खेल प्रेमी हम…. March 21, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.trackback
हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी का बुरा हाल है..उसे किसी “कबीर खान” का इन्तजार है या फिर किसी “निकुम्भ सर” का जो हॉकी के तारों को ढूँढे और निखारे.
वहीं अभी भारतीय क्रिकेट टीम ने अच्छी जीत हासिल की है..हर तरफ जोश, जुनून और जज्बे की बातें हैं.लेकिन मै आज भारतीय क्रिकेट की बातें नही कर रही, उसका पहले ही ओवरडोज चलरहा है :) बल्कि आज आपको मिलवाती हूँ मेरे घर के ‘इकबाल’ एक “चैम्पियन” और नन्हे ‘बुधिया’ से
मै पहले भी बता चुकी हूँ कि मै एक खेल प्रेमी परिवार से हूँ. ऐसा नही कि मेरे घर मे कोई खेल सितारा है लेकिन हमारे यहाँ खेल संस्कृति है. मेरे चाचा, भाई और भतीजे सभी अपने अलग अलग कामों मे व्यस्त हैं लेकिन फिर भी कुछ लोग नियमित और बाकी मौका मिलने पर कोई न कोई खेल जरुर खेलते हैं.
मिलिये ‘इकबाल’ से!
मेरी दादी अक्सर इस किस्से का जिक्र किया करती थी..बात सहाठ के दशक की होगी. मेरे छोटे चाचा को खेलों के प्रति जबर्दस्त जूनून था.. एक बार उनका चयन स्कूल की फुटबाल टीम मे हुआ…खेलने के लिये अच्छे जूते चाहिये थे.. जिसके लिये शायद १० रूपये चाहिये थे..पिताजी ने मना कर दिया..उनकी बडी बहन(जिनकी शादी हो चुकी थी, और जो अपेक्षाकृत धनी परिवार से थी), अपने छोटे भाई की मदद के लिये आगे आईं. लेकिन एक शर्त के साथ! शर्त थी कि अगर भाई साडी पहन कर और सिर पर पल्लु ले कर बाजार के उस तरफ रहने वाली मौसी के घर एक संदेशा पहुँचा देगा तो उसे १० रूपये मिल जायेंगे! मेरे १३-१४ वर्षीय चाचा ने ये कर दिखाया और अपने फुटबाल के जूते हासिल कर लिये!
वे फुट्बॉल, हॉकी,टेनिस, बेडमिन्टन के उम्दा खिलाडी रहे हैं. उनका खेल प्रेम अब भी बरकरार है..आजकल गोल्फ खेलते हैं :) इस सबके साथ ही अपने कार्यक्षेत्र मे अपने अनुशासन और कर्मठता के लिये भी जाने जाते हैं..
अब मिलिये मेरी चैम्पियन दीदी से!
ये भी ज्यादातर खेलों की माहिर खिलाडी हैं
एक बार स्कूल मे इनका अकेले का चयन, पहले संभाग स्तर पर और फिर राज्य स्तर पर एथलेटिक्स प्रतियोगिता के लिये हो गया. बहुत दूर दूसरे शहर मे खेलने जाना था..लडकियों मे ये अकेली थीं अत: लडकों की टीम और उनके शिक्षक के साथ ही जाना था.. माँ को थोडी चिन्ता थी, लेकिन दादी ने भेज दिया…वहाँ उन्होने एथलेटिक्स (लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और गोला फेंक) वहाँ उन्होने एथलेटिक्स (लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और गोला फेंक) की राज्यस्तरीय चैम्पियनशिप जीती…
अब भी से अपने स्कूल के बच्चों को उसी जोश से खिलवाती हैं..उनके बेटे-बेटी ने भी परम्परा बरकरार रखी है..बेटी राष्ट्रीय स्तर तक गोताखोरी कर चुकी है..
उनके खिलाडी होने और हारने-जीतने की हिम्मत उन्हे जिन्दगी मे भी काम आई जब एक दुर्घटना के बाद उनके पति साढे तीन साल तक कोमा मे रहे, तब अपने नन्हे बच्चों के साथ हौसले से आगे बढीं….
और ये है बुधिया!
मेरा चार साल का भतीजा जो दौडता नही है लेकिन खाता, पीता और सोता क्रिकेट है..घर मे कोई न मिले तो उसकी दादी को उसके लिये बैटिंग और बॉलिंग करनी पडती है.. मेरा भाई उसके लिये किसी अच्छे पढाई के स्कूल के बजाये क्रिकेट स्कूल मे दाखिले के बारे मे सोच रहा है
मेरे भाई भी नियमित रूप से कोई न कोई खेल जरूर खेलते हैं…पिताजी भी जब अपने कार्यालय से लौटते तो आँगन मे खेल रहे बच्चों के साथ कुछ देर जरूर खेलते..जब भाई ने उनका कार्य संभाल लिया तो वे अपने मित्रों के साथ शतरंज खेलने ही कार्यालय (जी नही! वो सरकारी दफ्तर नही था :)) जाया करते थे.. माँ अक्सर अकेले ही “चाइनीज चेकर्स” या फिर “चंगदूरी” (लूडो की तरह का एक पारंपरिक खेल) की गोटियों मे उलझी रह्ती है.:).
मेरे बारे मे भी बताऊँ?
मै स्कूल मे खोखो और बास्केटबॉल, भाइयों के साथ बेडमिन्टन ठीक खेल लेती थी…पिछ्ले दिनो भाई के घर गई तो भाभी और उनकी मित्रों के साथ वुडन फ्लोर वाले परफेक्ट किस्म के कोर्ट मे खेलने का मौका मिला, मै उनसे उन्नीस नही रही!
जब हमारे परिवार मे किसी की शादी या कोई जलसा होने पर हम सब मिलते हैं तो बडे और बच्चे सब मिलकर खेलते जरूर हैं.
एक बात और-
जिस तरह स्कूल या कॉलेज मे अच्छा पढने वाले विद्यार्थी को को याद रखा जाता है उसी तरह अच्छे खिलाडी को भी सहपाठी याद रखते हैं……….दो बातों का जिक्र करूँगी–
जब मेरी भाभी किसी सिलसिले मे एक सज्जन से मिली तो परिवार की बातों मे मेरे चाचा जी का जिक्र हुआ..उन्होने तुरन्त कहा- “
अच्छा! तुम उसके परिवार से हो, वो हमारे कॉलेज का बहुत अच्छा खिलाडी था!” जाहिर है लगभग ४० वर्ष बाद भी उन्हे ये याद रहा!
कुछ समय पहले जब मेरी और मेरी दीदी की, उनके एक सहपाठी से अचानक मुलाकात हो गई तो उन्होने उनके साथ के लोगों को मेरी दीदी का परिचय यह कह कर कराया कि ” ये बहुत अच्छी खिलाडी थी..मेरी बेडमिन्टन की पार्टनर है!”
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आपको कौनसा खेल पसँद है? ![]()
हमें तो आपका यही खेल पसंद है। लिखते रहना!
आपके और आपके परिवार के बारे में नयी जानकारी पा कर अच्छा लगा।
मेरी मांं के प्रिय शब्द थे कि क्या घर में बैठे हो, बाहर जा कर खेलो। यह चिट्ठी पढ़ कर उनकी याद आयी। मुझे इस चिट्ठी पर दी गयी चिट्ठाकार के द्वारा दी गयी टिप्पणी की भी याद आयी जो की मेरी प्रिय टिप्पणी में से एक है।
मुझे भी खेल न केवल विद्यार्थी जीवन में बेहद पसन्द थे पर आज भी। मुझे भी अपने राज्य, विशवविद्यालय की तरफ से कई बार खेलने का मौका मिला। मैंने इस बात का ख्याल रखा कि मेरे बच्चे खेल के लिये समय निकालें। आजकल अक्सर माता पिता, पढ़ाई के कारण अपने बच्चों को इससे वंचित रखते हैं। मेरे विचार से यह ठीक नहीं।
bahu khub:)
laga padhna,hum bhi rashtriy sthar pe basketball khel chuke hai,wo bhi kya din the,holi mubarak
आपके खेल प्रेमी परिवार के बारे में जानकर अच्छा लगा। मुझे तो क्रिकेट पसंद है ये आपको पता ही है।
वाह भई!! पूरा परिवार खेल प्रेमी… बड़ा ही रोचक रहा सबके बारे में जानना….हम तो बस ताश से समझौता कर लेते हैं. आराम से बैठे बैठे..