स्याही की ये आकृति हैं,
शब्द क्या पीडा कहेंगे!
‘भूल जाओ!’ यही कहकर
दोस्त भी सब चल पडेंगे!
झूठ से अब ऊब कर मैं,
सच को कहना चाहती हूँ.
ताकि मन मेरा न पूछे-
क्यूँ मै खुद से भागती हूँ?
…..
साँस में!
अहसास में!
जीने की हर आस में!
हर्ष मे!
संघर्ष मे!
और हर स्पर्श मे!
मेरे मन मे!
हर लगन मे!
और मेरे हर सृजन मे!
आराधना मे!
साधना मे!
और मेरी कामना मे!
घर को आती हर डगर मे!
रात-दिन के हर प्रहर मे!
अब भी तुमको खोजती है,
ये अभागी माँ तुम्हारी..
कैसे आगे चल सकूँगी?
खुद ही अपने से मै हारी…..
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अब भी तुमको खोजती है,
ये अभागी माँ तुम्हारी..
कैसे आगे चल सकूँगी?
खुद ही अपने से मै हारी…..
रचना जी, अगर आप खुद से ही हार जाओ गी तो,आप की शेष जिन्दगी जो बची हे, जो लोग उस जिन्दगी से जुडे हे उन का कया होगा,जाने बाला तो चला गया,उस के बाद भी कुछ कर्तब्य बच जाते हे,उन्हे भी पुरा करना होता हे,अपनो को भुलना आसान नही,लेकिन अपने फ़र्ज से मुहं मोडना भी ठीक नही, ऊठो फ़िर से,गम को सीने से लगा कर भी ऊठो ओर अपने बाकी फ़र्ज पुरे करो, थोडे दिन इस शहर से दुर चली जाओ, ओर इस दुंद से बहार निकलो, सोचो अगर तुम्हे कुछ ओ गया तो जो तुम्हारी जिन्दगी से बधें हे उन का कया होगा
बहुत बढिया रचना है,अपनी संवेदनाओं को बखूबी प्रस्तुत किया है।
आपकी मनःस्थिती को समझ पाने के बावजूद भी कोई मित्र या शुभचिंतक क्या कह सकता है:
‘भूल जाओ!’ यही कहकर
दोस्त भी सब चल पडेंगे!
–नहीं, कोई नहीं चल पड़ता…चलता है समय..वही घाव भरता है. निश्चित ही जो यादें आज विचलित कर रही हैं, वही कल चेहरे पर मुस्कान का कारण बनेंगी. बस, यही कह सकते हैं कि संयम से काम लो. यही जीवन है.
रचना कैसे कैसे लौट कर आती है पूर्वी तुम्हे फिर से तुम बनाने के लिये…कब मानोगी उसकी बात…..?!
ओह ! कमाल है. क्या कहूँ ? शब्द नहीं हैं. बस कुछ महसूस हुआ है …. शब्द नहीं हैं.
किसी दुख के भरने में समय लगता है खासकर जब वो संतान विछोह का हो…
क्या कहें! लिखती रहें। अपनी बात कहती रहें।
सच कहा आपने।
अच्छी रचना, रचना जी की