..वैसे तो आप मेरी आवाज कई दिनों पहले सुन चुके हैं.
इस बार सुनिये मेरी और मेरी दीदी के सम्मिलित स्वर मे एक पुराना गीत…….
सुख- दुख दोनो रहते जिसमे, जीवन है वो गांव,
कभी धूप, कभी छांव, कभी धूप तो कभी छांव.
उपर वाला पासा फ़ेंके, नीचे चलते दांव,
कभी धूप, कभी छांव, कभी धूप तो कभी छांव.
भले भी दिन आते जगत मे, बुरे भी दिन आते,
कडवे मीठे फ़ल करम के यहां सभी पाते,
कभी सीधे, कभी उलटे पडते, अजब समय के पांव,
कभी धूप, कभी छांव, कभी धूप तो कभी छांव.
सुख- दुख दोनो ……
क्या खुशियां, क्या गम, ये सब मिलते बारी बारी,
मालिक की मर्जी से चलती ये दुनिया सारी,
ध्यान से खेना जग नदियां मे बन्दे अपनी नाव,
कभी धूप, कभी छांव, कभी धूप तो कभी छांव.
सुख- दुख दोनो ……
कवि- प्रदीप.