एक कथा मेरी भी… April 11, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.9 comments
यूँ कहने को तो हर इन्सान और उसकी जिन्दगी खास होती है.लेकिन जो आम है वो है जीवन को सफल बनाने की जद्दोजहद…संघर्ष…किसी के लिये जरा सा ज्यादा और किसी के लिये जरा सा कम….
इन दिनो बच्चों को निरीह प्राणियों/ वस्तुओं की अत्मकथा पढाई लिखाई जा रही है, जैसे कलम की, पेड की, आदि….जब इन सबकी हो सकती है तो मेरी क्यों नही? मै तो हाड- मांस की चलती फिरती जीव हूँ मेरी भी होगी ही!
सूचना- किन्ही अपरिहार्य कारणों से इस पोस्ट का शीर्षक “आत्मकथा” नही रखा गया है.
वो सब मेरी आत्मकथा के ही तो हिस्से हैं!
हर चौबीस घंटे बाद सूरज एक नया दिन लेकर आ जाता है,
हर रात को चांद उसे समेट कर वापिस ले जाता है!
तन और मन को समृद्ध करने की रोज की ही उहा-पोह है!
कभी सुगम रास्ते तो कभी अवरोह है!!
लाभ हानि, खोने पाने, सुख दुख के हिसाब हैं,
नियति और कर्म के अन सुलझे सवाल जवाब हैं!
जो हम कर पाते हैं वो बस प्रयास है!
फल का तो पता नही, साथ सिर्फ आस है!
जिन्दगी का कठिन खेल अपनी सामर्थ्य से खेल रहे है!
हर नये दिन को बीते कल मे ढकेल रहे हैं!!
हर दिन उम्र की सीढियाँ चढ रहे हैं!
जीवन जीने की ये सब जो व्यथा है!
वही तो मेरी आत्मकथा है!!!!!
जीवन क्या है? एक ईश्वरीय प्रथा है!
तेरी मेरी सबकी, यानि “आमकथा” है
हर आम जिदगी के लगभग यही रंग है!
या आपके जीवन के कोई अलग ढंग हैं?-
अगर अलग हैं, तो मुझे बताइयेगा!
अपनी जिन्दगी से मुझे भी मिलवाइयेगा..
खेल प्रेमी हम…. March 21, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.5 comments
हमारे राष्ट्रीय खेल हॉकी का बुरा हाल है..उसे किसी “कबीर खान” का इन्तजार है या फिर किसी “निकुम्भ सर” का जो हॉकी के तारों को ढूँढे और निखारे.
वहीं अभी भारतीय क्रिकेट टीम ने अच्छी जीत हासिल की है..हर तरफ जोश, जुनून और जज्बे की बातें हैं.लेकिन मै आज भारतीय क्रिकेट की बातें नही कर रही, उसका पहले ही ओवरडोज चलरहा है :) बल्कि आज आपको मिलवाती हूँ मेरे घर के ‘इकबाल’ एक “चैम्पियन” और नन्हे ‘बुधिया’ से
मै पहले भी बता चुकी हूँ कि मै एक खेल प्रेमी परिवार से हूँ. ऐसा नही कि मेरे घर मे कोई खेल सितारा है लेकिन हमारे यहाँ खेल संस्कृति है. मेरे चाचा, भाई और भतीजे सभी अपने अलग अलग कामों मे व्यस्त हैं लेकिन फिर भी कुछ लोग नियमित और बाकी मौका मिलने पर कोई न कोई खेल जरुर खेलते हैं.
मिलिये ‘इकबाल’ से!
मेरी दादी अक्सर इस किस्से का जिक्र किया करती थी..बात सहाठ के दशक की होगी. मेरे छोटे चाचा को खेलों के प्रति जबर्दस्त जूनून था.. एक बार उनका चयन स्कूल की फुटबाल टीम मे हुआ…खेलने के लिये अच्छे जूते चाहिये थे.. जिसके लिये शायद १० रूपये चाहिये थे..पिताजी ने मना कर दिया..उनकी बडी बहन(जिनकी शादी हो चुकी थी, और जो अपेक्षाकृत धनी परिवार से थी), अपने छोटे भाई की मदद के लिये आगे आईं. लेकिन एक शर्त के साथ! शर्त थी कि अगर भाई साडी पहन कर और सिर पर पल्लु ले कर बाजार के उस तरफ रहने वाली मौसी के घर एक संदेशा पहुँचा देगा तो उसे १० रूपये मिल जायेंगे! मेरे १३-१४ वर्षीय चाचा ने ये कर दिखाया और अपने फुटबाल के जूते हासिल कर लिये!
वे फुट्बॉल, हॉकी,टेनिस, बेडमिन्टन के उम्दा खिलाडी रहे हैं. उनका खेल प्रेम अब भी बरकरार है..आजकल गोल्फ खेलते हैं :) इस सबके साथ ही अपने कार्यक्षेत्र मे अपने अनुशासन और कर्मठता के लिये भी जाने जाते हैं..
अब मिलिये मेरी चैम्पियन दीदी से!
ये भी ज्यादातर खेलों की माहिर खिलाडी हैं
एक बार स्कूल मे इनका अकेले का चयन, पहले संभाग स्तर पर और फिर राज्य स्तर पर एथलेटिक्स प्रतियोगिता के लिये हो गया. बहुत दूर दूसरे शहर मे खेलने जाना था..लडकियों मे ये अकेली थीं अत: लडकों की टीम और उनके शिक्षक के साथ ही जाना था.. माँ को थोडी चिन्ता थी, लेकिन दादी ने भेज दिया…वहाँ उन्होने एथलेटिक्स (लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और गोला फेंक) वहाँ उन्होने एथलेटिक्स (लम्बी कूद, ऊँची कूद, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और गोला फेंक) की राज्यस्तरीय चैम्पियनशिप जीती…
अब भी से अपने स्कूल के बच्चों को उसी जोश से खिलवाती हैं..उनके बेटे-बेटी ने भी परम्परा बरकरार रखी है..बेटी राष्ट्रीय स्तर तक गोताखोरी कर चुकी है..
उनके खिलाडी होने और हारने-जीतने की हिम्मत उन्हे जिन्दगी मे भी काम आई जब एक दुर्घटना के बाद उनके पति साढे तीन साल तक कोमा मे रहे, तब अपने नन्हे बच्चों के साथ हौसले से आगे बढीं….
और ये है बुधिया!
मेरा चार साल का भतीजा जो दौडता नही है लेकिन खाता, पीता और सोता क्रिकेट है..घर मे कोई न मिले तो उसकी दादी को उसके लिये बैटिंग और बॉलिंग करनी पडती है.. मेरा भाई उसके लिये किसी अच्छे पढाई के स्कूल के बजाये क्रिकेट स्कूल मे दाखिले के बारे मे सोच रहा है
मेरे भाई भी नियमित रूप से कोई न कोई खेल जरूर खेलते हैं…पिताजी भी जब अपने कार्यालय से लौटते तो आँगन मे खेल रहे बच्चों के साथ कुछ देर जरूर खेलते..जब भाई ने उनका कार्य संभाल लिया तो वे अपने मित्रों के साथ शतरंज खेलने ही कार्यालय (जी नही! वो सरकारी दफ्तर नही था :)) जाया करते थे.. माँ अक्सर अकेले ही “चाइनीज चेकर्स” या फिर “चंगदूरी” (लूडो की तरह का एक पारंपरिक खेल) की गोटियों मे उलझी रह्ती है.:).
मेरे बारे मे भी बताऊँ?
मै स्कूल मे खोखो और बास्केटबॉल, भाइयों के साथ बेडमिन्टन ठीक खेल लेती थी…पिछ्ले दिनो भाई के घर गई तो भाभी और उनकी मित्रों के साथ वुडन फ्लोर वाले परफेक्ट किस्म के कोर्ट मे खेलने का मौका मिला, मै उनसे उन्नीस नही रही!
जब हमारे परिवार मे किसी की शादी या कोई जलसा होने पर हम सब मिलते हैं तो बडे और बच्चे सब मिलकर खेलते जरूर हैं.
एक बात और-
जिस तरह स्कूल या कॉलेज मे अच्छा पढने वाले विद्यार्थी को को याद रखा जाता है उसी तरह अच्छे खिलाडी को भी सहपाठी याद रखते हैं……….दो बातों का जिक्र करूँगी–
जब मेरी भाभी किसी सिलसिले मे एक सज्जन से मिली तो परिवार की बातों मे मेरे चाचा जी का जिक्र हुआ..उन्होने तुरन्त कहा- “
अच्छा! तुम उसके परिवार से हो, वो हमारे कॉलेज का बहुत अच्छा खिलाडी था!” जाहिर है लगभग ४० वर्ष बाद भी उन्हे ये याद रहा!
कुछ समय पहले जब मेरी और मेरी दीदी की, उनके एक सहपाठी से अचानक मुलाकात हो गई तो उन्होने उनके साथ के लोगों को मेरी दीदी का परिचय यह कह कर कराया कि ” ये बहुत अच्छी खिलाडी थी..मेरी बेडमिन्टन की पार्टनर है!”
—-
आपको कौनसा खेल पसँद है? ![]()
द्वंद………. March 9, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.9 comments
स्याही की ये आकृति हैं,
शब्द क्या पीडा कहेंगे!
‘भूल जाओ!’ यही कहकर
दोस्त भी सब चल पडेंगे!
झूठ से अब ऊब कर मैं,
सच को कहना चाहती हूँ.
ताकि मन मेरा न पूछे-
क्यूँ मै खुद से भागती हूँ?
…..
साँस में!
अहसास में!
जीने की हर आस में!
हर्ष मे!
संघर्ष मे!
और हर स्पर्श मे!
मेरे मन मे!
हर लगन मे!
और मेरे हर सृजन मे!
आराधना मे!
साधना मे!
और मेरी कामना मे!
घर को आती हर डगर मे!
रात-दिन के हर प्रहर मे!
अब भी तुमको खोजती है,
ये अभागी माँ तुम्हारी..
कैसे आगे चल सकूँगी?
खुद ही अपने से मै हारी…..
————–
अजनबी कौन हो तुम? :) February 27, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.7 comments
डरो नही अजनबी!! तुम जो भी हो..मै तुम्हे सिर्फ शुक्रिया कहना चाहती हूँ
तुम मुझे खुशी देते हो.. क्यों कि तुम एक जादुई अंक मे हर दिन इजाफा करते हो…
अक्सर ये अंक मेरी दो पोस्ट के बीच १०० अंक तक बढ जाता है..
तुम मुझे लिखने का हौसला दिलाते रह्ते हो.:) लगता है कोई तो है जो ये पढेगा..
जब मै नया नही भी लिखती तब भी तुम मेरे “एतिहासिक” पन्ने( अरे!! अब जो गुजर गया है, वो एतिहासिक ही हुआ ना?
) पढते हो!
अजनबी! ( इस चिट्ठे के वे पाठक जो यहाँ से पढकर चले जाते हैं, बिना टिप्पणी किये..एसा होता है! मुझे पता है! )
शुक्रिया इन सारी बातों के लिये…
आया करो मुझे ये अहसास दिलाने के लिये कि …रहें ना रहें हम..महका करेंगे.…. ![]()
—–
दरअसल अभी जब मै नया कुछ नही लिख रही हूँ, तो मुझे अन्य चिट्ठे पढकर टिप्पणी करनी चाहिये….. लेकिन मै इन दिनो, वो “राइटर्स ब्लॉक” किस्म की बीमारी “रीडर्स ब्लॉक” और उससे भी ज्यादा ” कमेंटर्स ब्लॉक” से जूझ रही हूँ.
मै कई चिट्ठों पर गई लेकिन यूँ ही वापस लौट आई.टिप्पणी करने मे मजा नही आता जब पढकर एकदम “दिल से!” कुछ कहने को मन न करे..
इन बीमारियों से निजात पाते ही आती हूँ आपके चिट्ठे पर :).
चिट्ठों से पूरी तरह से दूर रह पाना मुश्किल सा लगता है
कभी कभी हमे एसे कुछ पढने को मिल जाता है मानो हमारे ही विचारों को किसी ने शब्द दे दिये हों..या कभी टिप्पणी मे कोई ठीक वही कह देता है, जो हम सुनना चाह्ते हैं…
..ये चिट्ठों की अनोखी दुनिया है जो कभी कभी “अपनो की, अपनो के द्वारा, अपनो के लिये” किस्म की लगती है…….
वैसे आप कहाँ के हैं? February 23, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.17 comments
पिछले दिनों मेरा शहर गलत वजहों से देश भर मे चर्चा का विषय रहा….हिन्दी भाषी लोग सहमे हुए थे, खासकर मजदूर वर्ग…कल एक दूकान मे गयी वहाँ पता चला ६ लोग काम छोडकर चले गये हैं…बेकरी का नौकर हिन्दी बोल रहा था, मैने उससे पूछा कहाँ के हो? बडी अच्छी हिन्दी बोल रहे हो! तो हँस कर चुप ही रहा…कई औद्योगिक इकाइयों मे भी असर हुआ है…
ज्यादा गडबडी उसी क्षेत्र मे रही जहाँ मेरा घर है..मेरी एक वृद्ध मित्र है, वे इंग्लैंड की हैं, नासिक मे कुछ सालों से रहती हैं. उन्हे हमारी चिन्ता हुई, फोन से पूछने लगी…
‘All this making headlines in national news paper. It must be a serious issue…are you people also thinking of going back to your state?’
आज के दौर के आदमी के लिये ये अब ये आम बात है कि वो रहता कहीं और है और होता कहीं और का है…
मै पिछले कई सालों से महाराष्ट्र मे रह रही हूँ, मै और घर के सभी लोग अच्छी खासी मराठी बोल लेते हैं.हम लोग कई महाराष्ट्रीयन त्योहार भी मनाने लगे हैं… हमे मराठी आती है तो पिटने का डर नही है….
लेकिन मै सुदामा के लिये चिन्तित हूँ.…सुदामा हमारी गाँव के तरफ का लडका है..
उसने “जन प्रतिनिधियों” की मेहरबानी से छोटे छोटे गाँवों मे खुल रहे इन्जीनीयरिंग कालेज की तरह के एक कालेज से इन्जीनीयरिंग की पढाई की है…वो बहुत गरीब परिवार से है..उसकी चार साल की पूरी पढाई बैंक से लिये कर्ज पर ही हो पाई..यहाँ तक की उसका मकान, जिसमे उसके माता-पिता, भाई और दादी रहते हैं, भी गिरवी रखा है..
वो निराशा से कहता है कि उनके दुर्भाग्य से उनका गांव सरदार सरोवर बाँध” की वजह से डूब मे नही जा रहा, अगर डूब मे जाता तो उन्हे थोडा-बहुत मुआवजा तो मिल जाता!
वो आरक्षित जाति का भी नही है….
…वो अपने प्रदेश से पहली बार बाहर निकल कर नौकरी की तलाश मे यहाँ आया तो हमारे एक रिश्तेदार ने उसे हमारा पता दिया था….उसे मराठी जरा भी समझ मे नही आती थी… उसे कई तरह की सामान्य जानकारी भी नही थी..अन्ग्रेजी भी कमजोर है…लेकिन ये उसका नही बल्कि उसके सामाजिक परिवेश का दोष है…वो सीखना चाहता है..सीख रहा है…अक्सर शाम को आकर् मुझसे पूछता है- ‘ इसे इंग्लिश मे क्या कहेंगे?’ उसकी किस्मत से उसे जल्दी ही अपेक्षा से बहुत अच्छी नौकरी मिल गयी…वो बहुत खुश है कि अब जल्दी ही उसके घर के लिये सब कुछ सुधर जायेगा…..
मै चाह्ती हूँ कि उसके और उस जैसों के लिये सब सुधर जाये….
ये दौर है छोटे शहरों के, कम सुविधाओं वाली जगह से आये धोनी, इरफान और आर पी सिंह का!!
“बिग बाजार” वाले लोग सामाजिक समानता लाने की कोशिश कर रहें हैं ( वे कहते हैं कि उनके मॉल मे कार वाले साहब और उनका ड्राइवर दोनो एक साथ खडे होकर खरीददारी करते हैं!)…”डक्कन एअरलाईन्स” के मालिक ने पहली बार ये सोचा कि भारत की मध्यम वर्गीय आबादी भी हवाई यात्रा कर सकती है!
अगर मेरी ही बात करूँ तो जब मै ब्लॉग जगत से परिचित हुई, तब मैने ज्यादातर लेखकों के नाम के साथ प्रतिष्ठित संस्थानों और बडे शहरों के नाम की तख्ती देखी…अच्छी भाषा और जानकारी के साथ आत्मविश्वास से भरा लेखन दिखा…..
मुझे ये मान लेने मे कोई संकोच नही कि मुझे…..”yes-no”,this-that”, “and-but” जितनी अन्ग्रेजी आती है .
:) वो भी मैने अखबार और न्यूज चैनल से सीखी है…लेकिन जब अपनी लिखी पन्क्तियाँ अपने मित्र को दिखाई तो उनकी कही ये बात मेरे लिये प्रेरक रही—
At times raw is far better than polished!! just go ahead!!
मैने ब्लॉग लिखना शुरु किया और मेरी तो चल पडी! :) मेरा लिखा उन्होने भी पसंद किया जिनकी अन्ग्रेजी मुझे ज्यादा समझ नही आती थी.
तो ये दौर है किसी भी तरह की प्रतिभा के उन्मुक्त विस्तार का!
लेकिन कुछ लोग हैं जो पिछडे हुओं को साथ लेकर चलना नही चाहते…
भगवान का शुक्र है अमेरिका मे कोई “सिलीकॉन वैली नव निर्माण सेना” नही है!! वरना मेरे भाईयों का क्या होगा? ![]()
जन्मदिन मुबारक!! February 15, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.20 comments
आज मेरी बेटी का जन्मदिन है…
आज के दिन उसके लिये मै ये पन्क्तियाँ दोहराना चाह्ती हूँ,
जो कभी किसी ने मेरे लिये कही थीं…..
“हर नये दिन, नई उमंग के साथ,
एक नई जिन्दगी का कर आगाज़!
आसमाँ को न देख हसरत से,
उड! के तुझमे ताकत-ए-परवाज़!!”
……..
उसे गाढे, जीवन से भरपूर रंग पसँद हैं.. उसका बनाया ये चित्र.. शायद आपको भी पसँद आये….

उसकी आवाज सुनना पसँद करें तो यहाँ पर है…
..इस बार उसका ये जन्मदिन, उसकी दीदी के बिना है लेकिन उसने इस कड्वे सच को मुझसे बेहतर तरीके से स्वीकारा है…पूर्वी के हमेशा के लिये खो जाने के बाद उसी ने मुझसे कहा था- ‘मम्मी रोओ मत, दीदी तारा बन गई है!’..और मैने इसे ही सच
मान लिया……..
——————
*** इस पोस्ट के लिये एक खास मित्र को खास धन्यवाद, एक छोटी सी -बहुत बडी सहायता करने के लिये ![]()
*** Thanks Aashu for clicking those pictures and sending them to me…
तो कुछ लिखते क्यों नही??…. February 6, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.16 comments
*** ब्लॉग जगत और ब्लॉग विधा पर एक विज्ञापनीय दृष्टि……
गम्भीर चर्चाओं से जरा हटकर आईये और लीजिये मेरे साथ
एक छोटा सा कमर्शियल ब्रेक…
** जीवन की परेशानियों, विचारों की उथल पुथल और अभिव्यक्ति की कुलबुलाहट से परेशान????
तो कुछ लिखते क्यों नही??
जाइये - ब्लॉगस्पॉट या वर्डप्रेस ( या कोई और डोमेन) के पास जाईये, अपना एक ब्लॉग बनाईये, रोज एक पोस्ट लिखिये और इन तमाम परेशानियों से तुरन्त निजात पाईये!
——-
** वाह —– बाबू! नया ब्लॉग!
नया टेम्पलेट !!
नया सर्विस प्रोवाइडर भी!!!
बढिया है!!
——–
** नये ब्लॉगर हैं!
एडसेन्स वाले हैं!!!
——–
** इन्डिया मे एड्वाइज बहुत दी जाती है!
इस बात पर एड्वाइज ,उस बात पर एड्वाइज ,हर बात पर
एड्वाइज ही एड्वाइज..
इसी काम के पैसे लगें तो?
यही तो!!!
ब्लॉग बना लीजिये!
और जी भर कर दीजिये और लीजिये एड्वाइज ही एड्वाइज!!!
बिल्कुल मुफ्त्!!
बोल इन्डिया!! बोल!!!
—–
** दीवारें टूट जाती हैं, फासले मिट जाते हैं, जब दो बातें हो जाती
हैं……….
——-
** इनके लिये ये पुरस्कार…
उनके लिये वो सम्मान….
और मेरे लिये???? ![]()
——
** कभी कभी कुछ विवाद हो जाते हैं. तब इस विज्ञापन की तरह का द्र्ष्य उभरता है-जब रास्ते मे चलते वक्त नन्ही लडकी ( नया ब्लॉगर )के उपर कीचड उड जाता है और उसका मित्र (कोई वरिष्ठ चिट्ठाकार ) कीचड को लगातार पीटते हुए कहता है- सॉरी बोल! सॉरी बोल! सॉरी बोल!
अब वो तो सॉरी बोलने से रहा,तब खुद ही कहने लगता है -
सॉरी बोल रहा है! सॉरी बोल रहा है!
—–
और अन्त मे इतनी गुस्ताखी की और इजाजत दे दें–
** ये मेरे उन स्नेही जनो के लिये खास तौर पर है जो ब्लॉगर
नही हैं, लेकिन जो इस ब्लॉग के नियमित पाठक हैं..
(**फिल्म “प्यासा” के इस मशहूर गीत के बोल मैने इस्तेमाल किये हैं अत्: गीतकार से क्षमा सहित)
सर जो तेरा चकराये या दिल डूबा जाये
आजा प्यारे ब्लॉग बना ले, काहे घबराये, काहे घबराये
सुन सुन सुन अरे बाबा सुन,
इस ब्लॉग मे बडे बडे गुण,
लाख दुखों की एक दवा है क्यूँ न आजमाए
काहे घबराये, काहे घबराये
सर जो तेरा चकराये ……
बात हो तेरी अपनी, या फिर इसकी उसकी
शब्दजाल मे उलझा करके, मौज तू ले ले सबकी!
सुन सुन सुन अरे बाबा सुन,
इस ब्लॉग मे बडे बडे गुण,
लाख दुखों की एक दवा है क्यूँ न आजमाए
काहे घबराये, काहे घबराये
सर जो तेरा चकराये ……
प्यार का होवे झगडा या बिजनेस का हो रगडा,
सब लफडों का बोझ हटे जब लिखे यहाँ तू तगडा!
सुन सुन सुन अरे बाबा सुन,
इस ब्लॉग मे बडे बडे गुण,
लाख दुखों की एक दवा है क्यूँ न आजमाए
काहे घबराये, काहे घबराये
सर जो तेरा चकराये ……
नौकर हो या मालिक, लीडर हो या पब्लिक
ब्लॉग हैं इनके सबके अपने, क्या राजा क्या सैनिक!
सुन सुन सुन अरे बाबा सुन,
इस ब्लॉग मे बडे बडे गुण,
लाख दुखों की एक दवा है क्यूँ न आजमाए
काहे घबराये, काहे घबराये
सर जो तेरा चकराये ……
——–
ओहो!! इतना समझाने पर भी हिचकिचा रहे हैं?
देखिये, ब्लॉगर स्वभावत: चिन्तक और आदतन उपदेशक होता है और भारतीय होने के नाते ये दोनो गुण आपमे हैं ही… तो गुरु हो जाईये शुरु!! ![]()
जिन्दा हूँ मै!! January 30, 2008
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.12 comments
जी हाँ!जिन्दा हूँ मै!! क्यों कि कुछ सपनो के मर जाने से जीवन नही मरा करता है!
हमारे जीवन मे कई बार निराशा के ऐसे लम्हे आ जाते हैं कि हमे लगने लगता है कि हम बेकार ही जी रहे हैं…लेकिन हमे जीना पडता है…और फिर मरना हर किसी के लिये इतना आसान भी तो नही होता ना!
सालों पहले एक बार मौत मुझे छूकर चली गई थी…शायद वो गलत पते पर पहुंच गई थी और मेरी जिन्दगी ने उसे लौटा दिया… मुझे इसका अह्सास नही हो पाया था क्यों कि मै उस समय एक शल्य-चिकित्सा के दौरान निश्चेतन अवस्था मे थी…वैसे भी इस कथन के अनुसार हमारी मौत से मुलाकात असंभव है कि-’जब हम हैं तो मौत आई नही है और जब मौत आ गई है तो हम नही है!!’
……मेरी आंख में pterigium था, जिसमे आंख के बडे वाले गोल पर एक झिल्ली बढ्कर उसे हल्का सा ढंक लेती है, अगर वो बढकर छोटे वाले गोल तक न पहुँचे तो उससे दृष्टि पर कोई असर नही होता..कोई खास समस्या नही थी, उसे लेकर भी आराम से जिया जा सकता था..लेकिन चिकित्सक की सलाह से तय हुआ कि ५-७ मिनट की छोटी शल्यक्रिया करवा कर उसे हटाया जाए…बडे शहर के बडे नामी गिरामी चिकित्सक से शल्यक्रिया करवायी गयी, लेकिन तीसरे ही दिन सन्क्रमण की वजह से एक cyst हो गयी जिसे चिकित्सक ने फ़िर से हटा दिया…बडे चिकित्सक की छोटी सी लापरवाही की वजह् से वो झिल्ली पहले से कई गुना तेजी से बढने लगी जिसे दो बार शल्यक्रिया कर फिर से हटाया गया लेकिन समस्या बनी ही रही…
फिर स्थानीय चिकित्सक की सलाह से आठ इन्जेक्शन भी लिये ( जो आँख के सफेद वाले हिस्से मे लगे थे १६ दिनो मे!!) लेकिन वो भी बेकार्….अब समस्या गम्भीर होती जा रही थी… मेरे चाचा जी के परिचित नेत्र रोग विशेषज्ञ की सलाह लेने के लिये मै उनके साथ गुजरात गई…..उन्होने सलाह दी अब इस झिल्ली के स्थान पर दूसरी चमडी लगाइ जाने से समस्या का निदान हो सकता है, लेकिन वो सफल ही होगा जरूरी नही है!….यही कराने का तय हुआ..ये शल्यक्रिया बडी थी इसमे आँख की चमडी के स्थान पर ओंठ के अन्दर की चमडी लगनी थी..रिस्क भी थी..चाचाजी थोडे डरे हुए थे लेकिन मै और मेरी चाची दोनो ने बहादुरी दिखाते हाँमी भर दी….वे चाह रहे थे कि मेरे माता पिता को बुलाये जाने के बाद शल्यक्रिया हो लेकिन मैने कहा कि मुझे डर नही लग रहा और जो कुछ करना है वो डाॉक्टर ही करेंगे…डॉक्टर साहब भी जाबाँज मरीज को देखकर तुरन्त ऑपरेशन करने को राजी हो गये.. :)….. दिन निश्चित हुआ….लेकिन उसी दिन चाची की मित्र की तरफ से एक बहुप्रतिक्षित सूचना मिली…भावनगर के पास अलंग शिप ब्रेकिंग यार्ड( जहाँ पानी के जहाजों की निश्चित आयु समाप्त होने पर उन्हे तोडा जाता है) मे एक बहुत बडा जहाज है जिसे देखने जाना है….डॉक्टर साहब की अनुमति से शल्यक्रिया एक दिन आगे बढाई गई और हम लोग कई किलोमीटर दूर अलंग गये….मेरे जीवन का बहुत ही रोमांचकारी अनुभव था वो….समुद्र की रेत मे कुछ दूर चलकर मोटे रस्सों वाली सीढी से जहाज पर चढना सर्कस करने जैसे था..वो चेकोस्लावाकिया का जहाज था, जो बहुत ही बडा था.. तीन मन्जिल तक उसमे कमरे थे और तमाम सुविधाएँ…हमने केप्टन का केबिन भी देखा….वो सब कुछ अब भी मुझे याद है….
..अब शल्यक्रिया वाला खास दिन था..मेरे चाचाजी, डॉक्टर की अनुमति से ऑपरेशन देखने के लिये थियेटर मे मौजूद थे…निश्चेतक देने के बाद शल्यक्रिया शुरु हुई…निश्चेतक से हमारे शरीर की कुछ क्रियाएँ बन्द और कुछ मन्द पड जाती हैं…हृदय को चलते रहना होता है..लेकिन यह क्या!!! अपने सहयोगी अंगों को शिथिल देख, ह्रदय ने भी आराम फरमाने की ठान ली!! अब ह्रदय ही रुक जाये तो जीवन की डोर खत्म होने मे वक्त नही लगता…अफरातफरी मच गई..चाचाजी को बाहर जाने को कहा गया और कृत्रिम रूप से ह्रदय के पंप को दबा दबा कर फिर चलता किया तब जाकर मेरी ( और डाॉक्टर की भी!! ) जान मे जान आई.
अगर डॉक्टर साहब समय पर होशियारी नही दिखाते,
तो हम तो कब के इस दुनिया से विदा हो जाते!
न छोटी खुशियों पर खूब खुश होते,
न ही बडे दुखों पर रोते!
न समझते, न सोचते और न ही लिख पाते
और बताईये तो भला!
आप भी हमारा लिखा पढकर कहाँ मुस्कुरा पाते!!
होश आने पर मैने पसलियों मे असह्य दर्द की शिकायत की ( जो आँख की शल्यक्रिया के बाद मुझे अटपट लगा) तो मेरे चाची चाची ने आँखों मे मौत के मुँह से निकल कर आई अपनी होनहार (!) बेटी को वापस पाने की खुशी के आँसू लिये कहा कि सब ठीक हो जायेगा….
कई महीनो बाद मुझे इस वाकये के बारे मे बताया गया..तब से लेकर अब तक मै जिन्दा हूँ! और आँख ने भी ओंठ वाली चमडी को अपना लिया..बिना ऐनक लगाए तमाम जरूरी काम कर लेती हूँ जैसे चिट्ठा लिखना-पढना आदि. ![]()
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कहा जाता है कि हमारे जन्म के साथ ही हमारी म्रत्यु का समय और स्थान भी तय होता है..तो फिर बजाये इसके कि वक्त हमे साँस दर साँस घसीटे, हमे खुद जी भर कर जीना चाहिये…..
*** मेरे कुछ ब्लॉगर मित्र गाहे बगाहे मुझे मेल लिख कर कहते रह्ते हैं कि लिखती रहा करो..एक ने तो यहाँ तक कह दिया कि लिखो नही तो लोग तुम्हे भूल जायेंगे! लेकिन मुझे विश्वास है कि आप मुझे भूले नही हैं
और दुनिया भर मुझे याद रखे ऐसा मैने कुछ किया भी तो नही….
तो जल्दी ही कुछ मजेदार लेकर फिर हाजिर होती हूँ…..भूलना नही ![]()
एक संदेश…आतंकवादियों के नाम December 30, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.4 comments
कभी इस देश मे तो कभी उस देश मे, कभी इस शहर मे तो कभी उस शहर मे…एक धमाका और कई जाने तबाह हो जाती हैं..इस सत्ता ( या फिर अस्तित्व ??) की लडाई मे किसी की जीत नही होती लेकिन हर बार हारती सिर्फ मानवता है….पता नही किन परिस्थितियों की वजह से मानव इतना खूँखार और विद्रोही हो जाता है…
मुझे ये कहना है—
चलो चलें नव युग की ओर !!
माना, तुममे रोष बहुत है,
नये खून का जोश बहुत है!
गुस्से को अब छोडो भी तुम,
लक्ष्यों को अब मोडो भी तुम!
थामो नव जीवन की डोर!
चलो—–
माना, तुमने बहुत है खोया,
क्षमता से कुछ कम ही पाया.
छूटा जो, वो सब पा लोगे,
सही राह पर अगर चलोगे.
देखो आई नई भोर!
चलो—-
कितने कष्टों को तुम सहते!
खुद को ही तुम छलते रहते.
क्यूँ जिल्लत का जीवन जीते?
अँधेरों मे तुम क्यूँ रहते?
देखो अब सूरज की ओर!
चलो—
हम जैसे, तुम भी आये हो,
तुम भी मनु के ही जाए हो!
हम जैसे अधिकार तुम्हारे,
तुम हो हम सबके ही प्यारे!
पकडो अब आशा का छोर!
चलो–
मानवता की साख को देखो,
खुद के अन्दर झाँक के देखो!
दुष्ट विचारों को तुम त्यागो,
गलती की तो माफी माँगो!!
क्यूँ डरते? जैसे हो चोर!
चलो—
झगडों से क्या हासिल होगा?
मानव का ही खून बहेगा.
माँ की शीश को अब न झुकाओ,
शक्ति को मत व्यर्थ गवाँओ!
सही दिशा मे लगाओ जोर!
चलो—
मित्रों के तुम गर्व बनो अब,
भाई का सम्बल बन जाओ!
पत्नी को उसका हक दे दो,
बच्चों को भी खिलौना लाओ!!
बन्द करो युद्धों का शोर!!
चलो चलें नव युग की ओर !!
चलो चलें नव युग की ओर !!
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प्रार्थना December 21, 2007
Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.4 comments