आत्मबल

हम कितना भी चाहें, लेकिन
वक्त कहाँ रूक जाया करता,
कुछ अनपेक्षित घट जाने से
जीवन कब थम जाया करता.

मानव हूँ ना! चलनशील हूँ!

दुख तो आते जाते रहते
दु:खों से घबराना कैसा,
जो नीयत है वो होगा ही
नियति से टकराना कैसा.

शिक्षित हूँ ना! मननशील हूँ!

खुशी मिले तो उन्हे बाँट दूँ
दु:ख अपने सारे मै पी लूँ,
जितनी साँसें शेष हैं मेरी
उतना जीवन जी भर जी लूँ.

नारी हूँ ना! सहनशील हूँ!

रूकने से कब काम चला है
जीवन मे अब बढना होगा,
खुद अपने से हिम्मत लेकर
बाधाओं से लडना होगा.

कर्मठ हूँ ना! कर्मशील हूँ!

Published in: on September 23, 2007 at 8:17 pm Comments (13)

The URI to TrackBack this entry is: http://rachanabajaj.wordpress.com/2007/09/23/aatmbal/trackback/

RSS feed for comments on this post.

13 Comments Leave a comment.

  1. बहुत अच्छा लगा वापस लिखता देख कर और वो भी इतनी प्रेरणादायी रचना के साथ रचना जी वापसी.

    स्वागत है. हम सब आपका इन्तजार कर रहे थे.

    मानव हूँ ना! चलनशील हूँ!

    ध्यान रखिये और चलते चलिये. इन्तजार रहेगा निरन्तर लेखन का. अपने भावों को बांटते रहें, अच्छा लगेगा.

    अनेकों शुभकामनायें.

  2. रूकने से कब काम चला है
    जीवन मे अब बढना होगा,
    खुद अपने से हिम्मत लेकर
    बाधाओं से लडना होगा

    जी बिलकुल, जीवन में ये भाव बनाए रहें।

  3. बहुत सुंदर !

  4. बहुत अच्छी है सही मायने में जिंदगी में रुकने से किसी का काम नही चला है पढ़ कर अच्छा लगा !

  5. अच्छा, बहुत अच्छा लगा इस तरह की रचना से फ़िर से लिखने की शुरुआत करना।
    दुख तो आते जाते रहते
    दु:खों से घबराना कैसा,

    सही है।

  6. Rachna Ji, bahut achha likha hai

  7. सच कहा जाए तो यह कविता आशा और उद्गार की स्त्रोतास्वनी है जीवन के कई उपदिष्ट सत्य को जब हम अपने विशाल आत्मबल से स्वीकार करना सीख जाते है तभी ऐसी कविता का सृजन होता है…
    मुझे सिर्फ एक बात खटकी वह थी नारी…
    चूंकि यह कविता सभी वर्गों पर एक समान पैठ रखती है तो यह थोड़ा बंटा सा लगा जिसकी जरुरत नहीं थी…।
    लेकिन शानदार वापसी रही आपकी… पढ़कर शकुन मिला हृदय को…।
    धन्यवाद!!!

  8. दुख तो आते जाते रहते
    दु:खों से घबराना कैसा,

    सही कहा है आपने… बहुत दु:ख तो आते जाते रहते हैं, बहुत खूब!

    इसी प्रकार लिखती रहें…

  9. सहनशील और साहसी नारी की रचना पढ़ कर बहुत अच्छा लगा।

  10. रचना में आत्मबल का पूरा प्रमाण मौजूद है….बहुत अच्छा लगा इसे पढ़ना।

  11. @ समीर जी, मनीष जी, अन्नपूर्णा, दीपक जी, अनूप जी और मिश्रा जी,

    बहुत धन्यवाद…कोशिश करूँगी लिखते रहने की…

    @ दिव्याभ, ये ‘स्वान्त: सुखाय’ किस्म की पन्क्तियाँ मैने अपना आत्मविश्वास पाने के लिये लिखी थीं. किसी तरह ये अगर वर्गों को बाँटती सी लगती हैं, तो क्षमाप्रार्थी हूँ. आपकी टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद..

    @ गिरिराज, अफलातून जी और बेजी, धन्यवाद.

  12. Bahut khub Rachana ji…mujhe behad khushi ho rahi hai ke aapne blogging shuru kiya…zindagi naam hee chalna hai!
    Aasha hai ke aap isi tarah apne aatmabal ke sahare hum sabhi ka honsala badhati rahengi (ameen)
    khush rahein sada!
    :)

  13. डॊन, तुम्हारी टिप्प्णी मेरा हौसला बढाती है.. बहुत धन्यवाद.


Leave a Comment