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एक संदेश…आतंकवादियों के नाम December 30, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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कभी इस देश मे तो कभी उस देश मे, कभी इस शहर मे तो कभी उस शहर मे…एक धमाका और कई जाने तबाह हो जाती हैं..इस सत्ता ( या फिर अस्तित्व ??) की लडाई मे किसी की जीत नही होती लेकिन हर बार हारती सिर्फ मानवता है….पता नही किन परिस्थितियों की वजह से मानव इतना खूँखार और विद्रोही हो जाता है…
मुझे ये कहना है—
चलो चलें नव युग की ओर !!

माना, तुममे रोष बहुत है,
नये खून का जोश बहुत है!
गुस्से को अब छोडो भी तुम,
लक्ष्यों को अब मोडो भी तुम!
थामो नव जीवन की डोर!
चलो—–

माना, तुमने बहुत है खोया,
क्षमता से कुछ कम ही पाया.
छूटा जो, वो सब पा लोगे,
सही राह पर अगर चलोगे.
देखो आई नई भोर!
चलो—-

कितने कष्टों को तुम सहते!
खुद को ही तुम छलते रहते.
क्यूँ जिल्लत का जीवन जीते?
अँधेरों मे तुम क्यूँ रहते?
देखो अब सूरज की ओर!
चलो—

हम जैसे, तुम भी आये हो,
तुम भी मनु के ही जाए हो!
हम जैसे अधिकार तुम्हारे,
तुम हो हम सबके ही प्यारे!
पकडो अब आशा का छोर!
चलो–

मानवता की साख को देखो,
खुद के अन्दर झाँक के देखो!
दुष्ट विचारों को तुम त्यागो,
गलती की तो माफी माँगो!!
क्यूँ डरते? जैसे हो चोर!
चलो—

झगडों से क्या हासिल होगा?
मानव का ही खून बहेगा.
माँ की शीश को अब न झुकाओ,
शक्ति को मत व्यर्थ गवाँओ!
सही दिशा मे लगाओ जोर!
चलो—

मित्रों के तुम गर्व बनो अब,
भाई का सम्बल बन जाओ!
पत्नी को उसका हक दे दो,
बच्चों को भी खिलौना लाओ!!
बन्द करो युद्धों का शोर!!
चलो चलें नव युग की ओर !!

चलो चलें नव युग की ओर !!
———

प्रार्थना December 21, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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 *** अगर आप इसे प्लेयर पर नही सुन पा रहे तो यहाँ सुन सकते हैं–

प्रार्थना

अपेक्षाएँ, सुख और दु:ख…. December 11, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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अपेक्षाएँ, सपने और आशाएँ जीने का उत्साह बनाए रखते हैं…..लेकिन यही सब दुख के कारण भी होते हैं….
हमारे परिवार से, मित्रों से और खुद अपने से हमारी छोटी छोटी अपेक्षाएँ पूरी होने पर सुख देती हैं और पूरी नही होने पर दुख भी देती हैं…
क्या अपेक्षाएँ रखी जानी चाहिये या नही?
…..
दो बातों का जिक्र करना चाहूँगी–
कुछ दिनो पहले हमारे एक मित्र के घर से लौटते वक्त रास्ते मे मित्र के परिचित एक वृद्ध सज्जन से हमारी मुलाकात हुई…..औपचारिक परिचय के बाद उन्होने हमे अपना बडा सा घर और बगीचा दिखाया..बात बढी और वे कुछ आध्यात्मिक किस्म की बातें करने लगे जैसे हमे किसी से मोह या अपेक्षाएँ नही करनी चाहिये, दुख सुख कुछ नही होते, आदि…….
मुझे आजकल ये सब बातें सुनकर झुन्झलाहट सी होने लगती है. मै सोचने लगी इन्हे क्या पता दुख क्या होता है, इनके पास तो ये है,वो है…..ये बिकुल निर्मोही किस्म के कठोर इन्सान लगते हैं ……
तभी उनके घर के ऊपर से कुछ अजीब आवाजें आने लगी. उपर वाली खिडकी मे एक २०-२५ साल का युवक कुछ अजीब सी हरकत कर रहा था….उन सज्जन ने बताया कि ये उनका बडा बेटा है, जो मानसिक रूप से विकलांग है. उनका एक १७ वर्षीय छोटा बेटा था , जिसका ह्रदयाघात से निधन हो गया और कुछ महीनो पहले उनकी पत्नी का भी निधन हो गया है. अब उन्हे इस घर कि जरुरत नही रह गयी है, इसलिये वे इसे बेचना चाह्ते हैं और एक छोटी जगह मे रहना चाहते हैं ताकि अपने बडे बेटे का हर समय ध्यान रख सकें….ये सब कुछ वे बडे आराम से बताये चले जा रहे थे, बिना किसी बेचारगी के…..

अब मुझे समझ मे आया कि वे इतने निष्ठुर क्यूँ लग रहे थे….इतने दुख सहने के लिये शायद उन्हे इतना कठोर होना ही पडा हो…..जीवन की सन्ध्या मे वे बिना किसी अपेक्षा के एक मशीन की तरह जीवन बिताने पर मजबूर हैं..
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पढी हुई हर छोटी बडी बात के बारे मे पूर्वी से बातें करने की आदत हो गई थी इसलिये कई दिनो से पढने मे मन लगता ही नही था….
कई दिनो बाद मैने एक कहानी पढी अफगानिस्तान की एक लडकी फरहा अहमदी की कहानी, “द अदर साईड ऑफ द स्काय”. जीवन के दुखों से हार नही मानने वाली एक लडकी के अदम्य साहस की कहानी है. लडकी सात साल की उम्र मे लैन्ड माइन से एक पैर खो देती है. उसके इलाज के लिये अपनो से मीलों दूर किसी अनजान देश मे अनजान लोगों के साथ दो वर्ष रह कर फिर चलने लायक हो जाती है….वतन लौटने पर युद्ध के चलते अपने पिता और बहनो को खो देती है और फिर १७ और ९ साल के उसके भाईयों को भी…..माँ के साथ किसी तरह पाकिस्तान पहुँचती है ..तमाम परेशानियों और आशा निराशा से जूझती हुई अन्तत: अपनी मर्जी का जीवन जीने की राह पा लेती है…….

अच्छा जीवन जीने की चाह और जीवन से उसकी अपेक्षाएँ उसके संघर्ष मे सहायक होते हैं….

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२६ साल पहले….. December 6, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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८० के दशक के एक इन्जीनियरिंग के छात्र के हिसाब की डायरी के कुछ पृष्ठ देखिये….

 

** हिसाब बिल्कुल अनियमित तरीके से लिखा गया है और एसा लगता है कि माँ के कहने पर ही कभी कभार लिख लिया जाता होगा..हर दूसरे हिसाब के साथ एक्- दो फिल्मों का जिक्र जरूर है! :)

दि.३१--८१

सुरेश गुप्ता को रू. दिये.

केशव से रू. दूध के लेना है.

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दि. से तक का कुल खर्च २० रू.

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एडमिशन फीस१४७ रू.

७० रू. खाना बनाने का सामान.

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दि.२४--८१

२३ रू.- डॉक्टर + दवाई

.६० रू. बस का किराया.

.२० रू. फिल्म.

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१० रू. किताबें.

१० रू. कोलगेट + साबुन + सेल.

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