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मै तो मालामाल हो गयी!!! November 5, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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अरे नही! मेरी कोई बम्पर लॊटरी नही खुली है बल्कि पिछली पोस्ट मे मैने जिस ’सुविधा गणित’ का  जिक्र किया है उसके हिसाब से मै मालामाल हो गयी!
मेरी पिछली पोस्ट जिन विविध चिट्ठाकार( उनके ब्लॊग लेखन की दृष्टि से) ने पसँ‍द की और टिप्पणी की उसे अगर ’सुविधा गणित’ के हिसाब से देखा जाये तो उस पोस्ट को अच्छा प्रतिसाद मिला है…
उस गणित मे कुछ और सूत्र भी इस्तेमाल किये जाने चाहिये जैसे कि–

आपने अपने ब्लॊग और अपनी पोस्ट पर कितनी मेहनत की है यानि  उसके लिये कितनी किताबें पढीं, कितना वक्त टाइपिंग मे लगाया और अन्य चीजे जैसे- फ़ोटो, लिन्क, और रंगीन या बोल्ड अक्षर इत्यादि.
यदि बहुत तामझाम के बाद कुछ ही टिप्पणियाँ मिली हैं तो अपने जोड मे से कुछ अंक कम कर लें…..
यदि बिना किसी तामझाम के अच्छी टिप्पणियाँ मिली हैं तो कुछ अंक बोनस ले ले :)

खैर ये सब (और इस पोस्ट का शीर्षक भी!) मजाक की बातें हैं..सच यही है कि टिप्पणियों का कोई हिसाब किताब नही होता, गुणवत्ता होती है!
कुछ लोगों के लेखन और उससे उभरे उनके व्यक्तित्व हमारी निजी पसँद होते हैं (जैसे मेरे लिये बेजी, डॉन और घुघुति बासुति जी आदि. पुरुष वर्ग का नाम नही लूँगी क्यों कि उनमे स्पोर्टिंग स्पिरिट दिखाई नही देती :) ).

कुछ लोगों के प्रति हमारा खास सम्मान होता है और ऐसे लोगों की टिप्पणियाँ अंनमोल होती हैं , तो ऐसी टिप्पणियों को किसी गणित मे न उलझाएँ…..

बेजी ने अपनी टिप्पणी मे सच ही कहा कि मेरी पोस्ट अधूरी है. कई दिनो से मैने कोई भी चिट्ठे और टिप्पणियां पढे ही नही है‍ तो ठीक से विश्लेषण कर पाना सम्भव भी नही था और उचित भी नही. जो बातें मैने कही वे सामान्य मानवीय( चिट्ठाकारीय) व्यवहार के तहत कही है…

बसन्त आर्य जी ने कहा है कि टिप्पणी सफलता का माप दंड नही है, ये सच भी है और नही भी… मेरे सबसे ज्यादा पसंदीदा ब्लॉग मे से कुछ पर ( जिनकी हर पोस्ट  ( पिछले कुछ महीने छोडकर ) मैने पढी है!).मैने आज तक एक भी टिप्पणी नही की है! कई बार चिट्ठाकार की छवि इतनी बडी होती है कि आप कुछ कह नही पाते. एसा लगता है कि जिसने अभी बैट पकडना सीखा हो वो सचिन को कहे कि आप अच्छा खेलते हो! (* कुछ अजीब सी तुलन कर दी है लेकिन अभी और कुछ सूझ नही रहा है तो इसी से काम चला लें!, आशा है आप समझ लेंगे कि मै क्या कहना चाह रही हूँ*)….

कई बार समीक्षात्मक ब्लॉग ( मनीष कुमार), शोधात्मक ( सृजनशिल्पी, अफलातून) तथ्यात्मक ( उन्मुक्त) किस्म के चिट्ठों पर भी कहने को कुछ नही होता…..

कई बार टिप्पणियाँ पूर्वाग्रह से पीडित और एक पोस्ट के बजाए उस लेखक के समग्र लेखन को ध्यान मे रखकर कर की जाती हैं

मै किसी भी चिट्ठाकार की कई सारी पोस्ट पढने की बाद ही उस चिट्ठे पर टिप्पणी कर पाती हूँ…
.

मेरे लिये मेरे चिट्ठे की सारी टिप्पणियाँ अनमोल हैं, क्यों कि जब मै चिट्ठाजगत से परिचित हुई तो उसके पहले अपने घर और परिवार के बाहर की दुनिया ज्यादा नही जानती थी, उतनी ही दुनिया को जानती थी जितनी बातें अखबारों और टी वी से मेरे घर मे आती….अन्तरजाल और चिट्ठाजगत से परिचित होने के बाद एक नई दुनिया को जाना….जब मैने लिखना शुरु किया तब मुझे अपनी जानकारी, शब्द सामर्थ्य और अभिव्यक्ति पर भरोसा नही था  लेकिन कालान्तर मे मैने जाना कि भाषा के सौन्दर्य से ज्यादा जरूरी है उससे सम्प्रेषित होने वाला अर्थ….

बहुत सी बाते मैने यहीं सीखी, जो मै अन्यथा नही जान पाती…दुनिया की कई अच्छी पुस्तकों के बारे मे भी मैने यहीं से जाना….ये भी जाना कि तथाकथित बुद्धीजीवी लोग भी सामान्य मानवीय वृत्तियों से पीडित होते हैं, यानि अवान्छित भाषा का प्रयोग , दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश इत्यादि….

Comments»

1. अतुल चौहान - November 5, 2007

अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। यह “ब्लागरों” की दुनिया है,जरा संभल कर चलें।यहां हर मोड पर होता है कोई न कोई हादसा…………………
बाकी आपकी पोस्ट पसंद आई।

2. उन्मुक्त - November 5, 2007

मैं कई दिन से, बहुत दूर, अन्तरजाल की दुनिया से बाहर था इसलिये कुछ पढ़ नहीं पाया। अभी लौट कर आया - आपकी चिट्ठियां पढ़ीं। आपकी यह और उसके पहले की चिट्ठी तो टिप्पणी पर शोध है।
आप कहती तो हैं कि आप कई बार समीक्षात्मक, शोधात्मक, तथ्यात्मक (उन्मुक्त) किस्म के चिट्ठों पर कहने को कुछ नही होता पर मुझे तो आपकी टिप्पणियां हमेशा दिल के पास लगती हैं - कुछ नयापन लेकर होती हैं।
मैं कम टिप्पणियां पाने वाले चिट्ठाकारों में हूं कभी कभी टिप्पणियां की कमी खलती है।
यह भी सच है कि मैं बहुत टिप्पणियां नहीं करता हूं इसका कारण समय की कमी है। हांलाकि मैं कुछ किस्म के चिट्ठों पर अवश्य टिप्पणी करता हूं - विश्वास नहीं है तो खुद ही यहां पढ़ लीजिये :-)

3. समीर लाल - November 5, 2007

चलो, जरी रखो अपनी यह यात्रा. सीख ही जाओगी एक दिन, यही उम्मीद करता हूँ. वैसे मैं समझता था कि समझ गई होगी अब तक.

4. अफ़लातून - November 5, 2007

समीरजी और रचना की समझदारी में साफ़ फरक है । टिप्पणी - आचरण में भी ।

5. kakesh - November 5, 2007

चलिये आपकी साथ साथ हम भी सीख रहे हैं. हाँ उन्मुक्त जी के चिट्ठे वाली बात एकदम सही है. उनके सारे लेख पढ़ता हूँ पर टिप्पणी नहीं दे पाता समझ ही नहीं आता क्या लिखें.

6. Beji - November 5, 2007

पार्ट 2….वेरी गुड़….बहुत अच्छा लगा रचना कि तुम्हे अच्छी लगती हूँ…और स्पोर्टिंग स्पिरिट भी है….आज तो हर टिप्पणी इस तारीफ की वजह से एफेक्टेड रहेगी।

7. अनूप शुक्ल - November 5, 2007

अच्छा है। अच्छी तरह अपनी बात कही। भाषा के सौन्दर्य से ज्यादा जरूरी है उससे सम्प्रेषित होने वाला अर्थ… :)

8. Amit - November 5, 2007

पुरुष वर्ग का नाम नही लूँगी क्यों कि उनमे स्पोर्टिंग स्पिरिट दिखाई नही देती

चलिए अच्छा हुआ आपने यह कहकर मुझे कुछ याद दिला दिया जिस पर मैं कुछ लिखने की सोच रहा था। ;) :P

वैसे मैं बसंत आर्य जी के कथन से सहमत हूँ, टिप्पणियाँ वाकई सफ़लता का मापदंड नहीं है। बहुत बार ऐसा होता है कि टिप्पणियाँ कम होती हैं जबकि लेख बहुत लोगों द्वारा पढ़ा गया होता है। प्रसिद्ध भारतीय ब्लॉगर अमित वर्मा(इंडिया अनकट वाले) के ब्लॉग पर उन्होंने टिप्पणियाँ पहले भी बंद की हुई थी जब उनका ब्लॉग ब्लॉगर.कॉम पर था और अब जब उन्होंने अपने डोमेन पर स्थानांतरण कर लिया है तब भी उन्होंने टिप्पणियाँ बंद की हुई हैं। इसलिए उनके किसी ब्लॉग पोस्ट कर टिप्पणी नहीं होती, लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि वे सफ़ल नहीं हैं या उनको कोई पढ़ता नहीं? ;) मैंने (कदाचित्‌ पिछले वर्ष) उनसे पूछा था कि टिप्पणियों का प्रावधान क्यों नहीं है तो उन्होंने शायद यह उत्तर दिया था कि उनको पसंद नहीं कि टिप्पणियों में कोई बेकार का विवाद आरंभ करे इसलिए वे ईमेल से पाठकों के विचार जानना पसंद करते हैं जो कि उन्हीं के पास आते हैं। पक्के तौर से याद नहीं कि यही उनका उत्तर था पर कुछ-२ ऐसा ही था। मेरा यह मानना है कि इस तरह से “ब्लॉग” का अभिप्राय नष्ट हो जाता है क्योंकि “ब्लॉग” की USP यही है कि वह एक ऐसा मंच हैं जहाँ पाठक लेखक से सीधा संवाद तो कर ही सकता है साथ ही उसको अन्य पाठकों के विचार जानने को भी मिलते हैं। लेकिन ब्लॉगर अपने अनुसार अपने ब्लॉग को चलाने के लिए स्वतंत्र है यह भी मेरा मानना है, इसलिए अमित का कहना भी मुझे जंचा। यहीं से बसंत जी के कथन की भी महत्ता साबित होती है कि वाकई टिप्पणियाँ सफ़लता का मापदंड नहीं हैं।

मेरे सबसे ज्यादा पसंदीदा ब्लॉग मे से कुछ पर ( जिनकी हर पोस्ट ( पिछले कुछ महीने छोडकर ) मैने पढी है!).मैने आज तक एक भी टिप्पणी नही की है! कई बार चिट्ठाकार की छवि इतनी बडी होती है कि आप कुछ कह नही पाते. एसा लगता है कि जिसने अभी बैट पकडना सीखा हो वो सचिन को कहे कि आप अच्छा खेलते हो!

मैं आपके इस विचार से बिलकुल सहमत नहीं हूँ। जैसा कि मैंने अभी कहा, “ब्लॉग” की USP यही है कि वह एक ऐसा मंच हैं जहाँ पाठक लेखक से सीधा संवाद तो कर ही सकता है साथ ही उसको अन्य पाठकों के विचार जानने को भी मिलते हैं। दूसरे, यह कतई आवश्यक नहीं कि टिप्पणी सिर्फ़ “अच्छा लिखते हैं”, “अच्छा लिखा है”, “बधाई आपने बहुत अच्छा लिखा है” आदि प्रकार की हो। मेरी नज़र में सार्थक टिप्पणी वही है जो ब्लॉग पोस्ट में कुछ जोड़े, जो कॉपी-पेस्ट न लगे कि अन्य १०-२० ब्लॉगों पर भी यही चिपकाई गई हो। सोच का फर्क है, मेरा सोचना है कि २० टिप्पणियाँ पाने से कोई अमीर नहीं हो जाएगा और टिप्पणी से महरूम किसी पोस्ट का लेखक कोई आवश्यक नहीं कि बेकार लिखता हो। टिप्पणी आप संवाद को आगे बढ़ाने के लिए कर सकते हैं, पोस्ट के मसौदे पर चर्चा के लिए कर सकते हैं।

रही बात आपके उदाहरण की, तो मैं उससे भी सहमत नहीं हूँ। यह कहाँ की शराफ़त हुई कि यदि किसी को कुछ आता नहीं वह आपकी तारीफ़ करे तो वह बेकार और यदि कोई पहुँचा हुआ व्यक्ति करे तो वह अच्छी? तारीफ़ तारीफ़ होती है, कोई भी करे, हाँ उसका स्तर अवश्य होता है। अब आप या मुझ जैसा कोई सचिन की तारीफ़ करे तो वह आम फैन की तारीफ़ हुई कि हमको उनका खेल पसंद है इसलिए तारीफ़ की लेकिन हमारे जैसे बहुत हैं परन्तु जब डॉन ब्रैडमैन या डेनिस लिलि या कपिल देव जैसा कोई सचिन की प्रशंसा करे तो सचिन के लिए उसकी अहमियत अधिक होगी क्योंकि ये लोग इस खेल के मास्टर रहे हैं।

9. rachana - November 6, 2007

@ अतुल जी, सही कहा- अभी बहुत सीखना बाकी है…ौर मेरा मानना है कि अगर मै आपने और अपने लेखन के प्रति ईमानदार हूँ तथा किसी के प्रति दुर्भावना नही रखती तो मै सम्भली हुई भी हूँ! और हाँ शुभ ही बोलें, हादसों की बात न करें….

@ उन्मुक्त जी, जानती हूँ कि आप टिप्पणी मे कन्जूसी करते हैं….आपकी इतनी बडी टिप्पणी के लिये धन्यवाद!

@ समीर जी, थोडा समझ गई, थोडा बाकी है.. :)

@ अफलातून जी, समझदारी मे फरक होना सामान्य बात है, हम सभी एक से समझदार हो जायेंगे तो मजा ही नही आयेगा.. :)

@ काकेश, आपकी साथ सीखने की बात हमे पसँद आई, यही होना चाहिये…

@ बेजी, अपनी पसँद जाहिर करने से मै कतराती नही.. :)

@ अनूप जी, टिप्पणी के लिये आभार…

@ अमित, मैने कहा तो है कि मैने अजीब सा अदाहरण ( सचिन वाला) दिया है) सूझ ही नही रहा था कि अपनी बात कैसे कहूँ..

इतनी विस्तृत रूप से अपनी बात लिखने के लिये बहुत धन्यवाद…

10. सृजन शिल्पी - November 6, 2007

यह तो समझ में आ गया कि टिप्पणियों को लेकर आप कितनी संजीदा हो गई हैं। आपके लेखन में जितना अपनत्व झलकता है, वह हमें खींच लाता है आपके चिट्ठे पर, जब भी आप कुछ लिखती हैं।

जो जितना देता है, उसे उतना ही मिलता भी है। यह हिसाब टिप्पणियों के मामले में भी है। समीर जी की इसकी प्रेरक मिसाल हैं।

ज्यादातर पाठक इंटरनेट पर गंभीर होने, तनावग्रस्त होने नहीं आते। वह सब तो जिंदगी और दुनिया के संघर्षों में पहले से है। वे ऐसे लेखन को पसंद करते हैं जो उन्हें अपनत्व के अहसास से, रिश्तों की ऊष्मा से सिंचित करे।

आप लिखते रहिए, विषयों में विविधता भी लाइए। लेकिन वह अपनत्व भरा खास अहसास जो आपके लेखन के जरिए हम पाठकों तक पहुंचता है, वह बना रहे हमेशा।

11. नितिन - November 7, 2007

बस लिखते रहिये

12. rachana - November 29, 2007

@ सृजन जी, आपकी टिप्पणी के लिये बहुत धन्यवाद..कोशिश करूँगी कि अच्छा लिखूँ..

@ नितिन जी, शुक्रिया!