अपेक्षाएँ, सुख और दु:ख…. December 11, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.trackback
अपेक्षाएँ, सपने और आशाएँ जीने का उत्साह बनाए रखते हैं…..लेकिन यही सब दुख के कारण भी होते हैं….
हमारे परिवार से, मित्रों से और खुद अपने से हमारी छोटी छोटी अपेक्षाएँ पूरी होने पर सुख देती हैं और पूरी नही होने पर दुख भी देती हैं…
क्या अपेक्षाएँ रखी जानी चाहिये या नही?
…..
दो बातों का जिक्र करना चाहूँगी–
कुछ दिनो पहले हमारे एक मित्र के घर से लौटते वक्त रास्ते मे मित्र के परिचित एक वृद्ध सज्जन से हमारी मुलाकात हुई…..औपचारिक परिचय के बाद उन्होने हमे अपना बडा सा घर और बगीचा दिखाया..बात बढी और वे कुछ आध्यात्मिक किस्म की बातें करने लगे जैसे हमे किसी से मोह या अपेक्षाएँ नही करनी चाहिये, दुख सुख कुछ नही होते, आदि…….
मुझे आजकल ये सब बातें सुनकर झुन्झलाहट सी होने लगती है. मै सोचने लगी इन्हे क्या पता दुख क्या होता है, इनके पास तो ये है,वो है…..ये बिकुल निर्मोही किस्म के कठोर इन्सान लगते हैं ……
तभी उनके घर के ऊपर से कुछ अजीब आवाजें आने लगी. उपर वाली खिडकी मे एक २०-२५ साल का युवक कुछ अजीब सी हरकत कर रहा था….उन सज्जन ने बताया कि ये उनका बडा बेटा है, जो मानसिक रूप से विकलांग है. उनका एक १७ वर्षीय छोटा बेटा था , जिसका ह्रदयाघात से निधन हो गया और कुछ महीनो पहले उनकी पत्नी का भी निधन हो गया है. अब उन्हे इस घर कि जरुरत नही रह गयी है, इसलिये वे इसे बेचना चाह्ते हैं और एक छोटी जगह मे रहना चाहते हैं ताकि अपने बडे बेटे का हर समय ध्यान रख सकें….ये सब कुछ वे बडे आराम से बताये चले जा रहे थे, बिना किसी बेचारगी के…..
अब मुझे समझ मे आया कि वे इतने निष्ठुर क्यूँ लग रहे थे….इतने दुख सहने के लिये शायद उन्हे इतना कठोर होना ही पडा हो…..जीवन की सन्ध्या मे वे बिना किसी अपेक्षा के एक मशीन की तरह जीवन बिताने पर मजबूर हैं..
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पढी हुई हर छोटी बडी बात के बारे मे पूर्वी से बातें करने की आदत हो गई थी इसलिये कई दिनो से पढने मे मन लगता ही नही था….
कई दिनो बाद मैने एक कहानी पढी अफगानिस्तान की एक लडकी फरहा अहमदी की कहानी, “द अदर साईड ऑफ द स्काय”. जीवन के दुखों से हार नही मानने वाली एक लडकी के अदम्य साहस की कहानी है. लडकी सात साल की उम्र मे लैन्ड माइन से एक पैर खो देती है. उसके इलाज के लिये अपनो से मीलों दूर किसी अनजान देश मे अनजान लोगों के साथ दो वर्ष रह कर फिर चलने लायक हो जाती है….वतन लौटने पर युद्ध के चलते अपने पिता और बहनो को खो देती है और फिर १७ और ९ साल के उसके भाईयों को भी…..माँ के साथ किसी तरह पाकिस्तान पहुँचती है ..तमाम परेशानियों और आशा निराशा से जूझती हुई अन्तत: अपनी मर्जी का जीवन जीने की राह पा लेती है…….
अच्छा जीवन जीने की चाह और जीवन से उसकी अपेक्षाएँ उसके संघर्ष मे सहायक होते हैं….
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अपेक्षायें सहज होती हैं। पूरी न होने पर दुख भी सहज होता है। इस दुख को कितनी सहजता से ले सकते हैं यह इस बात पर निर्भर करता है कि जीवन के प्रति हमारा नजरिया कैसा है।
मैं कामना करता हूं कि आप अपनी बेटी के वियोग के दुख से उबर सकें।
अपेक्षाएँ रखनी चाहिए पर उन के ना पूरा होने की सूरत में भी एकदम से हतोत्साहित नहीं होना चाहिए. जिंदगी में सब मन माफिक कब हुआ है?
बहरहाल आपके संस्मरण दिल को छूने वाले लगे।
आपके संस्मरण पढ़कर अच्छा लगा ..
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एक रचना बजाज बरसों पहले मेरी क्लासमैट भी थीं. आप मध्यप्रदेश में मूलत: कहां से हैं ? यदि आपत्ति ना हो तो बताने का कष्ट करें. कोई विशेष वजह नहीं है बस यूं ही जानना चाह रहा हूं.
अनूपजी की टिप्पणी की अंतिम पंक्ति?
मैंने ‘द अदर साईड ऑफ द स्काई’ पुस्तक नहीं पढ़ी है। अब पढ़ना चाहूंगा।
“अच्छा जीवन जीने की चाह और जीवन से उसकी अपेक्षाएँ उसके संघर्ष मे सहायक होते हैं….”
एक बहुत ही अच्छी बात कही आपने प्रेरक प्रसंगो के माध्यम से.
दिल को छू गयी। पर शायद इसी का नाम जिंदगी है।
Dil ko chooh jaatin hein aapki baatein!!! Meri dua hai ke aap apni beti ke dukh se ubharein! Jeevan mein khushi dhundiye!
sada khush rahein !
As per your comment on my blog : You are my friend indeed ismein koi shak bhi naih laana aap
Cheers
@ अनूप जी, सहानूभूति के लिये शुक्रिया.जीवन के प्रति हमारा नजरिया हमारे साथ होने वाली घटनाएँ तय करती हैं शायद….
@ मनीष जी, जिन्दगी मे मनमाफिक ना हो तो बहुत बुरा भी तो ना हो..
@ रीतेश, धन्यवाद.
@ सन्जय, इस उपनाम ( बजाज) के साथ मै कभी किसी क्लास मे नही पढी….
@ उन्मुक्त जी, हर बार इस तरह की टिप्पणी मै करती हूँ आपके ब्लॉग पर…इस बार उल्टा हो गया…
जरूर पढिये कहानी.
@ बालकिशन जी और ममता जी, आप दोनो को बहुत धन्यवाद.
@ डॉन, तुम्हारी दुआओं कि लिये खूब सारा शुक्रिया….किसी तरह का कोई शक नही मेरे मन मे..