एक कथा मेरी भी… April 11, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.trackback
यूँ कहने को तो हर इन्सान और उसकी जिन्दगी खास होती है.लेकिन जो आम है वो है जीवन को सफल बनाने की जद्दोजहद…संघर्ष…किसी के लिये जरा सा ज्यादा और किसी के लिये जरा सा कम….
इन दिनो बच्चों को निरीह प्राणियों/ वस्तुओं की अत्मकथा पढाई लिखाई जा रही है, जैसे कलम की, पेड की, आदि….जब इन सबकी हो सकती है तो मेरी क्यों नही? मै तो हाड- मांस की चलती फिरती जीव हूँ मेरी भी होगी ही!
सूचना- किन्ही अपरिहार्य कारणों से इस पोस्ट का शीर्षक “आत्मकथा” नही रखा गया है.
वो सब मेरी आत्मकथा के ही तो हिस्से हैं!
हर चौबीस घंटे बाद सूरज एक नया दिन लेकर आ जाता है,
हर रात को चांद उसे समेट कर वापिस ले जाता है!
तन और मन को समृद्ध करने की रोज की ही उहा-पोह है!
कभी सुगम रास्ते तो कभी अवरोह है!!
लाभ हानि, खोने पाने, सुख दुख के हिसाब हैं,
नियति और कर्म के अन सुलझे सवाल जवाब हैं!
जो हम कर पाते हैं वो बस प्रयास है!
फल का तो पता नही, साथ सिर्फ आस है!
जिन्दगी का कठिन खेल अपनी सामर्थ्य से खेल रहे है!
हर नये दिन को बीते कल मे ढकेल रहे हैं!!
हर दिन उम्र की सीढियाँ चढ रहे हैं!
जीवन जीने की ये सब जो व्यथा है!
वही तो मेरी आत्मकथा है!!!!!
जीवन क्या है? एक ईश्वरीय प्रथा है!
तेरी मेरी सबकी, यानि “आमकथा” है
हर आम जिदगी के लगभग यही रंग है!
या आपके जीवन के कोई अलग ढंग हैं?-
अगर अलग हैं, तो मुझे बताइयेगा!
अपनी जिन्दगी से मुझे भी मिलवाइयेगा..
रचना जी, आज अनायास फिर आपके ब्लॉग पर आना हुआ… बहुत कुछ जाना समझा… हम हैं…शायद नहीं…बस होने का एहसास भर है… इसलिए जो एहसास है… उसी को महसूस करके जीने का आनन्द मिलता रहे… यही कोशिश रहती है.
…..साथ सिर्फ आस है! आस बनी रहे। ऐसे ही आत्मकथा लिखती रहें।
आमकथा को ऐसे ही ख़ास तरीकों से जरूर पेश करते रहिएगा ।
मेरी कविताओं और लेखों मे जो लिखे किस्से हैं,
वो सब मेरी आत्मकथा के ही तो हिस्से हैं!
badi sacchi aur acchhi baat hai ye rachnaa
रचना आपकी आत्मकथा पसंद आई।
bahut achha likhti hain aap , sahitya aur ek samanya aam zindagi ka ek anutha mel prastut karti hai aap ki rachna .
bahut sundar
साहित्यिक लेख पढने की गरज से हिन्दी का गूगल खोला पहले लेख पढे -कुछ व्यंग्य पढे कवितायें पढने के लिए रचना टाईप किया लेखक की कृती को रचना भी कहते है= इसलिए= आपकी कविता पढने मिली कविता के रूप में आत्म कथा जो आम तोर पर सबकी होती है बहुत अच्छी लगी शब्दों का चयन बहुत उत्तम कोटी से किया गया है साधुवाद
sacchi atmakathach .kash ke meri ruh kuch ke pati .pehle yeh sabko sunati firti thi lekin ab shaant ho chali hai kale kamre ke ek kone mein chup chaap baithi hai…intezaar mein shayad..
जिन्दगी का कठिन खेल अपनी सामर्थ्य से खेल रहे है!
हर नये दिन को बीते कल मे ढकेल रहे हैं!!
very nice !! rachna ji behad khoobsurat rachna hai !!