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जिन्दा हूँ मै!! January 30, 2008

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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जी हाँ!जिन्दा हूँ मै!! क्यों कि कुछ सपनो के मर जाने से जीवन नही मरा करता है!
हमारे जीवन मे कई बार निराशा के ऐसे लम्हे आ जाते हैं कि हमे लगने लगता है कि हम बेकार ही जी रहे हैं…लेकिन हमे जीना पडता है…और फिर मरना हर किसी के लिये इतना आसान भी तो नही होता ना!

सालों पहले एक बार मौत मुझे छूकर चली गई थी…शायद वो गलत पते पर पहुंच गई थी और मेरी जिन्दगी ने उसे लौटा दिया… मुझे इसका अह्सास नही हो पाया था क्यों‍ कि मै उस समय एक शल्य-चिकित्सा के दौरान निश्चेतन अवस्था मे थी…वैसे भी इस कथन के अनुसार हमारी मौत से मुलाकात असंभव है कि-’जब हम हैं‍ तो मौत आई नही है और जब मौत आ गई है तो हम नही है‍!!’
……मेरी आंख में pterigium था, जिसमे आंख के बडे वाले गोल पर एक झिल्ली बढ्कर उसे हल्का सा ढंक लेती है, अगर वो बढकर छोटे वाले गोल तक न पहुँचे तो उससे दृष्टि पर कोई असर नही होता..कोई खास समस्या नही थी, उसे लेकर भी आराम से जिया जा सकता था..लेकिन चिकित्सक की सलाह से तय हुआ कि ५-७ मिनट की छोटी शल्यक्रिया करवा कर उसे हटाया जाए…बडे शहर के बडे नामी गिरामी चिकित्सक से शल्यक्रिया करवायी गयी, लेकिन तीसरे ही दिन सन्क्रमण की वजह से एक cyst हो गयी जिसे चिकित्सक ने फ़िर से  हटा दिया…बडे चिकित्सक की छोटी सी लापरवाही की वजह् से वो झिल्ली पहले से कई गुना तेजी से बढने लगी जिसे दो बार शल्यक्रिया कर फिर से हटाया गया लेकिन समस्या बनी ही रही…
फिर स्थानीय चिकित्सक की सलाह से आठ इन्जेक्शन भी लिये ( जो आँख के सफेद वाले हिस्से मे लगे थे १६ दिनो मे!!) लेकिन वो भी बेकार्….अब समस्या गम्भीर होती जा रही थी… मेरे चाचा जी के परिचित नेत्र रोग विशेषज्ञ की सलाह लेने के लिये मै उनके साथ गुजरात गई…..उन्होने सलाह दी अब इस झिल्ली के स्थान पर दूसरी चमडी लगाइ जाने से समस्या का निदान हो सकता है, लेकिन वो सफल ही होगा जरूरी नही है!….यही कराने का तय हुआ..ये शल्यक्रिया बडी थी इसमे आँख की चमडी के स्थान पर ओंठ के अन्दर की चमडी लगनी थी..रिस्क भी थी..चाचाजी थोडे डरे हुए थे लेकिन मै और मेरी चाची दोनो ने बहादुरी दिखाते हाँमी भर दी….वे चाह रहे थे कि मेरे माता पिता को बुलाये जाने के बाद शल्यक्रिया हो लेकिन मैने कहा कि मुझे डर नही लग रहा और जो कुछ करना है वो डाॉक्टर ही करेंगे…डॉक्टर साहब भी जाबाँज मरीज को देखकर तुरन्त ऑपरेशन करने को राजी हो गये.. :)….. दिन निश्चित हुआ….लेकिन उसी दिन चाची की मित्र की तरफ से एक बहुप्रतिक्षित सूचना मिली…भावनगर के पास अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड( जहाँ पानी के जहाजों की निश्चित आयु समाप्त होने पर उन्हे तोडा जाता है) मे एक बहुत बडा जहाज है जिसे देखने जाना है….डॉक्टर साहब की अनुमति से शल्यक्रिया एक दिन आगे बढाई गई और हम लोग कई किलोमीटर दूर अलंग गये….मेरे जीवन का बहुत ही रोमांचकारी अनुभव था वो….समुद्र की रेत मे कुछ दूर चलकर मोटे रस्सों वाली सीढी से जहाज पर चढना  सर्कस करने जैसे था..वो चेकोस्लावाकिया का जहाज था, जो बहुत ही बडा था.. तीन मन्जिल तक उसमे कमरे थे और तमाम सुविधाएँ…हमने केप्टन का केबिन भी देखा….वो सब कुछ अब भी मुझे याद है….
..अब शल्यक्रिया वाला खास दिन था..मेरे चाचाजी, डॉक्टर की अनुमति से ऑपरेशन देखने के लिये थियेटर मे मौजूद थे…निश्चेतक देने के बाद शल्यक्रिया शुरु हुई…निश्चेतक से हमारे शरीर की कुछ क्रियाएँ बन्द और कुछ मन्द पड जाती हैं…हृदय को चलते रहना होता है..लेकिन यह क्या!!! अपने सहयोगी अंगों को शिथिल देख, ह्रदय ने भी आराम फरमाने की ठान ली!! अब ह्रदय ही रुक जाये तो जीवन की डोर खत्म होने मे वक्त नही लगता…अफरातफरी मच गई..चाचाजी को बाहर जाने को कहा गया और कृत्रिम  रूप से ह्रदय के पंप को दबा दबा कर फिर चलता किया तब जाकर मेरी ( और डाॉक्टर की भी!! ) जान मे जान आई. :)

अगर डॉक्टर साहब समय पर होशियारी नही दिखाते,
तो हम तो कब के इस दुनिया से विदा हो जाते!
न छोटी खुशियों पर खूब खुश होते,
न ही बडे दुखों पर रोते!
न समझते, न सोचते और न ही लिख पाते
और बताईये तो भला!
आप भी हमारा लिखा पढकर कहाँ मुस्कुरा पाते!! :)

होश आने पर मैने पसलियों मे असह्य दर्द की शिकायत की ( जो आँख की शल्यक्रिया के बाद मुझे अटपट लगा) तो मेरे चाची चाची ने आँखों मे मौत के मुँह से निकल कर आई अपनी होनहार (!) बेटी को वापस पाने की खुशी के आँसू लिये कहा कि सब ठीक हो जायेगा….
कई महीनो बाद मुझे इस वाकये के बारे मे बताया गया..तब से लेकर अब तक मै जिन्दा हूँ! और आँख ने भी ओंठ वाली चमडी को अपना लिया..बिना ऐनक लगाए तमाम जरूरी काम कर लेती हूँ जैसे चिट्ठा लिखना-पढना आदि. :)
.

कहा जाता है कि हमारे जन्म के साथ ही हमारी म्रत्यु का समय और स्थान भी तय होता है..तो फिर बजाये इसके कि वक्त हमे साँस दर साँस घसीटे, हमे खुद जी भर कर जीना चाहिये…..

*** मेरे कुछ ब्लॉगर मित्र गाहे बगाहे मुझे मेल लिख कर कहते रह्ते हैं कि लिखती रहा करो..एक ने तो यहाँ तक कह दिया कि लिखो नही तो लोग तुम्हे भूल जायेंगे! लेकिन मुझे विश्वास है कि आप मुझे भूले नही हैं :) और दुनिया भर मुझे याद रखे ऐसा मैने कुछ किया भी तो  नही….
तो जल्दी ही कुछ मजेदार लेकर फिर हाजिर होती हूँ…..भूलना नही :)

Comments»

1. Beji - January 30, 2008

अभी तक को याद हो….जल्दी लिखो….भूलने से पहले। :))

2. kakesh - January 30, 2008

जी नहीं भूले..लेकिन हाँ आप लिखती रहें…और पढ़ती भी रहें ..हमार चिट्ठा..

3. अफ़लातून - January 30, 2008

गजब जीवट वाली हैं रचना ,आप । क्या पुरुष भी इतना दिलेर हो सकते हैं? आपकी रचनात्मक अभिव्यक्ति भी आपकी ताकत है।हमेशा याद है।हार्दिक शुभकामना।

4. kanchan - January 30, 2008

आप लिखिये… ज़रूर लिखिये क्योंकि…जिंदगी हमें रुकने नही देती…जैसे चलते चलते थक जाते हैं कभी कबी वैसे ही बैठे बैठे भी थक जाते हैं तो लगता है कि थोड़ा चल ही लिया जाये…और लिखने में हम अपनी खोई चीजें बार बार पा भी जाते हैं..इस लिये भी आप लिखिये…लेकिन इस लिये कि अगर नही लिखा तो सब भूल जायेंगे इस लिये लिखने से क्या फायदा…जिन्हे हमारी बस इतनी ही याद हो वो भूल ही जायें तो बेहतर

5. mehhekk - January 30, 2008

aap ka surgery ka experience padhkar,laga jaise hum khud phir ussi daur se gujre ho,patient ka heart fail hone ke baad,usko bachane ki stressfull prakriya se gujri main phir se.u know,when heat of patient stops working,doctors heart also stops working,only doctor thinks at that movement is about patient survival.it was your great luck and doctors luck,u servived,congrates for that.glad to know your operation of tregyium is successful after transplant.may be its years passed.aapki umar hazaron saal ki ho madam.humesha kush rahein.yahi dua hai.

6. उन्मुक्त - February 1, 2008

‘हम तो कब के इस दुनिया से विदा हो जाते!’
अरे हम सब को फिर आपका चिट्टा पढ़ने को कैसे मिलता :-)

जीवन चलने का नाम,
लिखना है चलने का काम।
लिखें, रुके नहीं, हां पॉडकास्ट भी करें।

7. मनीष - February 3, 2008

मैं तो ऊपर की पंक्ति मिस कर ये समझ बैठा कि ये अभी की घटना है। दोबारा पढ़ा तो समझ आया..पहले की वो जीवटता बनाए रखें…
भावनगर से अलंग के उस शिपयार्ड में ७ वर्ष पहले मैं भी गया हूँ. बस फर्क इतना है कि आपने चेकस्लोवाकिया का जहाज देखा था और मैंने पोलैंड का

8. rajarajasthani - February 4, 2008

life is constant struggle

9. रचना - February 5, 2008

@ बेजी, हाँ जी लिखूँगी, भूलने नही दूँगी :)

@ काकेश, नही भूलने के लिये शुक्रिया…आपका चिट्ठा कभी कभी देख पाती हूँ.. ” खोया पानी ” की किश्तें पढती हूँ..बाकि अनियमित होने से चिट्ठाजगत की हलचल से अनभिज्ञ होकर टिप्पणी करने मे मजा नही आता, इसलिये टिप्पणी नही कर पाती.

@ अफलातून जी, आपकी शुभकामनाओं के लिये बहुत धन्यवाद…आपने कहा -”क्या पुरुष भी इतना दिलेर हो सकते हैं?- — मुझे लगता है हो सकते हैं यदि उनके साथ कोई दिलेर स्त्री हो तो!! :)

@ कन्चन जी, आपने बडी अच्छी बातें बडे अच्छे ढंग से कही हैं…धन्यवाद.. भूलने की बात मैने अपने मित्रों से मजाक के लिये लिख दी थी.. :)

@ महक, डॉक्टर साहिबा आपकी दुआओं और टिप्पणी के लिये बहुत शुक्रिया….

@ उन्मुक्त जी, चलते रहने ..लिखते रहने की कोशिश करते रहेंगे.. :)

@ मनीष जी, टिप्पणी के लिये धन्यवाद.

@ राजा, सही कहा आपने….

10. अनूप शुक्ल - February 12, 2008

वाह! शाबास। बड़ी बहादुर ब्लागर हैं भाई आप तो। ऐसे ही लिखते रहें।

11. रचना - February 14, 2008

@ अनूप जी, धन्यवाद!!

12. mukesh - March 11, 2008

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