बच्चा अपनी बीमार दादी से मिलने ापने गांव नही जा पाता,
वो अपने बूढ़े दादा जी के पास जरा सा भी नही बैठ पाता!
वो ऐसा नही कर पाता क्यों कि उसे-
खूब पढ़ना है, आगे बढना है!
हर विधा मे माहिर होने के लिये उसकी तरह तरह की क्लास है,
मै समझ नही पाती , जो सामाजिकता से ही दूर करे , वो कैसा विकास है ?
वो अपने चचेरे भाई की शादी मे शामिल नही हो पाता,
गांव मे अपना पुश्तैनी खेत देखने नही जा पाता,
वो ऐसा नही कर पाता, क्यों कि हर समय उसकी कोई न कोई परिक्षा है,
लेकिन जो जीवन मूल्य ही न सिखा पाए, वो कैसी शिक्षा है ?
विकसित होते होते ये बच्चे, निज मे ही घुल जाते हैं,
गांव, दादी, मामा मौसी सब भूल जाते हैं!
खुद तो सच्चे रिश्ते बना नही पाते,
बने रिश्ते निभा नही पाते,
जीवन के अन्त मे इनके पास एक भूतहा बंगला और खूब धन भी होगा,
लेकिन बीमार पड़े तो पास बैठने को एक जन नही होगा.
मै इस तरह की शिक्षा और विकास को व्यर्थ मानती हूं,
और इस पीढ़ी के बच्चों से ये कहना चाह्ती हूं -
वे थोड़ा वक्त अपने वृद्ध दादा के साथ बिताएं,
दादी के लिये पूजा के फ़ूल लेकर आएं,
बुआ को कुछ दिन अपने घर बुलाएं,
कुछ त्यौहारों को अपने गांव मे मनाएं,
सांस्कृतिक मूल्यों को अच्छी तरह निभाएं!
अगर ये ऐसा कर पाए ,
तो न ही इन्हे “पर्सनालिटी डेवलपमेन्ट” की कोई क्लास लगानी होगी,
और न ही खुश रहने के लिये किसी “लॊफ़िंग क्लब” की मेम्बरशिप पानी होगी!
जीवन मे पूर्ण सफ़ल होने के लिये थोड़ी समाजिकता जरूरी है,
सिर्फ़ खुद ही के लिये जिये तो जिन्दगी अधूरी है !
सिर्फ़ खुद ही के लिये जिये तो जिन्दगी अधूरी है !!
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अनुकरणीय!!
जो सामाजिकता से ही दूर करे , वो कैसा विकास है ?
ये सवाल तो सही है।
सिमटते परिवेश पर शानदार प्रहार
बहुत-बहुत पसन्द आयी यह रचना
प्रणाम स्वीकार करें
वाह ! दिल को छू गई आपकी ये कविता। नई पीढ़ी को ही क्यों हमारी पीढ़ी में भी पिछली पीढ़ी की तुलना में सामाजिकता में कमी आई है।
bacche aur dadi ki kya kahu, mai khud aaj apni ma se nahi mil pata hu,
bua aur mausi to door, bhai bahan tak ko barso nahi dekh pata hu,
bachho ke pesonality develpment ke liye pement karate karte, apni khud ki personality bhi khota ja raha hu mai, aaj hal ye hai ki laffing club me bhi jakar, khul kar nahi hans pata hu mai,
khub kaha aapne us jindagi ke liye jo ki sach me adhuri hai, per aapne to is yatharth pe rachana likh hai Rachana, vo aaj ke paripeksh me poori hai,
keep it up
बेहतर…
बड़ा ही मार्मिक रचना है रचना जी | क्या आप फेसबुक पर भी है ?
आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया टिप्पणी के लिये!
@ Saurabh, जी मै फेसबुक पर हूं अपने असली नाम के साथ
Excellent as usual….
sahi hai
it’s right.