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द्वंद………. March 9, 2008

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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स्याही की ये आकृति हैं,
शब्द क्या पीडा कहेंगे!
‘भूल जाओ!’ यही कहकर
दोस्त भी सब चल पडेंगे!

झूठ से अब ऊब कर मैं,
सच को कहना चाहती हूँ.
ताकि मन मेरा न पूछे-
क्यूँ मै खुद से भागती हूँ?
…..

साँस में!
अहसास में! 
जीने की हर आस में!

हर्ष मे!
संघर्ष मे!
और हर स्पर्श मे!

मेरे मन मे!
हर लगन मे!
और मेरे हर सृजन मे!

आराधना मे!
साधना मे!
और मेरी कामना मे!

घर को आती हर डगर मे!
रात-दिन के हर प्रहर मे!

अब भी तुमको खोजती है,
ये अभागी माँ तुम्हारी..
कैसे आगे चल सकूँगी?
खुद ही अपने से मै हारी…..
————–

Comments»

1. राज भाटिया - March 9, 2008

अब भी तुमको खोजती है,
ये अभागी माँ तुम्हारी..
कैसे आगे चल सकूँगी?
खुद ही अपने से मै हारी…..
रचना जी, अगर आप खुद से ही हार जाओ गी तो,आप की शेष जिन्दगी जो बची हे, जो लोग उस जिन्दगी से जुडे हे उन का कया होगा,जाने बाला तो चला गया,उस के बाद भी कुछ कर्तब्य बच जाते हे,उन्हे भी पुरा करना होता हे,अपनो को भुलना आसान नही,लेकिन अपने फ़र्ज से मुहं मोडना भी ठीक नही, ऊठो फ़िर से,गम को सीने से लगा कर भी ऊठो ओर अपने बाकी फ़र्ज पुरे करो, थोडे दिन इस शहर से दुर चली जाओ, ओर इस दुंद से बहार निकलो, सोचो अगर तुम्हे कुछ ओ गया तो जो तुम्हारी जिन्दगी से बधें हे उन का कया होगा

2. paramjitbali - March 9, 2008

बहुत बढिया रचना है,अपनी संवेदनाओं को बखूबी प्रस्तुत किया है।

3. समीर लाल - March 9, 2008

आपकी मनःस्थिती को समझ पाने के बावजूद भी कोई मित्र या शुभचिंतक क्या कह सकता है:

‘भूल जाओ!’ यही कहकर
दोस्त भी सब चल पडेंगे!

–नहीं, कोई नहीं चल पड़ता…चलता है समय..वही घाव भरता है. निश्चित ही जो यादें आज विचलित कर रही हैं, वही कल चेहरे पर मुस्कान का कारण बनेंगी. बस, यही कह सकते हैं कि संयम से काम लो. यही जीवन है.

4. Beji - March 9, 2008

रचना कैसे कैसे लौट कर आती है पूर्वी तुम्हे फिर से तुम बनाने के लिये…कब मानोगी उसकी बात…..?!

5. MEET - March 9, 2008

ओह ! कमाल है. क्या कहूँ ? शब्द नहीं हैं. बस कुछ महसूस हुआ है …. शब्द नहीं हैं.

6. मनीष - March 10, 2008

किसी दुख के भरने में समय लगता है खासकर जब वो संतान विछोह का हो…

7. अनूप शुक्ल - March 12, 2008

क्या कहें! लिखती रहें। अपनी बात कहती रहें।

8. अजित वडनेरकर - March 16, 2008

सच कहा आपने।

9. RC Mishra - March 18, 2008

अच्छी रचना, रचना जी की :)