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राम से मुलाकात……. September 28, 2007

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आत्मबल September 23, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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हम कितना भी चाहें, लेकिन
वक्त कहाँ रूक जाया करता,
कुछ अनपेक्षित घट जाने से
जीवन कब थम जाया करता.

मानव हूँ ना! चलनशील हूँ!

दुख तो आते जाते रहते
दु:खों से घबराना कैसा,
जो नीयत है वो होगा ही
नियति से टकराना कैसा.

शिक्षित हूँ ना! मननशील हूँ!

खुशी मिले तो उन्हे बाँट दूँ
दु:ख अपने सारे मै पी लूँ,
जितनी साँसें शेष हैं मेरी
उतना जीवन जी भर जी लूँ.

नारी हूँ ना! सहनशील हूँ!

रूकने से कब काम चला है
जीवन मे अब बढना होगा,
खुद अपने से हिम्मत लेकर
बाधाओं से लडना होगा.

कर्मठ हूँ ना! कर्मशील हूँ!

भेंट….. September 17, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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 अभी अभी ‘निर्मल आनंद’ की पोस्ट मे, कल मुम्बई मे हुई चिट्ठाकारों की मुलाकात के बारे मे पढा.वहीं से पता चला कि कल फुरसतिया जी’का जन्मदिन था.उन्हे जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ (देर से ही सही).

 कल सुबह ५.३० पर अनूप जी, आशीष, दीपक और मैने मेरे घर पर साथ ही चाय पी थी. मुझे नही पता था कि अनूप जी का जन्मदिन है और उन्होने खुद भी नही बता कर हमे शुभकामनाएँ देने से वन्चित रखा.

अनूप जी और आशीष से मेरा परिचय चिट्ठाकारी के जरिये ही हुआ, लेकिन जब वे मुझसे और मेरे परिवार से मिलने खासतौर से पूना से नासिक आये और १/२ घन्टे रुकेंगे कहते कहते लगभग एक दिन को रुके तो लगा हमारी बरसों पुरानी पहचान है.

 कुछ दिनों से मै चिट्ठाकारी की दुनिया से दूर हूँ, लेकिन कुछ चिट्ठकार मित्र मेल द्वारा सम्पर्क मे बने रहे और लिखने पढने के लिये कहते रहे. आज ये कविता पोस्ट कर रही हूँ, जो मैने अपनी बेटी के लिये लिखी है.आशा है अनूप जी इसे एक छोटी सी भेंट स्वरूप स्वीकार करेंगे, इसी शिकायत के साथ की उन्होने मुझे सुबह अपने जन्मदिन के बारे मे नही बताया.

स्मृति-शेष….

मुझसे क्यूँकर तुम हुई बडी,
तारों मे जाकर हुई खडी,
मेरी बेटी तुम थी विशेष,
मेरी पूँजी ये स्मृति शेष….

रहती हो तुम वो कौन जहाँ?
कैसे ढूँढू मै तुम्हे, कहाँ?
चिन्ता होती है मुझे यहाँ,
है कौन तुम्हारे सँग वहाँ?
क्या इस जग से बेहतर वो देश?
मेरी पूँजी….

थी सौम्य, शान्त और अति गम्भीर,
आँखों मे डबडब भरा नीर!
थी तुम्हे सदा सादगी पसन्द,
नटने थटने का नही छन्द,
लम्बी चोटी, रेशमी केश!!
मेरी पूँजी…..

कपडों मे ज्यादा सूती पहना,
गहने का धातु बस सोना,
न ‘जन्क फूड’ न ‘फास्ट फूड’,
न चमक दमक, न शोर गुल,
साधा खाना, साधा परिवेश!!

“रो मत आ चल हम तुम खेलें,
मेरी टॉफी भी तू ले ले”
छोटी से ये सब कहे कौन?
है वो स्तब्ध, रहते है मौन.
तुम बिन उसमे है भरा क्लेश.
मेरी पूँजी….

मै लिखती, तुमको दिखलाती,
तुम मुँह बिचका कर यूँ कहती-
“ये पन्क्ति यहाँ पर ठीक नही,
हाँ!दूजी पन्क्ति है खूब कही!”
तुम होती थी पहली पाठक,
तुम होती मेरी सम्पादक!
तुमको न भा जाए जब तक,
तुम पास न करती मुझे तब तक!
अब लेखन है जैसे अवशेष..
मेरी पूँजी….

उस दिन दुकान मे जब देखा,
दुबला-पतला, नन्हा बच्चा,
सहमा सा था, कुछ सकुचाया,
था डरा हुआ, कुछ घबराया.
मजबूरी मे कर रहा काम,
बचपन उसका था यूँ तमाम,
देख उसे तुम दुखी हुई,
नन्हे दिल मे करुणा उपजी-
“माँ!इसको कुछ पैसे दे दो,
मेरा ये पेय इसे दे दो”
त्याग को तुम हरदम तत्पर,
जैसे हो कोई ” सन्त- मदर”!
वो घूँट गले मे ही अटके,
मोती जैसे आँसू टपके.
उस पल ही उस पेय को त्याग दिया,
जीवन भर फिर वो नही छुआ.
जब कर लेती तुम दृढ निश्चय,
फिर ना बदलोगी, ये था तय,
था प्रेम सदा, न कभी द्वेष!
मेरी पूँजी…..

है दुखद बहुत तुमको खोना,
इतनी जल्दी भी क्या जाना,
बातें करती, कुछ कहती तो,
कुछ देर को जरा ठहरती तो,

याद तुम्हारी जब आये
मन मेरा बेहद घबराये
इतना मुझे रुलाओ ना,
इतनी दूर को जाओ ना,
तुम बिन जीना मैं जानू ना,
वापिस आओ, आओ जाओ ना।

तुम चली गई हो किस विदेश?
मेरी पूँजी….

तुम बिन, बोलो कैसे जीना?
कितने आँसू, कब तक पीना?
वक्त के साथ न कम होता,
ये दर्द और भी गहराता…
इस जीवन से अब हुआ विद्वेश..
मेरी पूँजी…….