* बाहर से आजाद दिखूं, पर,
अन्दर से हूं अब भी बन्द!
तुम कहते हो सुलझ गया सब,
पर बाकी है अब भी द्वन्द!!
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* वो, जो हर दिन अपनी आजादियों की सीमा लांघते हैं,
मुझसे मेरी आजादियों का हिसाब मांगते हैं!!
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* आजादियां भी बन्धनो को ढोती हैं,
उनकी भी अपनी सीमाएं होती हैं,
और तब उनके कोई मायने नही रह जाते,
जब वे अपनी जिम्मेदारियों को खोती हैं!
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* आजाद तो मै तब होउंगी,
जब अपनी सीमाएं खुद तय कर सकूं!
जब अपनी मन्जिलें खुद गढ सकूं!
जब अत्याचारों से खुद लड़ सकूं!!
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* उसे ऊंचाईयों से इतना दूर रखा गया कि,
वो चढना भूल गया!
दमन से वो इस तरह टूटा कि,
वो लड़ना भूल गया!
कैद से छोड़ने मे इतनी देर कर दी कि,
जब छोड़ा, वो उड़ना भूल गया!!
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* जो मिला अपना सा मुझको,
बात दिल की कह गई,
शब्द जो सब बन्द थे अन्दर,
खुल के बात बह गई !!
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आजादियां…………….
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बहुत सुन्दर भाव हैं। बड़ी अच्छी तमन्नायें ! अच्छा लगा पढ़कर!
बाहर से आजाद दिखूं, पर,
अन्दर से हूं अब भी बन्द!
तुम कहते हो सुलझ गया सब,
पर बाकी है अब भी द्वन्द
हम्म्म सही कहा आपने..
protsahan aur himmat jutane wali kavita lagi mujhe ye. Jaise jaise padhte gayee to abla naari ki vyatha yaad aayee aur phir oose jo aazaadi bhi mili…woh kitnee nakaam rahi aur kyun rahi iski wajah bhi bahut khubsurti se darshaya hai aapne.
Mujhe aakhir ki panktiyaan…bahut hee umeed se bhari lagi….aaj humein aise hee logon ki zaroorat hai…jinse khulke baat kar sakein aur izhaar kar sakein apne dili tammanaon ka…bahut hee khubsurat aur nek kavita – dheron daad kabool farmayein janab…zorr-e-kalam aur jyada
Cheers
गहराई है भावों की इन क्षणिकाओं में…सीधे दिल से उपजी.
वो, जो हर दिन अपनी आजादियों की सीमा लांघते हैं,
मुझसे मेरी आजादियों का हिसाब मांगते हैं!!
-क्या बात है…वाह!!
आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया…