समीर जी और चालीस टिप्पणियां

हिन्दी चिट्ठाजगत मे सर्वाधिक टिप्पणियां‍ लेने और देने वाले ब्लॊगर सम्भवत: समीर जी ही है. वे इतने ब्लॊग पढना और टिप्पणियां‍ कैसे नियोजित करते है‍ इसका वाजिब जवाब उन्होने यहां‍ पर दिया है. इसकी एक गैरवाजिब वजह मै आपको बताती हूं.

( **समीर जी और उनके निष्ठावान पाठको‍ से माफ़ी सहित  )

असल बात यह है कि अपने ब्लॊगि‍ग के पहले ही वर्ष मे उन्होने कई पुरस्कार जीत कर अपने लिये ऊंचे मानद‍ड स्थापित कर लिय है अब उसी साख को बचाने की कवायद मे उन्हे इतना मेनेजमे‍ट करना पड रहा है. अब बताइये भला आपकी हर पोस्ट पर आपको खुश कर देने वाली एक टिप्पणी समीर जी की हो तो अच्छे ब्ला‍गर के चुनाव के समय आप उन्हे अपना एक अदद वोट दे‍गे या नही? :)
फ़िर समीर जी है‍ भी खुशी से जियो और जीने दो किस्म के व्यक्ति, तो अगर किसी के लिये वे कुछ अच्छा कह सके‍ तभी कहते है अन्यथा नही कहते. वजह जो भी हो समीर जी से गुजारिश है कि वे खूब लिखते रहें और टिप्पणियां देते-लेते रहें!

कुछ अन्य लोग भी है, जिनके टिप्पणी नियोजन मैने जानने की कोशिश की है, जैसे–

अनूप जी किसी को भी ब्लॊगर बनाने के लिये और फ़िर उसका ब्लॊग बन्द होता दिखने पर टिप्पणी करते रहते है‍ अपरोक्ष से वे अपने पाठको‍ को कम नही होने देते क्यो‍ कि ये तो लगभग असम्भव ही है कि आप हिन्दी मे लिखते हों और उनका चिट्ठा न पढते हों! और विवादित मुद्दों पर ’सुलहात्मक टिप्पणी’ करना वे अपना धर्म समझते हैं.

कुछ लोग “रेअरेस्ट ऒफ़ रेअर” केस मे ही टिप्पणी करते है‍

कुछ लोग अविवादित बातों पर टिप्पणी करना पसंद नही करते.

कुछ लोग ’देने और लेने’ की नीति के तहत टिप्पणी करते हैं.

कुछ लोग किसी चिट्ठे के समर्पित टिप्पणीकार होते हैं

कुछ लोग कविताओं वाले ब्लॊग पर “एस अ रूल” टिप्पणी नही करते, अगर कोई कविता उन्हे अच्छी लग जाये तब भी नही कर पाते क्यो‍ं कि वे इस बात की घोषणा कर चुके होते हैं कि कविताएं उनकी समझ मे नही आतीं!.

एक और परिचित नाम जीतू भाई है जिनकी ज्यादातर टिप्पणी अनूप जी के लिये सुरक्षित है. बाकी जगहों पर उनकी टिप्पणी कम ही दिखती है चाहे  ब्लॊग लेखक / लेखिका घोषित तौर पर उनके भाई /  बहन हों, तब भी नही!!!

—-

ब्लॊगि‍ग के एक महत्वपूर्ण भाग, टिप्पणियो‍  की व्यथा कथा कई बार लिखी जाती रही है. टिप्पणियां हमे स‍वाद का मौका देती है‍. क्या नये और क्या पुराने ब्लॊगर सभी को टिप्पणियो‍ की दरकार रहती है.  अलेखक किस्म के ब्लॊगर (यानि जो अपनी कलम की धार तेज करने के लिये या अन्य किसी प्रयोजन के लिये ब्लॊगर नही बने है, बल्कि सिर्फ़ अपनी बात अपने तरीके से कह पाने और २-४ लोगों द्वारा उस बात को सुन और समझ लेने से मिलने वाली थोडी सी खुशी के लिये लिखते हैं ) के लिये टिप्पणियों का खास महत्व होता है.पोस्ट पर मिली टिप्पणियो की स‍ख्या से ज्यादा इसका महत्व होता है कि वे किसकी और कैसी है‍. किसी पोस्ट पर टिप्पणी मिलने से ज्यादा जरूरी ये है कि निरुत्साहित करने वाली टिप्पणी न मिले.

बहरहाल बात समीर जी से शुरु हुई थी तो एक “सुविधा गणित” का जिक्र कर उन्ही पर खत्म करती हूं.
समीर जी उनकी एक पोस्ट पर औसतन चालीस टिप्प्णियां पाते हैं और हम सभी उनकी टिप्पणी पाते है‍ तो हमारा आंकडा हुआ-
१*४०= ४०!!!!

इसी तर्ज पर आपकी पोस्ट पर टिप्पणी करने वालों का टिप्पणी औसत निकालिये और उन सब को जोड्कर हो जाइये खुश!!

Published in:  on October 31, 2007 at 9:44 am Comments (17)

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17 Comments Leave a comment.

  1. कुछ स्थापित टिप्पणीबाजों के अलावा आपने टिप्पणियों की जो सामान्य समीक्षा की वह अच्छी लगी ।

  2. विश्लेशन सटीक किया……………

  3. हम भी तो आपके चिट्ठे पर अक्सर टिप्पणी करते ही हैं. हाँ कविताऎं अपनी भी समझ में कम ही आती है क्योंकि हमारा भी ऊपर का माल बिल्कुल खाली ही है.

    आपने अच्छा विश्लेषण किया.

  4. चिट्ठाकारी के टिप्पणी शास्त्र का आपका विश्लेषण अदभुत है।

  5. बात अधूरी है। पार्ट वन समझ रही हूँ। आगे के पार्ट्स का इंतज़ार है।

  6. रचना जी आप सभी का जिक्र किजिये…वैसे मसालेदार कढ़ी पक गई है…बहुत अच्छा…

    सुनीता(शानू)

  7. सटीक विश्लेषण .

  8. बहुत बढ़िया विश्लेषण किया है । कविता पर ना टिप्पणी करने की कसम खाने वालों की बात भी बिल्कुल सही है ।
    घुघूती बासूती

  9. क्या बात है, बहुत बढ़िया विश्लेषण!!!

  10. सही समीक्षा है और सांख्यिकीय विश्लेषण व गणित भी।
    सुविधा गणित का सूत्र प्रसन्न रहने के लिये महत्वपूर्ण भी है

  11. कई बार दूसरो की टिप्पणी पढ कर ही संतोष करना पडता है. पर टिप्पणी सफलता का मानदंड नहीहै.

  12. कुछ ऐसे भी होते हैं रचना जी मेरे जैसे, जो किसी नियम के तहत टिप्पणी नहीं करते, वरन्‌ वहीं टिप्पणी करते हैं जहाँ उनको लगता है कि उनको कुछ कहना है उस ब्लॉग पोस्ट से संबन्धित या उस पर आई किसी टिप्पणी से संबन्धित। आप ही ने कहा ऊपर अपने लेख में कि टिप्पणियाँ ब्लॉगर और पाठक के बीच संवाद का ज़रिया हैं। :)

    कुछ लोग कविताओं वाले ब्लॊग पर “एस अ रूल” टिप्पणी नही करते, अगर कोई कविता उन्हे अच्छी लग जाये तब भी नही कर पाते क्यो‍ं कि वे इस बात की घोषणा कर चुके होते हैं कि कविताएं उनकी समझ मे नही आतीं!.

    क्या यह मेरे(जैसों के) लिए है? ;) :P

  13. अब क्या कहें…थोड़ा बहुत सुविधा गणित जो छूट गया था वो भी आपने सिखा डाला. हमारी दुकान में तो अब ताला लगा ही समझो. यही अंतिम गुर धरे थे गणित वाला-वो भी अब राज न रहा. :)

  14. कुछ लोग जो अच्छा और कम लिखते हैं उनमे आप भी शामिल हैं :)

  15. रचना जी हम जैसे नये ब्लोगरों के लिए ये विष्लेशन बहुत कारगर सिद्ध होगा। बड़ी पैनी नजर है आप की…

  16. बढ़िया किया जो यह बता दिया कि हम सुलहात्मक टिप्पणी करते हैं। वैसे ऐसी ही सुलहात्मक टिप्पणियों से झगड़े भी बढ़ते हैं। :) अच्छा लगा यह टिप्पणी विश्लेषण! बधाई!

  17. @ अफलातून जी, अनुराधा जी, सृजन जी, सुनीता जी. आपकी टिप्पणियों के लिये आभार…

    @ काकेश, आपकी टिप्पणीयों के लिये बहुत धन्यवाद…आपने मेरी कुछ कविता पर भी प्रतिक्रिया की है मुझे खुशी हुई की वो आपको समझ आई…मुझे आपकी तीखी व्यंग शैली पसँद है लेकिन इन दिनो नही पढ पा रही…

    @ बेजी, तुम्हारे कहने पर अब तो दूसरा पार्ट भी लिख दिया है :) .

    @प्रियंकर जी, राजीव जी, घुघुति जी, संजीत आपको विश्लेषण पसंद आया जानकर खुश हूँ..

    @ बसन्त जी, टिप्पणी सफलता की मापदंड हो भी सकती है और नही भी..

    @ अमित, //क्या यह मेरे(जैसों के) लिए है?// जी हाँ!!!

    सही कहा आपने कि कुछ लोग किसी नियम के तहत टिप्पणी नही करते, उन्ही मे से मै भी हूँ :)

    @ समीर जी, टिप्पणी के लिये शुक्रिया. :)

    @ राजेश जी, इतनी तारीफ के लिये बहुत धन्यवाद!!!

    @ अनिता जी और अनूप जी, टिप्पणी के लिये आभार…


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