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आशा- निराशा…. November 21, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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सपने बुनती हूँ, टूट जाते हैं,
टूटकर बिखर जाते हैं,
उनमे से एक टुकडा चुनकर,
फिर सपने बुनने लगती हूँ…

आशाएँ जगाती हूँ, टूट जाती है,
निराशा आती है,
दुख के काँटों के बीच,
सुख के कुछ फूल चुनने लगती हूँ…..

प्रयास करती हूँ, विफल हो जाते हैं,
सहम जाती हूँ,
विफलता के अन्धकार के उस पार,
रोशनी की किरण ढूँढने लगती हूँ……

हिम्मत जुटाती हूँ, हार जाती हूँ,
थम जाती हूँ,
फिर चुपचाप हाथ पर हाथ रख,
 नियति की सुनने लगती हूँ……

Comments»

1. पर्यानाद् - November 21, 2007

यह निराशावाद किस लिए ? सपनों का टूटना उनकी नियति है. सपने टूटते हैं ताकि हम फिर उन्‍हें देखें. नियति के भरोसे हाथ पर हाथ धर कर बैठने वाले स्‍वप्‍नदर्शी नहीं हो सकते. यह विरोधाभास कुछ समझ नहीं आया.
मध्‍यप्रदेश चिट्ठा जगत में कम सक्रिय है. इसलिए आपको पढ़ने की इच्‍छा हुई. अच्‍छी कविता है लेकिन इतना निराशावाद अच्‍छा नहीं लगा. लिखती रहें. आशावादी रहें क्‍योंकि जीवन बहुत छोटा है. शुभकामनाएं.

2. ghughutibasuti - November 21, 2007

रचना जी , एक बार फिर आपकी कविता पढ़ अच्छा लगा । सुन्दर कविता है । शा और निराशा जीवन के दो पहलू हैं । दोनो ही हों तो जीवन है ।
घुघूती बासूती

3. sajeevsarathie - November 21, 2007

वाह बहुत सुंदर, पर यह चक्र तो चलता ही रहता है, जहाँ आपने कविता खत्म करी है, वही से फ़िर शुरू हो जाती है, वर्तुल

4. kakesh - November 21, 2007

बहुत सुन्दर. निराशा ही आशा का द्वार खोलती है.

5. neeraj - November 21, 2007

हिम्मत जुटाती हूँ, हार जाती हूँ,
हिम्मत जुटाते रहिये हार की परवाह मत कीजिये क्यों की हार के बाद अगर हिम्मत बनी रहे तो जीत की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं. सुंदर रचना.
नीरज

6. balkishan - November 21, 2007

काकेश जी से सहमत हूँ. निराशा ही आशा का द्वार खोलती है. असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी है. और कविता भी आपकी वाकई अच्छी है.

7. Sanjeet Tripathi - November 21, 2007

अच्छी कविता पर यह न भूलें कि बादलों का आना, हट जाना और फ़िर सूर्य का पूरे तेज से चमकना, यह सब एक चक्र ही है!!

8. अनूप शुक्ल - November 22, 2007

बहुत अच्छा लिखा है। आशा जगायें। उसको उत्साहित करें। वो कहते हैं न दुख की पिछली रजनी बीच विलसता सुख का नवल प्रभात!

9. मनीष - November 23, 2007

बहुत कुछ आपकी आज की मनोदशा को व्यक्त करती है ये कविता.. नियति से विमुख तो नहीं हो सकते पर आशा एक ऐसा टॉनिक है जो जीवन जीने के कारण पैदा करता है…

10. beji - November 28, 2007

ध्यान से सुनो नियति को रचना, तुम जो करने में सक्षम हो…वो करोगी तो ही आशा, हिम्मत और सफलता साथ रहेगी।

11. rachana - November 29, 2007

@ पर्यानाद्, वैसे तो मै घोर आशावादी जीव हूँ…कुछ परिस्थितीवश निराशा मे हूँ…और मै नही समझती कि स्वप्नदर्शी कभी निराश होते ही न हों, हाँ, वे निराशा से हारते नही….आपकी शुभकामना के लिये शुक्रिया..
आपके नाम के क्या मायने हैं?
एक बात और्…मध्यप्रदेश से चिट्ठाकार कम हैं लेकिन कुछ बेहतरीन नाम हैं(रवि रतलामी जी, समीर लाल जी आदि).हम लोग कम ही सही लेकिन अच्छे हों तो क्या बुरा है! :)

@ घुघुति जी, सारथी जी, काकेश, नीरज जी, बालकिशन जी, सन्जीत, और अनूप जी, आपकी टिप्पणियों और हौसला देने के लिये बहुत धन्यवाद..

12. rachana - November 29, 2007

@ मनीष जी, ठीक कहा आपने…

@ बेजी, इस मित्रवत सीख के लिये बहुत धन्यवाद … मै ये याद रखूँगी…लेकिन मै प्रयास करके असफल होने पर ही तो जान पाती हूँ कि मै फलां काम करने मे अक्षम हूँ…तब क्या करूँ?

13. धनारामजी देवासी ( समेलानी परिवार सरनौ ) - April 18, 2008

अच्छी कविता पर यह न भूलें कि बादलों का आना, हट जाना और फ़िर सूर्य का पूरे तेज से चमकना, यह सब एक चक्र ही है!!

धनारामजी देवासी ( समेलानी परिवार सरनौ )

14. suman athiya - April 30, 2008

I like to be the member of asha