मेरी आवाज सुनो!! May 28, 2007
Posted by rachanabajaj in पॉडकास्ट.24 comments
अभी तक “कुछ” कहते-कहते मैंने “बहुत कुछ” कह दिया…अब पॉडकास्ट करना भी सीखा….मास्टर जी के अथक प्रयास के बाद बड़ी मुश्किल से कर पाई हूँ!
पॉडकास्ट रिकॉर्ड करने के लिए पंडित जी ने एक बहुत ही अच्छा और सचित्र टटोरियल लिखा है: पॉडकास्ट कैसे रिकॉर्ड करें
अभी तक आपने मेरी पोस्ट पढ़ी अब सुनिये भी!!
** ये कविता मैने नही लिखी है, और इसे किसने लिखा है ये भी मुझे पता नही है…इसे मैने कहीं सुना और मुझे बहुत पसंद आई तो इसे आपको भी सुना दिया…..कविता है—–
जीवन मे कुछ करना है तो, मन को मारे मत बैठो,
आगे-आगे बढना है तो, हिम्मत हारे मत बैठो!
जीवन मे—
चलने वाला मन्जिल पाता, बैठा पीछे रहता है,
ठहरा पानी सडने लगता, बहता निर्मल होता है,
पांव मिले चलने की खातिर,
पांव पसारे मत बैठो!
जीवन मे—
तेज दौडने वाला खरहा, दो पल चल कर हार गया,
धीरे-धीरे चल कर कछुआ, देखो बाजी मार गया,
चलो कदम से कदम मिला कर,
दूर किनारे मत बैठो!
जीवन मे—
धरती चलती, तारे चलते, चांद रात भर चलता है,
किरणो का उपहार बांटने, सूरज रोज निकलता है,
हवा चले तो खुशबू बिखरे,
तुम भी प्यारे मत बैठो!
जीवन मे—
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भाषाई दुविधा May 17, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.11 comments
” ये ‘फ़ाय’ क्यूं ज्ला रए हो?”
“ये ‘फ़ायर’ क्यूऊऊऊं जला रहे होओओ?”
ढाई वर्षीय वैदेही ने जब कई बार मुझसे ये प्रश्न पूछा तब जाकर मै समझ पाई कि वो सुबह् सूखी पत्तियो को जमाकर कचरे को जलाने के बारे मे पूछ रही है…
वैदेही की भाषा हमारे लिये थोडी अटपटी सी है. उसके हिन्दी के एक वाक्य मे कम से कम एक अन्ग्रेजी का शब्द जरूर होता है. मसलन कुछ दूर चलने पर वह ‘टायर्ड’ हो जाती है, उसे प्यास नही लगती, वो ‘थर्स्टी’ होती है, वो अपना दूध या खाना ‘फ़िनिश’ करती है, उसे अच्छा या बहुत अच्छा नही बल्कि ‘गुड’ या ‘वेरी गुड’ लगता है…..
वैदेही महानगर मे रहती है और २ साल की उम्र से ही ‘प्ले स्कूल’ मे जाती है जहाँ शायद उसे आवश्यक रूप से खेलना पडता होगा! वहाँ स्कूल मे और बगीचे मे खेलते समय अन्य बच्चों के साथ वह् अन्ग्रेजी सुनती है और घर मे हिन्दी. उसकी भाषा “हिंग्लिश” है!
वैदेही का अपनी दादी से ‘जनरेशन गैप’ तो है ही एक ‘लैन्ग्वेज गैप’ भी हो गया है…दादी उसे प्यासे कौवे की या कछुए और खरगोश की कहानी सुना सकती है, जो उसने वैदेही के पिता को सुनाई थी, लेकिन वैदेही को “थर्स्टी क्रो” और “हेअर ऎण्ड टॊरटॊइज” की कहानी सुननी है……
ऐसी भाषा वैदेही की नियती है ( जब तक वो कुछ बडी नही होती तब तक) और उसके माता पिता की मजबूरी…उसे सामान्य अन्ग्रेजी का ज्ञान जरूरी है क्यो कि उसे तथाकथित अच्छे स्कूल मे प्रवेश पाकर शिक्षा पाने का महायज्ञ शुरु करना है और उसके माता पिता को तथाकथित अच्छे स्कूल मे प्रवेश दिलवाने के महासंग्राम मे विजय पानी है! हिन्दी तो वे उसे बाद मे सिखा ही लेंगे!
मेरे गांव की तरफ़ इन दिनो एक चुटकुला चलता है…. जहाँ अभी गाय “काउ” नही हुई है और कुत्ता “डॊग” या “डॊगी” नही हुआ है!
वहाँ इन दिनो किसान भी अपने बेटो को पास के शहर मे अन्ग्रेजी स्कूल मे भेज रहे हैं… उनकी भी मजबूरी है क्यो कि क्या पता भविष्य मे किस दिन उनके गांव मे देश को विकसित बनाने वाला “प्रोजेक्ट” आ जाए और वो उनके जीने के हक को ही “रिजेक्ट” कर दे!!
ऐसा ही एक बच्चा जब अपनी अन्ग्रेजी स्कूल से छुट्टीयों मे गाँव आया है तो उसकी दादी उसे डंडा देकर घर के बाहर जहाँ धूप मे गेहूँ रखा है, बैठाती है और कहती है कि गाय आकर अनाज न खाये इसका ध्यान रखे….
कुछ देर बाद दादी बाहर आकर देखती है कि गाय मजे से गेहूँ खा रही है…. वो जब बच्चे को पूछती है कि उसने गाय को भगाया क्यो नही तो बच्चा कहता है कि “ये तो “काउ” है”!!!
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ये ब्लॊगर मन… May 13, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.14 comments
वैसे तो इस पोस्ट का वास्तविक शीर्षक “सत्संग” होता लेकिन मैने डर के मारे नही दिया, क्यो कि अगर सत्संग मे रूचि रखने वाले लोग यहां पढने आये तो उन्हे निराशा होती या ऐसे लगता- ” खोदा पहाड़ निकली चुहिया” ! ये बात जरूर है कि आजकल कई चिट्ठो के शीर्षक ऐसे ही दिये जा रहे है जिनका लेख से तालमेल ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा है..
मुद्दे की बात यह कि मै अभी- अभी एक प्रवचन सुनकर लौटी हूं, और उसी के बारे बताना चाहती हूं…वैसे अब हमारे परिवार के लिये यह बहुत रुचि का क्षेत्र नही है लेकिन समाज मे रहते है तो किन्हीं कार्यक्रमो मे उपस्थिति लगाना अनिवार्य हो जाता है..आमतौर पर ये काम ’वे’ करते है, उनके व्यक्तित्व के हिसाब से उन्हे ये काम सूट करता है, मतलब मेजबान को समझ मे आ जाता है कि भाई इन्हें जाने दिया जाए!…मेरे लिये ऐसे काम बहुत कठिन होते है, क्योंकि मैं अपने अरुचि के क्षेत्र पर भी बाते बना लेती हूं, ताकि मेजबान प्रसन्न रहे…
तो मैं जल्दी छूटकर आ नही पाती वापस..
आज मुझे जाना पड गया उपस्थिति दर्ज कराने….एक महाराज जी का प्रवचन था. एक बढिया से लॊन मे प्रवचन था, आयोजक भी उच्च मध्यमवर्गीय और जनता भी उच्च मध्यमवर्गीय थी….कलर्ड बालों और लक-दक साड़ियों में कई बहुएं अपनी सासू मां के साथ आईं थी. ये भी अब एक स्टॆटस सिम्बल बन चला है कि अमुक परिवार अमुक बाबा के अनुयायी है! सप्ताह की दो किटी पार्टी के साथ एक समाजसेवा का कार्यक्रम और एक किसी महाराज का प्रवचन लगभग तय रहता है!
वहां पहुंची तो पहले ५-१० मिनट, मेरी ही तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आई अपनी मित्र को ढूंढती रही..फ़िर मन मान कर अकेले ही बैठ गई..मन लगाने की कोशिश की लेकिन ये बैरी ब्लॊगर मन इधर उधर के निरीक्षण में ही मशगूल था..मैने देखा कि लोग समूहों में थे और ज्यादातर आपसी बातचीत में ही लगे थे..बच्चे भी इधर उधर दौड रहे थे और् मांएं उन्हे पकड कर बैठाने के असफ़ल प्रयास मे लगी थी…महाराज जी की बातों में किसी को कोई खास दिलचस्पी हो, ऐसा लगा नही….प्रवचन सुनना कम और सोशल गेदरिंग ज्यादा हो रही थी….
मेरे जैसे अकेले आये हुए “ब्लागर माईन्डेड” लोग ( पहले लोग ’नैरो’ और ’ब्रॊड’ माईन्डेड होते थे अब “ब्लागर माईन्डेड” भी होने लगेगे जिनका ’नैरो’ और ’ब्रॊड’ से अलग एक विश्लेषण करने वाला द्रष्टिकोण होगा! ) अपनी पोस्ट के बारे मे सोच रहे होगे शायद! मैने भी ये पोस्ट वहीं लिख डाली थी दिमाग मे…. मेरा भी मन जरा नही लग रहा था वहां.. चिट्ठाजगत के ‘समीरानन्द महाराज’ के प्रवचन से ‘निर्मल आनन्द’ की प्राप्ति की आदत जो हो गयी है……..
माँ तुझे सलाम!!! May 13, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.16 comments
आज के इस खास दिन पर मुन्ने की माँ, घुघुति जी, प्रत्यक्षा जी, बेजी, रत्ना जी, ममता जी और तमाम साथी “माँ” चिट्ठाकारों को मेरी शुभकामनाएँ!!!!
..हालाँकि अब मै भी माँ हूँ, लेकिन ये पन्क्तियाँ मैने अपनी माँ के लिये लिखी थी….
माँ की कुछ बातें आज तुमको बताऊँ,
पहले प्रभु के शीश माँ को झुकाऊँ!
वो सब याद रखती, जो मै भूल जाऊँ,
वो मुझको सम्हाले, जो मै डगमगाऊँ!
वो सब कुछ है सुनती, जो भी मै सुनाऊँ,
वो चुप रह के सहती, अगर मै सताऊँ!
भूखी वो रहती, जो मै खा न पाऊँ,
रातों को जागती, जो मै सो न पाऊँ!
वही गीत गाती, जो मै गुनगुनाऊँ,
संग मेरे रहती, जहाँ भी मै जाऊँ!
ईश्वर से एक ही मै मन्नत मनाऊँ,
हर एक जनम मे यही माँ मै पाऊँ!!!
*** आज के दिन सुबह-सुबह मेरी बेटी मुझे एक कार्ड देती है, जो वो पिछले २/३ दिनों से बना रही होती है! मुझसे छुपाकर! हालाँकि ये बताना नही भूलती कि मै आपके लिये कुछ बना रही हूँ! :). उसे नही पसंद कि उस कार्ड को मै अपनी किसी पुस्तक मे रख दूँ, उसे मुझे कुछ महीने अपने पर्स मे रखना होता है! आज वो अपनी मौसी के घर है, तो मुझे अपने कार्ड के लिये, उसके यहाँ पहुँचने तक इन्तजार करना है!
मांसाहार और मै May 10, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.22 comments
** हिन्दी चिट्ठा जगत मे ऊंट का मांस, मछली आदि बनते देखा है. मै ये पोस्ट लिखकर किसी मांसाहार करने वाले के सम्मान मे गुस्ताखी नही करना चाहती, बल्कि सिर्फ़ अपनी परेशानी ( कमजोरी) का बयान कर रही हूं..
मुझे नॊनवेजिटेरियोफ़ोबिया (nonvegetariophobia) नामक एक गम्भीर बीमारी है, जिसकी वजह कई बार बडी दुविधा हो जाती है. मैने अंडा पहली बार अपनी प्रेक्टिकल लैब मे ही छुआ था. बचपन मे भी कभी मछली और सब्जी एक जगह बिकती नही देखी थी. अब जहां रहती हूं, सब एक साथ ही बिकता है. बडी मुश्किल से सब्जी खरीद पाती हूं.
अडोस-पडोस मे कई जगह रविवार को विशेष खाना बनता है, उस दिन खाना खाना मुश्किल हो जाता है.
कुछ सालो पहले गोवा गई थी, तमाम साथी “सी फ़ूड” के मजे लेते. एक ढाबे नुमा जगह पर गये कहा गया कि यहां वेज खाना भी मिलेगा. टेबल पर प्लेट्स मे वो सब कुछ कर देखकर तबियत ही बिगड गई. सारा दिन कुछ खा ही नही पाई.पेट भर कर डांट खाई सो अलग! जब वापस लौटॆ तो मुझे कम से कम अंडाकरी आदि खाना सीखने को कहा गया. मैने भी निश्चय किया कि अब खा के दिखा ही दूंगी! एक मित्र के घर खाने का तय किया, सारा दिन उपवास रखा सोचकर कि जब भूख लगेगी तो सब खा लूंगी…नही खा पाई, टेबल से उठना पडा..
किसी के घर मे अगर खास खाना बना हो तो मेरा वहां ५ मिनट भी रूक पाना मुश्किल होता है..
एक दिन अपनी बेटियो के साथ ऒटो रिक्शा मे शहर जा रही थी, साथ मे एक और महिला बैठी थी.कुछ दूर जाने के बाद महिला ने रिक्शेवाले से आग्रह किया कि वो ५ मिनट रुके, उसे रास्ते की दूकान से चिकन खरीदना है! मुझे नही पता था कि हमारा चिकन के साथ इतनी नजदीकी होने पर व्यवहार कैसा होगा, क्यो कि हमे अगले १० मिनट साथ बैठना था.अगर उस खास महक से मेरे और बेटियो के पेट के अन्दर का खाना बाहर आने को कुलबुलाहट करने लगा तो बडी ही अभद्र स्थिती हो सकती थी अत: रिक्शेवाले से हमे उतार देने को कहा, लेकिन उसके लिये पैसे का सवाल था और उन महिला ने भी कहा कि २-४ मिनट ही लगेंगे. अब हम ये भी कैसे कहते कि चिकन के साथ हम नही बैठ पायेंगे. हम तीनो अपनी हिम्मत जुटा कर बैठे रहे, वो महिला हमारी परेशानी शायद समझ गई, उसने अपनी बैग बाहर की तरफ़ कर ली और बोली- अरे नॊनवेज नही खाते?
मेरी ज्यादा चिन्ता मेरी बेटियो को लेकर है, मेरी इस बीमारी के लक्षण उनमे भी दिखाई दे रहे है…..इसके इलाज की खोज जारी है…..
मेरे सहपाठी…. May 4, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.15 comments
पिछले दिनो जब अपने गांव गई थी तो इत्तफ़ाक से वहां मेरे एक पुराने सहपाठी से मुलाकात हो गयी..मेरे भतीजे के हाथ मे कुछ चोट आ गई और कहीं कलाई मे माइनर फ़्रेक्चर तो नही, ये जानने के लिये डाक्टर के पास जाना पडा…उसके साथ मै गई…
रास्ते मे मुझे पता चला कि हम एक नये अस्पताल मे जा रहे है…पहले वहां निजी अस्पताल कम ही थे..हमारे घर के तमाम सदस्यो का इलाज पिताजी के एक मित्र के जिम्मे था…और घर के अधिकतर बच्चो का जन्म सरकारी अस्पताल मे ही हुआ, क्यो कि दादी का मानना था कि निजी अस्पताल की कई डिग्रीधारी, नई डाक्टर सहिबा से ज्यादा कुशल वो नर्स होती है जो दिन मे कई तरह् के कई सारे केस देखती है…..लेकिन अब सरकारी अस्पताल की हालत खुद खराब हो गई सो इस नये अस्पताल की तरफ़ रुख करना जरूरी हो गया…..
अस्पताल के बोर्ड पर डॊक्टर के नाम देखकर मै चौकी लेकिन मैने अपनी याददाश्त पर यकीन नही किया..हम आगे बढे ..जब डॊक्टर साहब के सामने पहुंचे और जैसे ही उन्होने मुझे देखा, उनके मुख से अपना नाम सुन मै हैरान रह गई!! वो मेरे सहपाठी ‘एन’ थे..लेकिन मै अब भी असमन्जस मे थी कि क्यों कि हम बी एससी के तीन साल साथ मे थे…मै इतना ही कह पाई कि “ये पढाई कब कर ली??” वो मेरे स्वाभाविक आश्चर्य के जवाब मे मुस्कुराकर बोले-”एम एससी के बाद!”…..
उन्होने मेरे भतीजे के हाथ को देखकर उसे X-ray के लिये भेज दिया और मेरे लिये पास ही एक दूसरे डॊक्टर का केबिन खोल दिया… और कह कर गये की कुछ पेशेंट देख कर अभी वापस आता हूं…..
…..ये मेरे दूसरे सहपाठी ‘जे’ का केबिन था जो ‘एन’ के cousin थे…टेबल पर कई सारी मोटी-मोटी डॊक्टरी किताबे रखी थी…टेबल पर किताबे और केबिन की अन्य चीजे बहुत व्यवस्थित नही रखी थी..शायद हमारे काम करने की जगह भी हमारे व्यक्तित्व को दर्शाती है..और ये मेरे सीधे साधे, शांत सहपाठी का केबिन था…मुझे आश्चर्य हो रहा था उनके एम एससी के बाद डॊक्टर बन जाने पर और उससे भी ज्यादा आश्चर्य इस बात पर कि वे मुझे पहचान गये! नाम सहित! वो भी तब जबकि उन तीन सालो मे हमने शायद ही कभी बात की हो…. ये दोनो बहुत गम्भीर किस्म के , हमेशा किताबो मे डूबे रहने वाले विद्यार्थी थे, लेकिन कभी भी क्लास के पहले तीन स्थानो मे उनका नाम नही रहा…
मुझे पिछली बाते याद आने लगी..फ़िल्म की तरह फ़्लैश बैक मे! ( अरे!! ब्लैक एण्ड व्हाईट मे नही, इतनी भी पुराने बात नही!:)) …
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…तब हम लोग बी एससी द्वितीय वर्ष मे थे…बॊटनी के प्रेक्टिकल का दिन था…उसी दिन कोई महत्वपूर्ण क्रिकेट मैच था ( हां जी, कुछ मैच रूटिन प्रेक्टिकल क्लास से ज्यादा महत्वपूर्ण होते है!)…क्लास के लडको को उस दिन प्रेक्टिकल नही करना था लेकिन हमारी बॊटनी की मैडम “Mrs S ” से सब बहुत डरते थे..बहुत गुस्से वाली थी वो. उन्हे शायद ही कभी मुस्कुराते हुए देखा गया था..उनकी लव- मेरेज उन दिनो चर्चा का विषय थी, कि ये घटना इस तरह के व्यक्तित्व के साथ कैसे हो सकती है! उन्हे “Mrs D” कहने के बजाये उनके पति को “Mr S ” कहा जाता था….. उनके भय से कोई निर्णय लेना मुश्किल हो रहा था..सारे लडके भी आपस मे एकजुट नही थे अन्यथा उनके निर्णय को हमेशा की तरह ही लडकियो ( जो संख्या मे बहुत कम थी) को मान लेना पडता…सो इस बार जिन्हे घर जाना था उन लडकों ने नया उपाय खोजा..उन्होने लडकियो से कहा कि आज वे उनका साथ दे दे तो बाकी लडके भी मान जायेंगे……पहली बार सहायता मांगी गई थी तो हम सहर्ष तैयार हो गये… मुझे लैब तक ये संदेश पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गई…मैडम जी से कहने का मतलब था ‘आ बैल मुझे मार!’, अत: उनसे कहने का सवाल ही नही था…..मै और मेरी मित्र लैब असिस्टेंट के पास गये और उनसे कहा कि कई सारे लोग जा चुके हैं तो आज हम प्रेक्टिकल नही कर रहे….उन्होने स्लाईड्स, माइक्रोस्कोप आदि सब तैयारियां कर ली थी … वे बोले ठीक है आज तुम दो ही लोग करो!..हम उनकी बात अनसुनी करके आगे बढ गये….उनके धमकी भरे ये शब्द सुनाई दिये- ’ठीक है, मै देख लूंगा तुम्हे’……
…परिक्षा का परिणाम आया मुझे बॊटनी के प्रेक्टिकल मे ५० मे से पूरे २६!! नंबर मिले, जो प्रेक्टिकल मे फ़ेल होने के बराबर ही है, खासकर तब जबकि मै एक अच्छी विद्यार्थी थी ( अरे आपसे झूठ क्यूं बोलूंगी!
) और Theory मे मुझे बहुत अच्छे नंबर मिले थे… मुझे नही पता ये क्यो और कैसे हुआ लेकिन फ़िर भी जीत मेरी ही हुई थी क्यो कि अब भी मै कॊलेज मे Biology विभाग मे दूसरा स्थान बना पाई थी…
……मेरी क्लास के सभी सहपाठियो को मेरे लिए बुरा लगा और मुझे सलाह दी गई कि वो सब इस बात को लेकर प्रिन्सीपल से मिलने को तैयार है..लेकिन मैने एसा नही किया क्यो कि आगे एक और पूरा साल उन्ही लैब असिस्टेन्ट और उन्ही मैडम जी के साथ गुजारना था…..
…..मुझे याद नही कि मेरे घर मे भी इस बात को लेकर कोई चर्चा रही हो, क्यों कि मेरे माता- पिता के लिये शिक्षा के मायने परिक्षा मे मिलने वाले नंबरो से कहीं अलग थे…..
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….मेरा भतीजा लौट आया था, उसकी कलाई मे माइनर फ़्रेक्चर था, जिसके बारे मे डॊ. ’एन’ से बात हुई. और् भी दूसरी बातें हुई…उन्होने ये भी बताया कि उन्होने और ’जे’ ने दो बार PMT( Pre medical test) की परिक्षा दी जिसमे उन्हे सफ़लता नही मिली तो उन्होने एम एससी कर ली..एम एससी फ़ाइनल के बाद जब वे “IAS ” की परिक्षा की तैयारी कर रहे थे तब एक बार उन्होने “PMT ” की परिक्षा दी और इस बार दोनो को सफ़लता मिली…फ़िर “MBBS ” के बाद जे ने ‘ Orthopaedics ’ मे डिप्लोमा और ’एन’ ने “MD ” किया और यहां कुछ और लोगों के साथ मिलकर अच्छी सुविधाओ वाला अस्पताल बना लिया… .
हमने हमारे और भी कई सहपाठियो के बारे मे चर्चा की…और ये जाना कि ज्यादातर वे ही लोग जीवन मे अच्छा कर रहे थे जो सामान्य विद्यार्थी थे…..लौटते हुए मै यही सोच रही थी कि शायद academics मे अच्छा होना और व्यावहारिक जीवन मे सफ़ल होना दो बिल्कुल ही भिन्न बातें हैं…..
…मुझे बेहद खुशी हुई अपने पुराने सहपाठी से मिलकर और ये जानकर कि जब ज्यादातर लोग विकास के लिये बडे शहरो की तरफ़ पलायन करते है तब मेरे सहपाठी विकास को हमारे छोटे शहर मे लाने का प्रयास कर रहे है….