” ये ‘फ़ाय’ क्यूं ज्ला रए हो?”
“ये ‘फ़ायर’ क्यूऊऊऊं जला रहे होओओ?”
ढाई वर्षीय वैदेही ने जब कई बार मुझसे ये प्रश्न पूछा तब जाकर मै समझ पाई कि वो सुबह् सूखी पत्तियो को जमाकर कचरे को जलाने के बारे मे पूछ रही है…
वैदेही की भाषा हमारे लिये थोडी अटपटी सी है. उसके हिन्दी के एक वाक्य मे कम से कम एक अन्ग्रेजी का शब्द जरूर होता है. मसलन कुछ दूर चलने पर वह ‘टायर्ड’ हो जाती है, उसे प्यास नही लगती, वो ‘थर्स्टी’ होती है, वो अपना दूध या खाना ‘फ़िनिश’ करती है, उसे अच्छा या बहुत अच्छा नही बल्कि ‘गुड’ या ‘वेरी गुड’ लगता है…..
वैदेही महानगर मे रहती है और २ साल की उम्र से ही ‘प्ले स्कूल’ मे जाती है जहाँ शायद उसे आवश्यक रूप से खेलना पडता होगा! वहाँ स्कूल मे और बगीचे मे खेलते समय अन्य बच्चों के साथ वह् अन्ग्रेजी सुनती है और घर मे हिन्दी. उसकी भाषा “हिंग्लिश” है!
वैदेही का अपनी दादी से ‘जनरेशन गैप’ तो है ही एक ‘लैन्ग्वेज गैप’ भी हो गया है…दादी उसे प्यासे कौवे की या कछुए और खरगोश की कहानी सुना सकती है, जो उसने वैदेही के पिता को सुनाई थी, लेकिन वैदेही को “थर्स्टी क्रो” और “हेअर ऎण्ड टॊरटॊइज” की कहानी सुननी है……
ऐसी भाषा वैदेही की नियती है ( जब तक वो कुछ बडी नही होती तब तक) और उसके माता पिता की मजबूरी…उसे सामान्य अन्ग्रेजी का ज्ञान जरूरी है क्यो कि उसे तथाकथित अच्छे स्कूल मे प्रवेश पाकर शिक्षा पाने का महायज्ञ शुरु करना है और उसके माता पिता को तथाकथित अच्छे स्कूल मे प्रवेश दिलवाने के महासंग्राम मे विजय पानी है! हिन्दी तो वे उसे बाद मे सिखा ही लेंगे!
मेरे गांव की तरफ़ इन दिनो एक चुटकुला चलता है…. जहाँ अभी गाय “काउ” नही हुई है और कुत्ता “डॊग” या “डॊगी” नही हुआ है!
वहाँ इन दिनो किसान भी अपने बेटो को पास के शहर मे अन्ग्रेजी स्कूल मे भेज रहे हैं… उनकी भी मजबूरी है क्यो कि क्या पता भविष्य मे किस दिन उनके गांव मे देश को विकसित बनाने वाला “प्रोजेक्ट” आ जाए और वो उनके जीने के हक को ही “रिजेक्ट” कर दे!!
ऐसा ही एक बच्चा जब अपनी अन्ग्रेजी स्कूल से छुट्टीयों मे गाँव आया है तो उसकी दादी उसे डंडा देकर घर के बाहर जहाँ धूप मे गेहूँ रखा है, बैठाती है और कहती है कि गाय आकर अनाज न खाये इसका ध्यान रखे….
कुछ देर बाद दादी बाहर आकर देखती है कि गाय मजे से गेहूँ खा रही है…. वो जब बच्चे को पूछती है कि उसने गाय को भगाया क्यो नही तो बच्चा कहता है कि “ये तो “काउ” है”!!!
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ये पोस्ट मुझे थोडा दुःखी कर रह है। मेरे कई सारे दोस्त ऐसे हैं जो ना तो अच्छी हिंदी जानते हैं और ना ही अच्छी अंग्रेजी। बड़ी अच्छी बात है कि वैदेही काउ जानती है लेकिन साथ ही इसमे हमे चिन्ता करनी चाहिऐ कि वो गाय क्यों नही जानती? गाय जान जाना उसे अन्य बच्चो से अलग कर देगा। हमे कोशिश करनी चाहिऐ।
Sorry lekin meri gujarish hai ki aap is post ko ek baar padhe
http://merasapna.wordpress.com/2007/05/17/kids-thought/
बच्चे क्या करें. दो भाषाओं के बीच फंसकर वो तो खुद ही परेशान हैं बेचारे. और हिंग्लीश तो सामान्य बोलचाल की भाषा है, प्रचलन में है. आवश्यक्ता बस इतनी सी है कि वो गाय का अर्थ गाय और काऊ दोनों से समझ सकें. वो भी समय के साथ साथ आ जाता है. दुखी तो मैं उन बड़े बच्चों से हो जाता हूँ जिन्हें छ्यासी कहो तो वो एट्टीसिक्स कहकर पक्का करते हैं कि उन्होंने ठीक समझा न!!(You mean eightysix??)
बहुत दुखद है भाषा का इस तरह बिगड़ना पर जब टीवी धारावाहिकों में अपने मम्मी पापा को इस हिंग्लिश में बात करते वैदेही सुनेगी तो यही सब सीखेगी। असली दोषी तो बच्ची के मम्मी पापा है।
वैदेही की तरह ही हमारे यहाँ साक्षी है। साक्षी के माता पिता राजस्थानी है पर गुजरात में रहें है और दोनों ही बड़ी कम्पनियों में नौकरी करते हैं सो साक्षी भी इसी तरह बात करती है।
जब साक्षी की बातें सुनता हूं तब बड़ा दुख होता है।
माफ कीजिये टीवी धारावाहिकों और अपने मम्मी पापा को पढ़ें
रचनाजी, आपने लेख तो बढ़िया लिखा है। अब यह देखना जरूरी है कि कौन से ऐसे कारण हैं जिनके चलते हम लोग भाषा के मामले में सहज समर्पण करते जा रहे हैं।
अच्छा लेख । आज हालात ऍसे हैं कि नौकरी में अधिक संभावनाएँ अंग्रेजी जानने से ही मिल बढ़ रही हैं । शायद यही वजह है कि माता पिता स्कूलों में बह रही इस हिंग्लिशी बयार पर आँख मूंदे बैठे हैं ।
सीधे सपाट शब्दों में आज का सच चित्रित करने पर बधाई।
@ राजेश जी, आपकी पोस्ट पढी..आपकी चिन्ता जायज है…लेकिन ये भी उतना ही सच है कि बच्चों को अन्ग्रेजी आनी भी जरूरी है..शायद हिन्दी आने से भी ज्यादा…
@ समीर जी, ठीक कहा आपने वैदेही समय के साथ साथ सब सीख जायेगी..लेकिन अभी के लिये उसे ‘गाय’ मालूम होने से ज्यादा जरूरी है ‘काउ’ मलूम होना!
@ सागर जी,
//असली दोषी तो बच्ची के मम्मी पापा है।//
दोषी हैं या नही लेकिन मजबूर जरूर हैं..
आपकी टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद.
@ अनूप जी, आपने कहा-
//अब यह देखना जरूरी है कि कौन से ऐसे कारण हैं जिनके चलते हम लोग भाषा के मामले में सहज समर्पण करते जा रहे हैं। //
आपसे अपेक्षा है कि आप कारणों की समीक्षा करें और हमे भी बतायेँ..
आपकी टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद.
@ मनीष जी और रत्ना जी, आपकी टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद.
रचना जी इंग्लिश के शब्दों से परहेज भले ही न हो लेकिन ऐसी भी इंग्लिश न हो कि भाषा की मधुरता ही नष्ट हो जाए। इंग्लिश की आवश्कता संबंधी आपके विचारों से सहमत हूँ लेकिन कहीं ऐसा न हो कि दो-तीन पीढ़ियों बाद हमारे बच्चे हिन्दी को भूल ही न जाएं।
रचना जी क्या किया जाए मैं तो Direction Field का आदमी हूँ मेरे यहाँ लोग सिनेमा हिन्दी में बनाते हैं पर Script या तो हिंग्लिश में लिखना होता है या इंग्लिश में…।
इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी जिसे कला का सर्वोत्तम माध्यम माना जाता है जहाँ सब एक साथ आ जाता है वह भी ऐसे लोगों के द्वारा किया जाता है जिन्हें हिंदी ही नहीं आती…।
आप तो नाहक ही “टेंशन” ले रही हैं। यह तो “डेस्टिनी” है और इसे “चेंज” नहीं किया जा सकता। हाँ, “डेस्टिनी” कुछ “सेड” ज़रूर है।