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विरोधाभासी जिन्दगी…. October 27, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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“कभी खुशी से, या फिर बेमन,
साँस साँस यूँ चलता जीवन,
खोया पाया यहीँ छोड कर,
एक दिन मिट्टी हो जाता तन”

बचपन, यौवन और वृद्धावस्था- जीवन के पडाव हैं,
इन पडाओं के साथ आते अनगिनत घुमाव हैं.

सुख-दुख, खोने पाने के उतार चढाव हैं,
कभी सुकून के हल्के क्षण तो कभी तनाव है.

कभी नफरत तो कभी फिर झुकाव है,
कभी मित्रता का आनन्द तो कभी मनमुटाव है.

कभी विचारों की दृढता तो कभी भावनाओं के बहाव हैं,
कभी आक्रामकता तो कभी फिर बचाव है.

कभी सद्भाव तो कभी दुर्भाव है,
कभी समझौता तो कभी फिर टकराव है.

किसी से जुडाव तो किसी से अलगाव है,
कभी संगठन तो कभी फिर बिखराव है.

गैरों के ताने तो मित्रों के सुझाव हैं,
आपाधापी के इस जीवन मे चैन और शान्ति का ाभाव है…

मै चकित हूँ—
इतने विरोधाभासी और क्षणभंगुर जीवन से हमे आखिर इतना क्यूं लगाव है????/
——

Comments»

1. RC Mishra - October 27, 2007

कत़रा कत़रा मिलती है…., कतरा कतरा जीने दो…
जिन्दगी है,
यही कह सकता हूँ।

2. राजीव - October 28, 2007

आपकी यह कविता तो अच्छी है, साथ ही अंत में प्रस्तुत प्रश्न भी विचारणीय है। यदि सही सही इसका उत्तर ही जान जायें या फिर जानने का सत्यता से प्रयास ही करें तो मेरा ऐसा विचार है कि तब यह प्रश्न शायद निरर्थक हो जाय। हमारी आत्मिक विकृतियाँ ही शायद इसे लगाव बना रहने देतीँ अन्यथा उपरिवर्णित विषमताओं के रहते भी कदाचित हम आनन्द में रहें।

3. Dawn - October 28, 2007

Mujhe Gulzar sahab ki likhi woh geet…” ai zindagi gale laga le…humne bhi tere har ek gham ko gale se lagaya hai…hai na?”

khush rahein sada yehi dua hai

4. kakesh - October 28, 2007

जीवन है क्या
मतिभ्रम जैसा
ना जानूँ मैं
ना कोई जाने
बदल जायेगा
एक पल में वो
जो है अच्छा
और बुरा जो
मत चिंता कर
बस तू जी ले
जो है जीवन
मधुरस सम तू
उसको पी ले
थोड़ा जी ले

5. अनूप शुक्ल - October 28, 2007

जीने की इच्छा सबसे बड़ा और आकर्षक सच है। अच्छा लगा कि फिर से लिखना शुरू हुआ।

6. मनीष - October 28, 2007

विरोधाभास हैं इसलिए जो कुछ अच्छा है उससे लगाव भी है…

7. Beji - October 28, 2007

रचना, मैं भी चकित हूँ।

8. समीर लाल - October 29, 2007

सभी चकित हैं, रचना जी बस आपने इस भाव को सुन्दर शब्द रुप दे दिया. बहुत गहरे पैठे प्रश्नों को उभारा है. जबाब भी मिलेगा. जब गहरे उतरे हैं तो मंथन भी होगा और माखन उपर आकर मंथन को साकार एवं सार्थक करेगा..शर्त है मथते रहिये.

बहुत सुन्दर लग रहा है कि आपने पुनः कलम थामी है. अब तरह तरह के आकार नये आयामों को उभारेंगे. बहुत शुभकामनायें आने वाली अनेकों संभावनाओं के लिये.

9. rachana - October 30, 2007

जीवन के विरोधाभासो‍ पर आपके विचार रखने के लिये आप सभी का शुक्रिया…

काकेश, पन्क्तिया‍ मुझे बहुत बहुत पस‍द आई‍. धन्यवाद इन्हे यहां लिखने के लिये…

10. anuradha srivastav - October 31, 2007

आपकी रचनायें प्रभावित करती हैं। अफसोस मैंने जरा देर से पढा।

11. rachana - November 29, 2007

अनुराधा जी, टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद!