
कभी कभी हमारे अपने, हमसे कहीं दूर चले जाते हैं,
वो फ़िर कभी वापस लौट कर नही आ पाते हैं..
फ़िर भी उन्हे फ़िर पा जाने की आस बनी रहती है,
उनसे स्नेह की अनबुझी प्यास बनी रहती है….
लगता है वो आसपास ही पंचतत्वों मे समाये हुए हैं,
हमसे जुडी हर अच्छी बात मे छाये हुए हैं…
…………
“तुम उसे फ़िर पा जाने का अह्सास हो!
जैसे वो आज भी यहीं हमारे आस-पास हो!
तुम वो तो नही, लेकिन उसके जैसी ही,
हमारे लिये बहुत खास हो!
खोकर फ़िर खोजें ही नही- बहुत मुश्किल है,
खोने की बात मानता ही नही, ऐसा ये दिल है!
उसे खोकर फ़िर पा जाने की,
तुम , पूरी होती एक आस हो!
वो जमी से गुम है, आकाश से नही!
वो इस दुनिया मे न सही, कहीं और सही!
वो जिस भी दुनिया मे है, खुश है,
तुम इस बात का आभास हो!
जीवन है ये यूं ही बहेगा!
पाना खोना, यूं ही चलेगा!!
खो देने की निराशा के तम मे,
तुम एक सुखद उजास हो………….
तुम उसे फ़िर पा जाने का अह्सास हो!
जैसे वो आज भी यहीं हमारे आस-पास हो!
तुम वो तो नही, लेकिन उसके जैसी ही,
हमारे लिये बहुत खास हो!

** ये दोनो सुन्दर फ़ूलों के सुन्दर चित्र एक मित्र के ्सौजन्य से लगा पाई हूं. शुक्रिया मित्र!