स्मृति-शेष……

मुझसे क्यूँकर तुम हुई बडी,
तारों मे जाकर हुई खडी,
मेरी बेटी तुम थी विशेष,
मेरी पूँजी ये स्मृति शेष….

रहती हो तुम वो कौन जहाँ?
कैसे ढूँढू मै तुम्हे, कहाँ?
चिन्ता होती है मुझे यहाँ,
है कौन तुम्हारे सँग वहाँ?
क्या इस जग से बेहतर वो देश?
मेरी पूँजी….

थी सौम्य, शान्त और अति गम्भीर,
आँखों मे डबडब भरा नीर!
थी तुम्हे सदा सादगी पसन्द,
नटने थटने का नही छन्द,
लम्बी चोटी, रेशमी केश!!
मेरी पूँजी…..

कपडों मे ज्यादा सूती पहना,
गहने का धातु बस सोना,
न ‘जन्क फूड’ न ‘फास्ट फूड’,
न चमक दमक, न शोर गुल,
साधा खाना, साधा परिवेश!!

“रो मत आ चल हम तुम खेलें,
मेरी टॉफी भी तू ले ले”
छोटी से ये सब कहे कौन?
है वो स्तब्ध, रहते है मौन.
तुम बिन उसमे है भरा क्लेश.
मेरी पूँजी….

मै लिखती, तुमको दिखलाती,
तुम मुँह बिचका कर यूँ कहती-
“ये पन्क्ति यहाँ पर ठीक नही,
हाँ!दूजी पन्क्ति है खूब कही!”
तुम होती थी पहली पाठक,
तुम होती मेरी सम्पादक!
तुमको न भा जाए जब तक,
तुम पास न करती मुझे तब तक!
अब लेखन है जैसे अवशेष..
मेरी पूँजी….

उस दिन दुकान मे जब देखा,
दुबला-पतला, नन्हा बच्चा,
सहमा सा था, कुछ सकुचाया,
था डरा हुआ, कुछ घबराया.
मजबूरी मे कर रहा काम,
बचपन उसका था यूँ तमाम,
देख उसे तुम दुखी हुई,
नन्हे दिल मे करुणा उपजी-
“माँ!इसको कुछ पैसे दे दो,
मेरा ये पेय इसे दे दो”
त्याग को तुम हरदम तत्पर,
जैसे हो कोई ” सन्त- मदर”!
वो घूँट गले मे ही अटके,
मोती जैसे आँसू टपके.
उस पल ही उस पेय को त्याग दिया,
जीवन भर फिर वो नही छुआ.
जब कर लेती तुम दृढ निश्चय,
फिर ना बदलोगी, ये था तय,
था प्रेम सदा, न कभी द्वेष!
मेरी पूँजी…..

है दुखद बहुत तुमको खोना,
इतनी जल्दी भी क्या जाना,
बातें करती, कुछ कहती तो,
कुछ देर को जरा ठहरती तो,

याद तुम्हारी जब आये
मन मेरा बेहद घबराये
इतना मुझे रुलाओ ना,
इतनी दूर को जाओ ना,
तुम बिन जीना मैं जानू ना,
वापिस आओ, आ जाओ ना।

तुम चली गई हो किस विदेश?
मेरी पूँजी….

तुम बिन, बोलो कैसे जीना?
कितने आँसू, कब तक पीना?
वक्त के साथ न कम होता,
ये दर्द और भी गहराता…
इस जीवन से अब हुआ विद्वेश..
मेरी पूँजी…….

——————-
कबीर का एक भजन मेरी आवाज मे.. जिसे पूर्वी ने ही मुझे ठीक से गाना सिखाया था….

——————-
एक धुन –


———————-

Published in: on दिसम्बर 12, 2010 at 5:26 अपराह्न  टिप्पणियाँ (9s)  

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9s टिप्पणियाँLeave a comment

  1. मर्म तक गहरे स्पर्श कर गई…
    निज़:शब्द हूं….

  2. “रो मत आ चल हम तुम खेलें,
    मेरी टॉफी भी तू ले ले”
    छोटी से ये सब कहे कौन?
    है वो स्तब्ध, रहते है मौन.
    तुम बिन उसमे है भरा क्लेश.
    मेरी पूँजी…

    बहुत सुन्दर!

  3. बहुत दिनों के बाद आपकी आवाज सुनी, अच्छा लगा!

  4. बहुत अच्छी लगी |बधाई
    आशा

  5. सारी पुरानी बातें रह रह कर उभर आयीं और मन को भींगा कर गईं।

  6. बेहतरीन रचना के लिए बधाई। नव-वर्ष की मंगलकामनाओं के साथ ,
    दिव्या।

  7. आप सभी का शुक्रिया, संवेदना समझ पाने के लिये….

  8. दिल उदास हो गया वह दिन याद करके जब आप और मैं वह पॉडकास्ट पोस्ट कर रहे थे और एक-दो दिन बाद ही वह हादसा हुआ।

    ईश्वह आप को संबल दे और नववर्ष खुशियों से भरा हो।

  9. हां श्रीश, वो पहला पॊडकास्ट मैने आप ही से सीखा था….

    आपको भी नववर्ष के लिये हार्दिक शुभकामनाएं…


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