये विचार हैं?

शब्द ऐसे तीखे कि मानो तलवार हैं!

तानो और व्यंग की कितनी तेज धार है!

हर शख्स समझे, बस खुद ही होशियार है!

ज्ञानीयों के ज्ञान का हाय कैसा शोर है!!

अच्छा ही है

 

क्यूँ सहज हो हम अपने विचार बाँटें?

क्यूँ किसी के तर्क, अपने कुतर्क से काटें?

सभी को तल्ख होना इतना क्यूँ जरूरी है?

या फिर सनसनी की कोई मजबूरी है?

क्यूँ आपसी समझ की तनी हुई ये डोर है?

अच्छा ही है

—–

Comments»

1. समीर लाल - March 23, 2007

बहुत खूब..अरे, काहे परेशान हैं यह सब तो होता ही रहेगा. इन सबके हालात देख कर तो कभी लगता है:

“सोच पर किसी की, न किसी का जोर है,
अच्छा ही है जो मेरी समझ कमजोर है!!”

–बढ़िया अभिव्यक्ति…बधाई!!

2. Aditya - March 23, 2007

रचना जी,
समझ की इस कमजोरी से तो लड़ना पड़ेगा। क्योंकि

“जो जानता ही नहीं कि सच क्या है,
हम उससे क्या करें उम्मीद,
पर जो जानकर भी अनजान बना बैठा है,
चल उसे समझाने का कुछ जतन करें।।

और मानता हूँ कि मुश्किल है ये राह-ए-इन्केलाब,
पर फ़िर भी कोई साथ दे तो हम भी परिवर्तन करें।।”

3. Manish - March 23, 2007

क्या बात है ! मन खुश कर दिया । बेहद प्रासंगिक उद्गार लगे आपके

4. प्रत्यक्षा - March 23, 2007

बढिया

5. अनूप शुक्ला - March 23, 2007

बढ़िया है। लेकिन बहुत दिन से गद्य गायब ये क्या बात हुयी रचनाजी! :)

6. rajeshroshan - March 23, 2007

kammal ki baat likhi hai. Sach mein jo likhi hai wo sach hai. Rachna ji ek dum sahi likha hai. Hame aaina dekhte rahana chahiye. Hats Off :)

7. Rachana - March 29, 2007

@ समीर जी, शुक्रिया. आपकी पन्क्तियाँ भी अच्छी हैं.

@ आदित्य जी, इन पन्क्तियों के लिये धन्यवाद्-

//और मानता हूँ कि मुश्किल है ये राह-ए-इन्केलाब,
पर फ़िर भी कोई साथ दे तो हम भी परिवर्तन करें।।” //

@ मनीष जी, प्रत्यक्षा जी, बहुत धन्यवाद!

@ अनूप जी, शुक्रिया. जल्दी ही लिखने की कोशिश करूँगी.

@ राजेश जी, बहुत धन्यवाद आपकी टिप्पणी के लिये..और मेरी कमजोर समझ को समझ पाने के लिये भी!