घरकुल, घर है कुछ खास लडकियों का…. शिल्पा, पिन्की, श्रुति, प्रिया, अदिति, रेणुका,लीना..आदि.
श्रीमती फ़डके के साथ हम इनके घर पहुंचे. वे सब हमे देख खुश हो गयीं.. सब ठीक से बैठी थी…कोइ ठीक से नही बैठी तो दूसरी ने खींच कर उसे बैठाया… . किसी की ओढनी फ़िसल जाने पर दूसरी तुरन्त उसे ठीक कर देती..
सबसे पहले उन सबने अपना नाम और अपने शहर का नाम बताया. फ़िर हमारे परिचय के बाद उन्होने बडे उत्साह से अपने काम के बारे मे हमे बताया. वे अगरबत्ती की पेकिंग,पापड बनाना, मसालों की पेकिंग करना, कपडे और कागज के सुन्दर फ़ूल बनाना आदि कई काम अपनी सहायिकाओं की मदद से करती हैं…
उनसे कुछ देर बातों के बाद वे हमसे घुल मिल गयीं और किसी ने गाना सुनाया तो किसी ने नाच कर दिखाया. हमे उनके हाथों से बनाये पापड और फ़ूल दिये..मेरी दीदी की बेटी के हाथ मे मेंहदी लगी थी, जो वे सब उत्सुकता से देख रही थी. उनसे मिलकर हमे अच्छा लगा और उन्हे भी, तो हमने तय किया कि हम अगले दिन दोपहर फ़िर आयेंगे, साथ आइस्क्रीम खायेंगे और उनके हाथों मे मेंहदी लगायेंगे.
.. अगले दिन जब हम मेंहदी बनाने के लिये पहुंचे तो सब खाना खाकर अपना रोज का सोना त्याग कर एकदम तैयार थीं. हम सबमे से सबसे अच्छी मेंहदी लगाना दीदी की बेटी ( रानू) को आता है और सबसे कम अच्छी मुझे, फ़िर भी योगेश्वरी मुझसे बनवाने के लिये राजी हो गयी… प्रिया और कुछ अन्य लोगों को रानू से ही लगवानी थी. बाकी को दीदी ने और निशी ने बनाई. किसी को दोनो हाथों मे लगवानी थी तो किसी को एक हाथ पूरा भरकर! सब अपने मेंहदी वाले हाथ को सम्भाल रही थीं और देख देख खुश हो रही थीं..उनमे भी लडकियों मे होने वाली सजने संवरने की सहाजिक वृत्ति थी….फ़िर हमने साथ आइस्क्रीम खाई और बिदा लेने का वक्त आया… मेरी दीदी ने श्रुति को मेहंदी लगायी थी और वो पूरे समय लगातार मेरी दीदी का नाम याद करती रही, फ़िर जब हम जाने लगे तब उसने मेरी दीदी का हाथ पकड कर कहा ” अर्चना मला आवडली” ( अर्चना मुझे अच्छी लगी).
…. ये सभी मन्दबुद्धी लडकियां हैं, जिनमे बहुत कुछ समझ तो है ्बस जरा सी और समझ की कमी रह गयी है.. आम तौर पर दिमाग पूरी तरह से विकसित नही होने पर उसके साथ साथ कोई न कोई और विकलांगता होती है वैसी ही इनमे भी है. कोई बोलने-सुनने मे असमर्थ है तो कोई ठीक से देख नही पाती. समझ भी बेहद कमजोर है. कोई भी काम बहुत धीमे कर पाती हैं, लेकिन लगातार प्यार से सिखाने पर कर लेती हैं… फ़िर लडकियों के वयस्क होने पर सबसे बडी समस्या उनकी नियमित मासिक शारिरिक प्रक्रिया की होती है…
श्रीमती फ़डके और उनके सहयोगी बधाई के पात्र हैं जिन्होने वयस्क मन्दबुद्धी लडकियों के लिये इस “घरकुल” की स्थापना की है, जिसके लिये अथक परिश्रम के साथ ही समर्पण और संयम की आवश्यकता होती है. और आर्थिक सहायता से भी अधिक आवश्यकता होती है समय देने की….. आज के इस “गुरु पूर्णिमा” के खास अवसर पर श्रीमती फ़डके को नमन!
अगली बार जब मै वहां जाउंगी तो मै नही जानती कि प्रिया, शिल्पा आदि मुझे पहचान पायेंगी या नही लेकिन मै इन्हे कभी नही भूल पाउंगी…..
घरकुल के बारे में जानकर बहुत अच्छा लगा. एक साधुवादी प्रयास. श्रीमती फ़डके और उनके सहयोगी निश्चित ही बधाई के पात्र हैं. आपने परिवार के साथ उन सबके साथ समय बिताया, बहुत अच्छा किया. बधाई.
ऐसी जगहों पर जाने के बाद भूलना मुश्किल भी होता है।
शुक्रिया समीर जी!
हां कन्चन कुछ ऐसा ही है इन जगहों के साथ….