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ये ब्लॊगर मन… May 13, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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वैसे तो इस पोस्ट का वास्तविक शीर्षक “सत्संग” होता लेकिन मैने डर के मारे नही दिया, क्यो‍ कि अगर सत्संग मे रूचि रखने वाले लोग यहां पढने आये तो उन्हे निराशा होती या ऐसे लगता- ” खोदा पहाड़ निकली चुहिया” !  ये बात जरूर है कि आजकल कई चिट्ठो‍ के शीर्षक ऐसे ही दिये जा रहे है‍ जिनका लेख से तालमेल ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा है..

मुद्दे की बात यह कि मै अभी- अभी एक प्रवचन सुनकर लौटी हूं, और उसी के बारे बताना चाहती हूं…वैसे अब हमारे परिवार के लिये यह बहुत रुचि का क्षेत्र नही है लेकिन समाज मे रहते है‍ तो किन्हीं कार्यक्रमो‍‍ मे उपस्थिति लगाना अनिवार्य हो जाता है..आमतौर पर ये काम ’वे’ करते है‍, उनके व्यक्तित्व के हिसाब से उन्हे ये काम सूट करता है, मतलब मेजबान को समझ मे आ जाता है कि भाई इन्हें जाने दिया जाए!…मेरे लिये ऐसे काम बहुत कठिन होते है‍, क्योंकि मैं अपने अरुचि के क्षेत्र पर भी बाते‍ बना लेती हूं, ताकि मेजबान प्रसन्न रहे… :) तो मैं जल्दी छूटकर आ नही पाती वापस..

आज मुझे जाना पड गया उपस्थिति दर्ज कराने….एक महाराज जी का प्रवचन था. एक बढिया से लॊन मे प्रवचन था, आयोजक भी उच्च मध्यमवर्गीय और जनता भी उच्च मध्यमवर्गीय थी….कलर्ड बालों‍ और लक-दक साड़ियों‍ में कई बहुएं अपनी सासू मां के साथ आई‍ं थी. ये भी अब एक स्टॆटस सिम्बल बन चला है कि अमुक परिवार अमुक बाबा के अनुयायी है‍!  सप्ताह की दो किटी पार्टी के साथ एक समाजसेवा का कार्यक्रम और एक किसी महाराज का प्रवचन लगभग तय रहता है!

वहां पहुंची तो पहले ५-१० मिनट, मेरी ही तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आई अपनी मित्र को ढूंढती रही..फ़िर मन मान कर अकेले ही बैठ गई..मन लगाने की कोशिश की लेकिन ये बैरी ब्लॊगर मन इधर उधर के निरीक्षण में ही मशगूल था..मैने देखा कि लोग समूहों‍ में थे और ज्यादातर आपसी बातचीत में ही लगे थे..बच्चे भी इधर उधर दौड रहे थे और् मांएं उन्हे पकड कर बैठाने के असफ़ल प्रयास मे लगी थी‍…महाराज जी की बातों में किसी को कोई खास दिलचस्पी हो, ऐसा लगा नही….प्रवचन सुनना कम और सोशल गेदरिंग ज्यादा हो रही थी….

मेरे जैसे अकेले आये हुए “ब्लागर माईन्डेड” लोग ( पहले लोग ’नैरो’ और ’ब्रॊड’ माईन्डेड होते थे अब “ब्लागर माईन्डेड” भी होने लगे‍गे जिनका ’नैरो’ और ’ब्रॊड’ से अलग एक विश्लेषण करने वाला द्रष्टिकोण होगा! ) अपनी पोस्ट के बारे मे सोच रहे हो‍गे शायद! मैने भी ये पोस्ट वहीं लिख डाली थी दिमाग मे…. मेरा भी मन जरा नही लग रहा था वहां.. चिट्ठाजगत के ‘समीरानन्द महाराज’ के प्रवचन से ‘निर्मल आनन्द’ की प्राप्ति की आदत जो हो गयी है……..

Comments»

1. राजीव - May 14, 2007

सही है कि प्रवचन, सत्संग आदि आज के मध्यमवर्गीय व उच्च मध्य वर्गीय समाज में परिपाटी व रुतबे का स्थान ले चुके हैं।

आप पूर्णत: ब्लॉगर माइंडेड होती जा रही हैं। तो पहुंचिये शीघ्र ‘समीरानन्द महाराज’, के चिट्ठा-रूपी आश्रम में। वहीं सुख की अनुभूति मिलेगी!

2. arun - May 14, 2007

“क्या लिख कर लाया था क्या लिख कर ले जायेगा जो कुछ लिखा है बाबा को समर्पित करदे बालक” बाबा अपने ब्लोग पर अपने नाम से छाप लेगे तू लोगो के टिपीयाने और हिट चिन्ता मुक्त होजा,मस्त रह एश कर और,और लिख
“पंगेबाज बाबा वचन”

3. अनूप शुक्ल - May 14, 2007

यह देखकर अच्छा लग रहा है कि आप भी ब्लागर माइंडेड हो रहीं हैं और नियमित लेखन करने लगीं हैं। बाबा लोग आते होंगे प्रवचन के लिये इसलिये इतना लिखकर हम चलते हैं। आप फुरसत से प्रवचन का निर्मल आनन्द लें! :)

4. Rajesh Roshan - May 14, 2007

बड़ा ही चंचल मन है आपका । कम से कम आपको कुछ तो सुनना चाहिऐ। अभी तो आपने वह के माहोल के बारे में लिखा है। सत्संग सुनती तो उसके अच्छे बुरे के बारे में लिखती । वैसे ये ब्लॉगर मन होता ही ऐसा है।

5. Shrish - May 14, 2007

अब क्या बताएं ये ब्लॉगिया मन हमें कहीं नहीं छोड़ता। रास्ते में स्कूल बस में, फ्री पीरियडों में, वापस आते हुए बस में और रविवार को तो पूरे ही दिन। कोई इसका इलाज निकालो भाई। :)

6. Dawn - May 15, 2007

Sahi farmaya aapne…aksar hum bhi iss duvidha se guzre hein aur kayee baar hamare blog ka ek shirshak bankar bhi raha hai!
…khush rahein sada

Cheers

7. रचना - May 15, 2007

@ राजीव जी,
//आप पूर्णत: ब्लॉगर माइंडेड होती जा रही हैं। //
ये पोस्ट इसी की उपज है. :)

@ अरुण जी, वाह बाबा!! आपने तो एकदम “ब्लॊग सार” ही बता दिया! धन्यवाद इसके लिये! :)

@ अनूप जी, धन्यवाद!

@ राजेश जी,
//सत्संग सुनती तो उसके अच्छे बुरे के बारे में लिखती//
नही जी ये भी जिसकी उसकी पसंद का मामला है!

@ श्रीश जी, :)

@ डॊन, लगता है एक दम जनरल दुविधा है ये !टिप्पणी के लिये शुक्रिया.

8. समीर लाल - May 15, 2007

बैरी ब्लॊगर मन , ब्लागर माईन्डेड जैसे गहन शब्दों का इस्तेमाल आपको ब्लॉग जगत में उच्चतम ब्लॉग स्थान दिलवायेगा, ऐसी मेरी ब्लॉग शुभकामनायें हैं.

जो आपके साथ हुआ, यह एक पक्के ब्लॉगर बन जाने का प्रमाण है. आप सिद्धि प्राप्त ब्लॉगर हो चुकी हैं. यही ब्रह्म है और यही ज्ञान!!

अब किसी ज्ञान की आवश्यकता नहीं. बाकी सब साधुबाबा जी का ढकोसला है.

बधाई रख लें. :)

9. RC Mishra - May 15, 2007

आपने गहन शोध कर डाला है, ‘मन’ जैसे ‘चंचल’ को आप्ने ब्लॉगर घोषित किया।
शीघ्र ही अन्य रोचक परिणामो की प्रतीक्षा रहेगी।
धन्यवाद।

10. divyabh - May 16, 2007

अगर यहाँ सत्संग भी होता हो मजा ही आता…।लिखती तो सुदर है ही अब तो गहता पर गहता ही होना है…।

11. rachanabajaj - May 17, 2007

@ समीर जी,
// आप सिद्धि प्राप्त ब्लॉगर हो चुकी हैं. यही ब्रह्म है और यही ज्ञान!!// :) :)
आपकी ब्लॉग शुभकामनाओं के लिये ढेर सारा बलॉग धन्यवाद!

@ मिश्रा जी, जैसे ही कोई अन्य रोचक परिणाम मिलेंगे, आपको बताउँगी जरूर!

@ दिव्याभ, इतनी अच्छी बातें कहने के लिये बहुत ध्न्यवाद!

12. anirudhh - June 7, 2007

yaha hindi kaise type ki jaati hai

13. दिवाकर मिश्र - August 15, 2007

रचना जी, आपके ब्लॉगर् मन को क्या कहा जाए, एक पक्ष में तो यह सत्संग के नामपर होने वाली स्टेटस बाजी की पहचान करवाता है और दूसरी ओर प्रवचन की बातें नहीं सुनने देता, आपको भी उसी प्रकार की कैटेगरी में खड़ा कर देता है जो करने कुछ जाते हैं पर करने कुछ लगते हैं । मेरी बातों को अन्यथा मत लीजिएगा । जरूरी नहीं कि इसमें आपकी गलती उभर कर आती हो, सत्संग की क्वालिटी भी मैटर करती है कि वह लोगों के लिए उपयोगी और रोचक है या बस ध्वनि-विलास मात्र ।

14. दिवाकर मिश्र - August 15, 2007

अगर देखा जाए तो प्रवचन में ऐसा माहौल बनाने के लिए प्रवचन में होने वाली बातें भी उत्तरदायी हैं । हर प्रवचन में ऐसा नहीं सुनने को मिलता जो उपयोगी हो और लोग उससे अपने को जोड़कर देख सकें । पर प्रवचन की भारतीय परम्परा बिना शुल्क लिए ज्ञान बाँटने के लिए बड़ी उपयोगी रही है जिससे आपके “मेरा परिचय” ब्लॉग की शिक्षा सम्बन्धी शिकायत का समाधान होता है । यद्यपि आजकल प्रवचन का मोटा पैसा लिया जाने लगा है पर प्रवचन की जो भारतीय परम्परा रही है, उसमें इस आडम्बर-पूर्ण प्रवचन का स्थान नहीं दिखता ।