अभी अभी ‘निर्मल आनंद’ की पोस्ट मे, कल मुम्बई मे हुई चिट्ठाकारों की मुलाकात के बारे मे पढा.वहीं से पता चला कि कल फुरसतिया जी’का जन्मदिन था.उन्हे जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ (देर से ही सही).
कल सुबह ५.३० पर अनूप जी, आशीष, दीपक और मैने मेरे घर पर साथ ही चाय पी थी. मुझे नही पता था कि अनूप जी का जन्मदिन है और उन्होने खुद भी नही बता कर हमे शुभकामनाएँ देने से वन्चित रखा.
अनूप जी और आशीष से मेरा परिचय चिट्ठाकारी के जरिये ही हुआ, लेकिन जब वे मुझसे और मेरे परिवार से मिलने खासतौर से पूना से नासिक आये और १/२ घन्टे रुकेंगे कहते कहते लगभग एक दिन को रुके तो लगा हमारी बरसों पुरानी पहचान है.
कुछ दिनों से मै चिट्ठाकारी की दुनिया से दूर हूँ, लेकिन कुछ चिट्ठकार मित्र मेल द्वारा सम्पर्क मे बने रहे और लिखने पढने के लिये कहते रहे. आज ये कविता पोस्ट कर रही हूँ, जो मैने अपनी बेटी के लिये लिखी है.आशा है अनूप जी इसे एक छोटी सी भेंट स्वरूप स्वीकार करेंगे, इसी शिकायत के साथ की उन्होने मुझे सुबह अपने जन्मदिन के बारे मे नही बताया.
स्मृति-शेष….
मुझसे क्यूँकर तुम हुई बडी,
तारों मे जाकर हुई खडी,
मेरी बेटी तुम थी विशेष,
मेरी पूँजी ये स्मृति शेष….
रहती हो तुम वो कौन जहाँ?
कैसे ढूँढू मै तुम्हे, कहाँ?
चिन्ता होती है मुझे यहाँ,
है कौन तुम्हारे सँग वहाँ?
क्या इस जग से बेहतर वो देश?
मेरी पूँजी….
थी सौम्य, शान्त और अति गम्भीर,
आँखों मे डबडब भरा नीर!
थी तुम्हे सदा सादगी पसन्द,
नटने थटने का नही छन्द,
लम्बी चोटी, रेशमी केश!!
मेरी पूँजी…..
कपडों मे ज्यादा सूती पहना,
गहने का धातु बस सोना,
न ‘जन्क फूड’ न ‘फास्ट फूड’,
न चमक दमक, न शोर गुल,
साधा खाना, साधा परिवेश!!
“रो मत आ चल हम तुम खेलें,
मेरी टॉफी भी तू ले ले”
छोटी से ये सब कहे कौन?
है वो स्तब्ध, रहते है मौन.
तुम बिन उसमे है भरा क्लेश.
मेरी पूँजी….
मै लिखती, तुमको दिखलाती,
तुम मुँह बिचका कर यूँ कहती-
“ये पन्क्ति यहाँ पर ठीक नही,
हाँ!दूजी पन्क्ति है खूब कही!”
तुम होती थी पहली पाठक,
तुम होती मेरी सम्पादक!
तुमको न भा जाए जब तक,
तुम पास न करती मुझे तब तक!
अब लेखन है जैसे अवशेष..
मेरी पूँजी….
उस दिन दुकान मे जब देखा,
दुबला-पतला, नन्हा बच्चा,
सहमा सा था, कुछ सकुचाया,
था डरा हुआ, कुछ घबराया.
मजबूरी मे कर रहा काम,
बचपन उसका था यूँ तमाम,
देख उसे तुम दुखी हुई,
नन्हे दिल मे करुणा उपजी-
“माँ!इसको कुछ पैसे दे दो,
मेरा ये पेय इसे दे दो”
त्याग को तुम हरदम तत्पर,
जैसे हो कोई ” सन्त- मदर”!
वो घूँट गले मे ही अटके,
मोती जैसे आँसू टपके.
उस पल ही उस पेय को त्याग दिया,
जीवन भर फिर वो नही छुआ.
जब कर लेती तुम दृढ निश्चय,
फिर ना बदलोगी, ये था तय,
था प्रेम सदा, न कभी द्वेष!
मेरी पूँजी…..
है दुखद बहुत तुमको खोना,
इतनी जल्दी भी क्या जाना,
बातें करती, कुछ कहती तो,
कुछ देर को जरा ठहरती तो,
याद तुम्हारी जब आये
मन मेरा बेहद घबराये
इतना मुझे रुलाओ ना,
इतनी दूर को जाओ ना,
तुम बिन जीना मैं जानू ना,
वापिस आओ, आओ जाओ ना।
तुम चली गई हो किस विदेश?
मेरी पूँजी….
तुम बिन, बोलो कैसे जीना?
कितने आँसू, कब तक पीना?
वक्त के साथ न कम होता,
ये दर्द और भी गहराता…
इस जीवन से अब हुआ विद्वेश..
मेरी पूँजी…….
अति मार्मिक!!
अब फिर से लिखना शुरु करो.
बहुत ही मर्म स्पर्शी है रचना जी, आपकी कविता, आपकी बिटिया के लिए आँखें नम हो गयी ….
रचना जी.. शब्दों का सागर कम पड़ता है इन क्षणों में में.. लगता है कि कुछ नहीं है अपने पास…
अपना ख़्याल रखें..
भेंट के लिये शुक्रिया। शिकायत जायज नहीं है भाई। हमें खुद ही तब पता चला जब हमारे फोन पर संदेशे आने लगे। वैसे दिन की शुरुआत बढ़िया चाय से हुई हुई इसीलिये दिन अच्छा गुजरा। लिखना शुरू करना देखकर अच्छा लगा।
मुझे लगा कि हमारी और आशीष की नासिक यात्रा सफल रही। घर में सबसे मिलकर अच्छा लगा। कविता दुखी कर गई एक बार फिर। आशा है दुख से जल्द सबका उबरना होगा। यही मानते हुये कि दुख है तो दुख हरने वाले भी होंगे और नीरज जी की कविता दोहराते हुये- कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता।
सोच रहा हूँ कुछ लिखूं या ना लिखूं …..भगवान आपको इस दुख में संभाले
ऎसी भगवान से प्रार्थना है…
अति सुंदर कविता…
रचना जी
कुछ कहने को शब्द नहीं है, आज एक बार फिर आँख में आंसू आये हैं, पहली बार जब…..
कई कई दिन तक मैं सहज नहीं हो पाया था। आप अपने स्वास्थय का खयाल रखियेगा।
अच्छी कविता लगी ।मै भी आरहा हूँ रचना जी आपके यहाँ चाय पीने कम से कम मेरा भी कुछ नाम ही होजायेगा।
रचना जी,
आपका पुन: लेखन देख कर अच्छा लगा। यही माध्यम भी बन सकता है, अभिव्यक्ति का और दु:ख बाँटने का भी।
कविता, हृदयस्पर्शी है। बहुत भावपूर्ण विवरण व चित्रण है, साथ ही है, माँ की विवशता भी।
मुलाकात का विवरण भी सटीक। सुबह – सुबह 5:30 पर पहुँच गये – वाकई ब्रह्न-मुहूर्त में ही चल पड़ें होंगे अनूप व आशीष जी। शुभ-कामनाएं तो उनको हमने उनके फोन पर (रोमिंग पर ही सही) पर दे दीँ थी।
पुनः लिखना, सामान्य जीवन में वापस आना ही सबसे अच्छी बात है।
आपको फिर से लिखता देख अच्छा लगा. दिल को छू लेने वाले शब्द है कविता के.
पूर्वी की याद तो जीवन पर्यंत बनी रहेगी… बहुत ही मार्मिक लिखा है आपने… भावपूर्ण चित्रण!
इससे अधिक कुछ भी लिख पाने की स्थिति में नहीं हूँ, पूर्वी को अपनी रचनाओं में हमेशा जीवित रखियेगा।
बहुत ही मार्मिक कविता… पूर्वी को इसी प्रकार से अपनी रचनाओं में हमेशा जीवित रखियेगा, इससे अधिक कुछ भी लिखने की स्थिति में नहीं हूँ दी, ईश्वर आपको दर्द सहने की शक्ति प्रदान करें।
रचना जी, कोई शब्द नही है…
आपकी रचना के सहारे जो कुछ जाना तो कुछ कहने कि हिम्मत जुटा रही हूँ…
हादसो के सहारे दिन गुजरता नही
वक्त का दरिया कभी थमता नही
उसके यादो को सहारा बनाईये
उसके लिये ही सही, खुशी फैलाईये
बहुत मासुस थी आपकी बेटी
जिसने बच्चे के दर्द को समझा था
खुश रहे बच्चे, उस सपने को सजाईये
शुक्रिया फिर से लिखना शुरु करने के लिए! लिखती रहें।
स्मृति में पूर्वी हमेशा रहेगी…फिर से लिखना शुरु करो रचना।
सस्नेह
[...] सबेरे ही उठकर ,रचनाजी के हाथ की बनी चाय पीकर मुंबई के लिये चल दिये। नासिक से बाहर [...]
मार्मिक पंक्तियां. सच दिल को छू गयी.
नि:शब्द!!
लिखना जारी रखें
रचना जी,
आपका लेखन देख कर अच्छा लगा !कविता, मार्मिक है।
लिखना जारी रखें
दीपक श्रीवास्तव
आपके जीवन में पूर्वी का स्थान इन दो पङ्कतियों से ही झलकता है। ईश्वर पूर्वी को हमेशा खुश रखे तथा आपको सहारा दे।
बहुत ही अच्छी रचना है ,रचना जी आपकी ,दिल को छू गयी .जारी रखें ,जल्दी ही आपके ब्लोग पे फिर आना होगा …और हां आप का हमारे ब्लोग पर भी स्वागत है ।
आप सभी की टिप्पणीयों के लिये शुक्रिया.
@ अनूप जी, मै आपको और किसी को भी दुखी करना नही चाहती इसीलिये इन दिनो नही लिख रही थी क्यों कि मेरे शब्दों से दुख ही झलकता…सामान्य जीवन जीने की कोशिश मे लगी हूँ..आपने सही पन्क्तियाँ दोहराईं हैं…मेरा जीवन और कुछ सपने अब भी शेष हैं..
@ नीशू, चाय पीने आ जाईये..नाम के बारे मे कह नही सकती.
@ गरिमा, आपकी पन्क्तियों के लिये धन्यवाद.
@ बेजी, तुम्हारे स्नेह के लिये धन्यवाद..क्षमा करना, मै तुम्हारी चिट्ठी का जवाब नही दे पाई.
ohh my god that’s really gr8…
क्या कहा जाए… हृदय के कोलाहल में भी एक रेशमी लहर दौड़ गई पढ़कर… पुलकित भी हुआ साथ-साथ विह्वल भी…
आपकी लेखनी में एक छुपा सा भाव है जो प्रकट भी होता है तो शब्दों में भी छुपकर…।
बहुत सुंदर!!!
@ दिव्याभ, आपकी टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद.
[...] वो जमी से गुम है, आकाश से नही! वो इस दुनिया मे न सही, कहीं और सही! वो जिस भी दुनिया मे है, खुश है, तुम इस बात का आभास हो! [...]