jump to navigation

मांसाहार और मै May 10, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
trackback

** हिन्दी चिट्ठा जगत मे ऊंट का मांस, मछली आदि बनते देखा है. मै ये पोस्ट लिखकर किसी मांसाहार करने वाले के सम्मान मे गुस्ताखी नही करना चाहती, बल्कि सिर्फ़ अपनी परेशानी ( कमजोरी) का बयान कर रही हूं..
 
मुझे नॊनवेजिटेरियोफ़ोबिया (nonvegetariophobia) नामक एक गम्भीर बीमारी है, जिसकी वजह कई बार बडी दुविधा हो जाती है. मैने अंडा पहली बार अपनी प्रेक्टिकल लैब मे ही छुआ था. बचपन मे भी कभी मछली और सब्जी एक जगह बिकती नही देखी थी. अब जहां रहती हूं, सब एक साथ ही बिकता है. बडी मुश्किल से सब्जी खरीद पाती हूं.

अडोस-पडोस मे कई जगह रविवार को विशेष खाना बनता है, उस दिन खाना खाना मुश्किल हो जाता है.
कुछ सालो‍ पहले गोवा गई थी, तमाम साथी “सी फ़ूड” के मजे लेते. एक ढाबे नुमा जगह पर गये कहा गया कि यहां वेज खाना भी मिलेगा. टेबल पर प्लेट्स मे वो सब कुछ कर देखकर तबियत ही बिगड गई. सारा दिन कुछ खा ही नही पाई.पेट भर कर डांट खाई सो अलग! जब वापस लौटॆ तो मुझे कम से कम अंडाकरी आदि खाना सीखने को कहा गया. मैने भी निश्चय किया कि अब खा के दिखा ही दूंगी! एक मित्र के घर खाने का तय किया, सारा दिन उपवास रखा सोचकर कि जब भूख लगेगी तो सब खा लूंगी…नही खा पा‍ई, टेबल से उठना पडा..
किसी के घर मे अगर खास खाना बना हो तो मेरा वहां ५ मिनट भी रूक पाना मुश्किल होता है.. 
एक दिन अपनी बेटियो‍ के साथ ऒटो रिक्शा मे शहर जा रही थी, साथ मे एक और महिला बैठी थी.कुछ दूर जाने के बाद महिला ने रिक्शेवाले से आग्रह किया कि वो ५ मिनट रुके, उसे रास्ते की दूकान से चिकन खरीदना है! मुझे नही पता था कि हमारा चिकन के साथ इतनी नजदीकी होने पर व्यवहार कैसा होगा, क्यो‍ कि हमे अगले १० मिनट साथ बैठना था.अगर उस खास महक से मेरे और बेटियो‍ के पेट के अन्दर का खाना बाहर आने को कुलबुलाहट करने लगा तो बडी ही अभद्र स्थिती हो सकती थी अत: रिक्शेवाले से हमे उतार देने को कहा, लेकिन उसके लिये पैसे का सवाल था और उन महिला ने भी कहा कि २-४ मिनट ही लगेंगे. अब हम ये भी कैसे कहते कि चिकन के साथ हम नही बैठ पायेंगे. हम तीनो अपनी हिम्मत जुटा कर बैठे रहे, वो महिला हमारी परेशानी शायद समझ गई, उसने अपनी बैग बाहर की तरफ़ कर ली और बोली- अरे नॊनवेज नही खाते?
मेरी ज्यादा चिन्ता मेरी बेटियो‍ को लेकर है,  मेरी इस बीमारी के लक्षण उनमे भी दिखाई दे रहे है…..इसके इलाज की खोज जारी है…..

Comments»

1. Shrish - May 11, 2007

यह बीमारी नहीं बीमारी से बचाव है। आप मांसाहारियों की तरह न सोचिए शाकाहारियों की तरह सोचिए।

शाकाहार शारीरिक, मानसिक, धार्मिक और नैतिक हर तरह से उत्तम है।

2. divyabh - May 11, 2007

ये तो आदत की बात है जो मेरी माँ से काफी मिलती है…मगर मेरी यहाँ उलटी दशा है…मूझे वेजिटेरियन मात्र घास-फूस ही नजर आता है… हर की अपनी-2 आदत होती है जो कई बार संघर्ष पैदा कर देती है…।

3. RC Mishra - May 11, 2007

मै शाकाहारी हूँ जब मै कलकत्ता गया था तब पहली बार मेरा सामना हुआ था इस प्रकार के भोजन से, लेकिन वहाँ अधिक समय नही रहना पडा़, फ़िर जब इटली आया तो थोड़ी असुविधा हुई ये जानने मे कि क्या मै नही खा पाऊंगा।

अभी तो ऐसा है कि मेरी पसन्द की हर चीज (कुछ सब्जियों को छोड़कर) यहाँ मिल जाती है, और इटालियन खाना भी बहुत पसन्द है।

यहाँ एक बार एक मिठाई खा रहा था, अचानक उल्टी आ गयी, पता चला उसमे अन्डा था।

वैसे जब मै खुद को वेजीटेरियन बताता हूँ तो कभी-कभी लोग पूछ लेते हैं कि मिल्क प्रोडक्ट (खास तौर पर पनीर) खाता हूँ कि नही। एक बार मज़ेदार वाकया हो गया एक रेस्टारेन्ट मे हम लोग खाने गये थे, सब अपनी-अपनी पसन्द का खाना मिल जुल कर खा रहे थे, तभी सारा ने एक विशेष प्रकार की डिश से कुछ मांस के टुकडे़ अलग किये और बोली ये ट्राइ करो बहुत अच्छा होता है :)

4. समीर लाल - May 11, 2007

शाकाहारी होना तो बहुत अच्छी बात है. मैं मात्र शाकाहारी नहीं हूँ, यह भी बहुत बुरी बात नहीं है. खाना या न खाना तो व्यक्तिगत पसंदगी की बात है मगर मेरी सोच में, मांसाहार के प्रति थोड़ी सी टॉलरेन्स रखने में, जैसे कि एक ही दुकान में बिकने या एक ही होटल में दोनों के बनने या पड़ोस की टेबल पर किसी के माँसाहार खाने आदि कोई नुकसान नहीं. क्या पता आप कब किस माहौल में हों, क्या पता. खाना तो कतई आवश्यक नहीं मगर दूसरे के खाने पर या मात्र देखकर उबकाई न आये, इतना सा तो डेवलप किया जा सकता है.

आगे तो अपनी अपनी सोच है और अपने अपने तर्क. :) इसलिये अच्छा लगा पढ़कर कि आप जागरुक हैं और इलाज की खोज जारी है. शुभकामनायें.

5. dhurvirodhi - May 11, 2007

ये बीमारी है? अजी रहने दीजिये. हम भी वेजिटेरियन है. (इत्ते कि घर में कभी प्याज भी नहीं आई और खाई.)
श्रीश जी सही फरमाते हैं “यह बीमारी नहीं बीमारी से बचाव है। आप मांसाहारियों की तरह न सोचिए शाकाहारियों की तरह सोचिए।”
और अब बदलने की बात छोड़ दीजिये. बल्कि आप कुछ अच्छी वेजिटरियन रेसिपी शेयर कीजिये.

6. अभिनव - May 11, 2007

मेरे मन में भी इस विषय पर कुछ अनुत्तरित प्रश्न हैं।
१ क्या लोक परलोक का शाकाहारी या मांसाहारी होने से कुछ संबंध है। मैंने एक बार किसी प्रवचन में सुना था कि यदि कोई मांस खाता है तो उसको एक विशेष प्रकार की अधोगति प्राप्त होती है। प्याज़ तथा लहसुन पर भी कुछ लगभग वैसी ही अधोगति की बात की गई थी।
२ क्या मांसाहारी लोग ज़्यादा बलवान होते हैं। हमारे एक मित्र नें अपने मैंनेजमेंट स्कूल में एडमीशन के समय प्रोफाइल में लिखा था कि “मैं शाकाहारी हूँ, परंतु जिम में मैं मांसाहारी लोगों से अधिक वज़न उठा लेता हूँ।” जब भारत पर बाहरी आक्रमण हुए तो भी ये बात उछली थी कि ये लोग मांस खाते हैं तभी हम पर विजय प्राप्त कर रहे हैं।

प्रश्न और भी हैं जिनका उत्तर नहीं मिला है। आपका लेख पढ़ा तो अचानक मन में यह विचार आए अतः टिप्पणी में लिख रहा हूँ।

7. arun - May 11, 2007

देखिये अपन तो पुरे १००% हिन्दू है हमारे घर मे प्याज लहसुन तक खाने पर प्रतिबन्ध था और है हम भी समझ गये की यह वस्तुये वर्जित है, और चिकन मटन भले खाले पर अगर प्याज लहसुन हो तो अपन तुरई तक नही खाते

8. मुन्ने की मां - May 11, 2007

पती की पसन्द का ध्यान तो हमेशा रखना पड़ता है।

9. mamta - May 11, 2007

रचना जी यूं तो हमारे घर मे माँसाहारी खाना बहुत पसंद किया जाता है और हम बनाते भी है। पर आपको ये सुनकर आश्चर्य होगा की शादी के बहुत साल बाद हमने चिकेन ,mutton को छूना शुरू किया। और हम जब भी खुद बनाते है खा नही पाते है । और खरीदने का तो ये हाल है कि दिल्ली मे तो हर चीज की होम डिलिवरी होती है पर यहाँ गोवा मे जाना पड़ता है तो हमारे बेटे लाते है। हम खुद नही खरीद सकते।

10. अभय तिवारी - May 11, 2007

यह वास्तव में बीमारी है.. आप नहीं खातीं न खायें.. पर यदि दूसरे खाते हैं तो खाने दें उसमें इतनी तीव्र प्रतिक्रिया ठीक नहीं.. मैं भी नहीं खाता.. जीव मात्र पर हिंसा बुरी लगती है.. पर समाज में अकेले मैं थोड़ी हूँ.. दूसरों की राय और पसन्द का आदर करना पड़ता है.. आप इसे सहज तौर पर लेने का अभ्यास डालें.. और आपके कारण ही ये आपकी बेटियों में भी जा रहा है..
मेरी सलाह को अन्यथा मत लें.. आपने खुद इसे बीमारी कहा इसलिये मुझे भी इतना कहने का साहस हुआ..

11. Dawn - May 11, 2007

वाह ..रचना जी मुझे नहीं पता था के आप यहाँ पर लिखतीं हैं…
हम तो दूसरे हिन्‍दी ब्‍लोग पर पधार कर चले जाते थे…आज आपकी अँग्रेजी़ ब्‍लोग पर
पोस्‍ट पर नज़र गई तो यहाँ तक पहुँचे ः)
हम भी शाकाहारी हैं, कभी कभार चिकन खाने लगे कॅनाडा में लेकिन अमरिका
आकर वो भी बँद हो गया…अजीब सा स्‍वाद लगता है…वाकई सॅलेड जिंदाबाद

12. Pratik Pandey - May 11, 2007

वाक़ई बड़ी भयंकर बीमारी है आपको। शायद कई हिन्दू घरों में मांसाहार को बचपन से ख़राब बताया जाता है और इसी का परिणाम होता है ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्याएँ।

13. manya - May 11, 2007

यह तो अपने अपनी आदत की बात है.. और उस परिवेश की जिस्में हम पले बढे हैं.. मेरे यहां तो ये स्मस्या मेरी मम्मी, दीदी भाभी और मुझ्में सभी में है.. पर मैने बस खुद को इतना बदला है की खाने के लिये शुद्ध शाकाहारी रेस्तरां नही खोजती .. वरना घर की बाकी महिलायें सब का यही हाल है. सामने आने पर मेरा भी जी घबराने लगता है….पर कोशिश करती हूं ये आदत सुधर जाये.. और किसी और के खाने पर मुझे फर्क नहीं पड़े.. पर अभी तक तो नाकाम्याब ही हूं…

14. Manish - May 11, 2007

शाकाहारी तो हैं । पर मांसाहारी लोगों के साथ भी खा लेने की क्षमता रखते हैं । आपके बच्चों की आदत में बदलाव आएगा जब वो हास्टल में जाएँगे।

15. प्रियंकर - May 11, 2007

शाकाहारी हूं पर प्याज-लहसुन वाला . दो-चार बार अंडा भी खाया होगा . सत्रह साल से ऐसे इलाकों में हूं जहां मांसाहार आम है . अब इतनी टॉलरेंस तो विकसित कर ली है कि कोई खाता रहे अपने राम उसे भूलकर अपनी दुनिया में मगन हो जाते हैं . सब्ज़ी-भाजी जहां से लेनी है वहां का रास्ता भी चिकन-मटन-मछली-चिंगड़ी के बीच होकर है .पत्नी जो रचना जी से थोड़ी ही कमजोर पड़ती हैं इस मामले में, उन्हें भी यही सीख देता हूं .

हालांकि कोई बंदिश नही लगाई है(बंदिशों अक्सर टूट जाती हैं) पर बच्चे अभी तक पूरी तरह शाकाहारी हैं . चूंकि वे बचपन-जन्म से यहीं हैं सो उन्हें यह सब देखकर उतना अज़ीब भी नहीं लगता है . पर शादी-विवाह-पार्टी में हम एक अज़ूबा की तरह अलग से नज़र आते हैं . कई लोग इसे लेकर उतने संवेदनशील नहीं होते, तो कई इसे लेकर बड़े ‘अपोलोजेटिक’ हो जाते हैं और अलग व्यवस्था की व्यग्रता में पड़ जाते हैं .

सबसे दुविधापूर्ण स्थिति तब हुई जब एक हाउसिंग सोसाइटी के सचिव और उत्सव पर आयोजित दावत के के पहले अबंगाली मुख्य व्यवस्थापक के रूप में यह प्रश्न सामने आया . कुछ परिवारों के विरोध के कारण पिछले कुछ वर्षों से सिर्फ़ शाकाहारी खाना ही बन रहा था . पर बहुसंख्यक लोगों का यह मानना था कि यदि मांसाहारी खाना नहीं बनता है तो उन्हें,विशेषकर उनके बच्चों को यह दावत दावत जैसी नहीं लगती है . इस पर शाकाहारी परिवारों का यह कहना था कि तब वे इस भोज में शामिल नहीं होगे . आप मेरी स्थिति का अंदाज़ा लगा सकते हैं .

मैं यह भी चाहता था कि कोई किसी के खान-पान को ‘रेस्ट्रिक्ट’ न करे और यह भी कि सब शामिल भी हों . अन्ततः यह हुआ और बहुत अच्छी तरह से हुआ . एक शाकाहारी ने दावत में मांसाहारी ‘डिश’ बन सके इस हेतु पर्याप्त मानसिक उद्यम किया . जीवन ऐसे ही चलता है .

16. ghughutibasuti - May 11, 2007

समस्या गम्भीर है किन्तु जब तक भारत में हैं तब तक इतनी कठिन भी नहीं । मन को कड़ा कीजिये और देखिये औरों को खाते हुए । मेरे घर में भी पूरा सात्विक वातावरण था । विवाह के बाद मीट भी बनाया, मछली भी, चिकन भी ,झींगा भी । मछली को काटा भी पकाया भी । दुकान से लटकते हुए बकरे से चुनकर मीट खरीदा भी । चुनकर मुर्गों को कटवाया भी । बाच्चियों को भी अपने हाथ से खिलाया । आज भी शाकाहारी हूँ । प्याज एक बार रो धो कर चल जाता है किन्तु लहुसुन नहीं ।
यह जीवन है, यहाँ तालमेल बैठाये बिना नहीं जिया जा सकता । यह बात और है कि आज भी माँस बनाने के बाद पूरा दिन लगता है कि हाथों से बास आ रही है । खैर शाकाहारियों के लिए गुजरात बहुत बढ़िया जगह है ।
घुघूती बासूती

17. बेजी डाक्टर क्यों हैं? मेरी टीचर क्यों नहीं हैं? « धुरविरोधी - May 11, 2007

[...] जी ने मांसाहार और मै लिख कर हमारी कल की शिकायत दूर कर दी. [...]

18. अनूप शुक्ला - May 11, 2007

हम तो ऐसे शाका हारी हैं जो लोगों का दिमाग खाते हैं! :) हम किस श्रेणी में आयेंगे। वैसे लेख इस मायने में सफल रहा कि कई साथी लोगों के विचार इस मामले में सामने आये। सहज सरल भाषा में अपनी बात कह लेना आपकी ताकत है!

19. रचना - May 12, 2007

@ श्रीश जी, मै मांसाहारी नही होना चाहती, लेकिन किसी और की रुचियों का असम्मान भी नही करना चाह्ती..और फिर दुनिया मे कई लोगों की जीविका इस पर निर्भर है…

@ दिव्याभ, हाँ ये आदत की बात है..
**मूझे वेजिटेरियन मात्र घास-फूस ही नजर आता है** :)

@ मिश्रा जी, इस तरह का मजेदार वाकया तो मेरे साथ भी हो चुका है.. एक जगह भोज मे मैने मजे से बिरयानी ( जो मुझे बघारे हुए चाँवल की तरह दिखी ) की प्लेट ले ली!! मेरे मित्रों की शरारती निगाहों से मै गडबड समझ पाई…और ‘सकुशल’ घर लौटी!

@ समीर जी, **शाकाहारी होना तो बहुत अच्छी बात है. मैं मात्र शाकाहारी नहीं हूँ, यह भी बहुत बुरी बात नहीं है. खाना या न खाना तो व्यक्तिगत पसंदगी की बात है**
** क्या पता आप कब किस माहौल में हों, क्या पता. खाना तो कतई आवश्यक नहीं मगर दूसरे के खाने पर या मात्र देखकर उबकाई न आये, इतना सा तो डेवलप किया जा सकता है.**

इसीलिये तो मैने इसे बीमारी कहा…कोशिश जारी है. धन्यवाद!

@ धुरविरोधी जी, मुझे नही पता चिकित्सा विज्ञान मे इस तरह की कोई बीमारी है या नही. :) मै बदल नही रही लेकिन दूसरों का सम्मान करना तो आना ही चाहिये ना!
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ अभिनव, आपके प्रश्नों के उत्तर देने जितना अध्ययन नही है मेरा, लेकिन अगर आपने ही आस-पास के समाज पर नजर दौडाएँ तो दोनों ही प्रश्नों के जवाब कुछ हद तक मिलेंगे.
**क्या मांसाहारी लोग ज़्यादा बलवान होते हैं। हमारे एक मित्र नें अपने मैंनेजमेंट स्कूल में एडमीशन के समय प्रोफाइल में लिखा था कि “मैं शाकाहारी हूँ, परंतु जिम में मैं मांसाहारी लोगों से अधिक वज़न उठा लेता हूँ।”**
वो भला मानस क्या अपनी बलवानी से मैंनेजमेंट करेगा? :)
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ अरुण जी, ** और चिकन मटन भले खाले पर अगर प्याज लहसुन हो तो अपन तुरई तक नही खाते**
वाह!!! :)
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ दीदी, **पती की पसन्द का ध्यान तो हमेशा रखना पड़ता है।**
क्या ही अच्छा हो पति भी हमारी पसँद का जरा-बहुत ध्यान रख लें!!
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ ममता जी, आप बना भी लेती हैं, बडी बात है!
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ अभय जी,
**मेरी सलाह को अन्यथा मत लें.. आपने खुद इसे बीमारी कहा इसलिये मुझे भी इतना कहने का साहस हुआ..
..**
बिल्कुल नही जी!! टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!
**यह वास्तव में बीमारी है.. आप नहीं खातीं न खायें.. पर यदि दूसरे खाते हैं तो खाने दें उसमें इतनी तीव्र प्रतिक्रिया ठीक नहीं….दूसरों की राय और पसन्द का आदर करना पड़ता है.. आप इसे सहज तौर पर लेने का अभ्यास डालें..**

मै ये समझ रही हूँ और इसीलिये प्रयास कर भी रही हूँ..

20. रचना - May 13, 2007

@ डॉन, तुम्हे यहाँ देखकर मै बेहद खुश हूँ!!
मैने तुम्हारी टिप्पणी के जवाब मे बताया तो था, कि मै यहाँ लिखती हूँ!
वैसे मुझे उस ब्लॉग पर प्रचार करना अजीब लगा था…खैर तुम्हे अब मेरा नया पता मिल गया है तो आया करना
यहाँ!!
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ प्रतीक जी,
**शायद कई हिन्दू घरों में मांसाहार को बचपन से ख़राब बताया जाता है और इसी का परिणाम होता है ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्याएँ।**
मुझे मेरे घर मे ऐसा बिल्कुल नही सिखाया गया..किसी के खाने को खराब बताने का मुझे कोई हक नही है यही सिखाया गया है!!
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ मान्या जी, आपने बिल्कुल थीक कहा ये आदत की बात है और मै अपनी आदत सुधारने की कोशिश कर रही हूँ!
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ मनीष जी, मै बच्चों के लिये ही चिन्तित हूँ..मेरा काम तो चल ही गया!!

@ प्रियँकर जी, आपके विचार बाँटने के लिये बहुत शुक्रिया!! जैसे की आपने बताया-
* जीवन ऐसे ही चलता है.*
मै भी जीवन सुचारु रुप से चले, इसीलिये प्रयासरत हूँ!
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!

@ घुघुति जी,आपने तो कमाल कर दिया!! और आपके विवरण ने तो मेरे रोंगटे खडे कर दिये!
मुझे बनाना तो शायद कभी भी नही पडेगा, लेकिन साथ खा लूँ, इतना जरूर कर लूँगी…
**यह जीवन है, यहाँ तालमेल बैठाये बिना नहीं जिया जा सकता**
ठीक कहा आपने!! शुक्रिया!

@ अनूप जी,
** हम तो ऐसे शाका हारी हैं जो लोगों का दिमाग खाते हैं! हम किस श्रेणी में आयेंगे। **
आपकी श्रेणी- ” विशिष्ट श्रेणी” :)
टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!!

21. फुरसतिया » जीवन मे हम सबको यूँ ही बस आना है.. - June 10, 2007

[...] पोस्ट नॊनवेजिटेरियोफ़ोबिया में सामिष खाने के प्रति अपनी [...]

22. अजय - October 28, 2007

शाकाहार और माँसाहार के बीच मानसिकता की लडाई नई नही, लेकिन कई बार सहनशीलता भी जरुरी होती है