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अपेक्षाएँ, सुख और दु:ख…. December 11, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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अपेक्षाएँ, सपने और आशाएँ जीने का उत्साह बनाए रखते हैं…..लेकिन यही सब दुख के कारण भी होते हैं….
हमारे परिवार से, मित्रों से और खुद अपने से हमारी छोटी छोटी अपेक्षाएँ पूरी होने पर सुख देती हैं और पूरी नही होने पर दुख भी देती हैं…
क्या अपेक्षाएँ रखी जानी चाहिये या नही?
…..
दो बातों का जिक्र करना चाहूँगी–
कुछ दिनो पहले हमारे एक मित्र के घर से लौटते वक्त रास्ते मे मित्र के परिचित एक वृद्ध सज्जन से हमारी मुलाकात हुई…..औपचारिक परिचय के बाद उन्होने हमे अपना बडा सा घर और बगीचा दिखाया..बात बढी और वे कुछ आध्यात्मिक किस्म की बातें करने लगे जैसे हमे किसी से मोह या अपेक्षाएँ नही करनी चाहिये, दुख सुख कुछ नही होते, आदि…….
मुझे आजकल ये सब बातें सुनकर झुन्झलाहट सी होने लगती है. मै सोचने लगी इन्हे क्या पता दुख क्या होता है, इनके पास तो ये है,वो है…..ये बिकुल निर्मोही किस्म के कठोर इन्सान लगते हैं ……
तभी उनके घर के ऊपर से कुछ अजीब आवाजें आने लगी. उपर वाली खिडकी मे एक २०-२५ साल का युवक कुछ अजीब सी हरकत कर रहा था….उन सज्जन ने बताया कि ये उनका बडा बेटा है, जो मानसिक रूप से विकलांग है. उनका एक १७ वर्षीय छोटा बेटा था , जिसका ह्रदयाघात से निधन हो गया और कुछ महीनो पहले उनकी पत्नी का भी निधन हो गया है. अब उन्हे इस घर कि जरुरत नही रह गयी है, इसलिये वे इसे बेचना चाह्ते हैं और एक छोटी जगह मे रहना चाहते हैं ताकि अपने बडे बेटे का हर समय ध्यान रख सकें….ये सब कुछ वे बडे आराम से बताये चले जा रहे थे, बिना किसी बेचारगी के…..

अब मुझे समझ मे आया कि वे इतने निष्ठुर क्यूँ लग रहे थे….इतने दुख सहने के लिये शायद उन्हे इतना कठोर होना ही पडा हो…..जीवन की सन्ध्या मे वे बिना किसी अपेक्षा के एक मशीन की तरह जीवन बिताने पर मजबूर हैं..
———

पढी हुई हर छोटी बडी बात के बारे मे पूर्वी से बातें करने की आदत हो गई थी इसलिये कई दिनो से पढने मे मन लगता ही नही था….
कई दिनो बाद मैने एक कहानी पढी अफगानिस्तान की एक लडकी फरहा अहमदी की कहानी, “द अदर साईड ऑफ द स्काय”. जीवन के दुखों से हार नही मानने वाली एक लडकी के अदम्य साहस की कहानी है. लडकी सात साल की उम्र मे लैन्ड माइन से एक पैर खो देती है. उसके इलाज के लिये अपनो से मीलों दूर किसी अनजान देश मे अनजान लोगों के साथ दो वर्ष रह कर फिर चलने लायक हो जाती है….वतन लौटने पर युद्ध के चलते अपने पिता और बहनो को खो देती है और फिर १७ और ९ साल के उसके भाईयों को भी…..माँ के साथ किसी तरह पाकिस्तान पहुँचती है ..तमाम परेशानियों और आशा निराशा से जूझती हुई अन्तत: अपनी मर्जी का जीवन जीने की राह पा लेती है…….

अच्छा जीवन जीने की चाह और जीवन से उसकी अपेक्षाएँ उसके संघर्ष मे सहायक होते हैं….

——— 

२६ साल पहले….. December 6, 2007

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८० के दशक के एक इन्जीनियरिंग के छात्र के हिसाब की डायरी के कुछ पृष्ठ देखिये….

 

** हिसाब बिल्कुल अनियमित तरीके से लिखा गया है और एसा लगता है कि माँ के कहने पर ही कभी कभार लिख लिया जाता होगा..हर दूसरे हिसाब के साथ एक्- दो फिल्मों का जिक्र जरूर है! :)

दि.३१--८१

सुरेश गुप्ता को रू. दिये.

केशव से रू. दूध के लेना है.

——–

दि. से तक का कुल खर्च २० रू.

—–

एडमिशन फीस१४७ रू.

७० रू. खाना बनाने का सामान.

—-

दि.२४--८१

२३ रू.- डॉक्टर + दवाई

.६० रू. बस का किराया.

.२० रू. फिल्म.

—-

१० रू. किताबें.

१० रू. कोलगेट + साबुन + सेल.

—————-

आशा- निराशा…. November 21, 2007

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सपने बुनती हूँ, टूट जाते हैं,
टूटकर बिखर जाते हैं,
उनमे से एक टुकडा चुनकर,
फिर सपने बुनने लगती हूँ…

आशाएँ जगाती हूँ, टूट जाती है,
निराशा आती है,
दुख के काँटों के बीच,
सुख के कुछ फूल चुनने लगती हूँ…..

प्रयास करती हूँ, विफल हो जाते हैं,
सहम जाती हूँ,
विफलता के अन्धकार के उस पार,
रोशनी की किरण ढूँढने लगती हूँ……

हिम्मत जुटाती हूँ, हार जाती हूँ,
थम जाती हूँ,
फिर चुपचाप हाथ पर हाथ रख,
 नियति की सुनने लगती हूँ……

रोटी…… November 7, 2007

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“भाजी पोळी देणार का? “( सब्जी रोटी दोगी क्या?)
कभी कभी सुबह मेरे घर के बाहर से ये आवाज मुझे सुनाई देती है…. छोटे छोटे २/३ गरीब बच्चे खाना माँगते हैं…पहले जब कभी कुछ रखा होता था तो मै उन्हे दे देती थी, लेकिन अब उनके लिये बचा कर रखने लगी हूँ…. कुछ नही होने पर चॉकलेट देती हूँ, जिसे  वे बहुत खुश होते हुए बाँट कर खा लेते हैं….
मुझे अच्छे नही लगते वे सम्भ्रान्त लोग जो गरीब लोगों को बेहूदगी से झिडक देते हैं ( वे कुछ नही देना चाह्ते तो भले ही न दें)…..उन्हे लगता है कि भीख माँगने को  एक पेशा बना लेते हैं लोग..एसा हो सकता है, लेकिन क्या पता कोई गरीब सच मे ही भूखा हो… कभी कभी ऐसे दृश्य देखने को मिल जाते हैं………..

एक घर के सामने सडक बन रही थी,
गरीब मजदूरिन वहाँ काम कर रही थी.

मजदूरिन के घर का सारा बोझ उसी पर पडा था,
उसका नन्हा सा बच्चा साथ ही खडा था.

उसके घर के सारे बर्तन सूखे थे,
दो दिन से उसके  बच्चे भूखे थे.

बच्चे की निगाह सामने के बँगले पर पडी,
देखी, घर की मालकिन, हाथ मे रोटी लिये खडी.

बच्चे ने कातर दृष्टि मालकिन की तरफ डाली,
लेकिन मालकिन ने रोटी, पालतू कुत्ते की तरफ उछाली.
कुत्ते ने सूँघकर रोटी वहीं छोड दी,
और अपनी गर्दन दूसरी तरफ मोड दी!
कुत्ते का ध्यान, नही रोटी की तरफ जरा था,
शायद उसका पेट पूरा भरा था!

ये देख कर बच्चा गया माँ के पास,
भूखे मन मे रोटी की लिये आस.

बोला- माँ! क्या रोटी मै उठा लूँ?
तू जो कहे तो वो मै खा लूँ?

माँ ने पहले तो बच्चे को मना किया,
बाद मे मन मे ये खयाल किया कि-

कुत्ता अगर भौंका तो मालिक उसे दूसरी रोटी दे देगा,
मगर मेरा बच्चा रोया तो उसकी कौन सुनेगा?

माँ के मन मे खूब हुई कशमकश,
लेकिन बच्चे की भूख के आगे वो थी बेबस.

माँ ने जैसे ही हाँ मे सिर हिलाया,
बच्चे ने दरवाजे की जाली मे हाथ घुसाया.

बच्चे ने डर से अपनी आँखों को भींचा,
और धीरे से रोटी को अपनी तरफ खींचा!

कुत्ता ये देखकर बिल्कुल नही चौंका!
चुपचाप देखता रहा! जरा भी नही भौंका!!

कुछ मनुष्यों ने तो बेची सारी अपनी हया है,
लेकिन कुत्ते के मन मे अब भी शेष दया है…….
—————

…….कितनी अजीब बात है कि हम अपने मित्रों और रिश्तेदारों को ( जिनके पेट पूरे भरे होते हैं और जो प्लेट मे रखा नाश्ता जूठा करके छोड देते हैं या चाय मे जरा सी चीनी कम या ज्यादा होने पर मीन मेख निकालते हैं!) बुला बुला कर खिलाते हैं लेकिन किसी गरीब को देते वक्त हमे तुरन्त ये खयाल आता है कि दो दिन मुफ्त मे खा लेगा तो इसे आदत हो जायेगी……..

मै तो मालामाल हो गयी!!! November 5, 2007

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अरे नही! मेरी कोई बम्पर लॊटरी नही खुली है बल्कि पिछली पोस्ट मे मैने जिस ’सुविधा गणित’ का  जिक्र किया है उसके हिसाब से मै मालामाल हो गयी!
मेरी पिछली पोस्ट जिन विविध चिट्ठाकार( उनके ब्लॊग लेखन की दृष्टि से) ने पसँ‍द की और टिप्पणी की उसे अगर ’सुविधा गणित’ के हिसाब से देखा जाये तो उस पोस्ट को अच्छा प्रतिसाद मिला है…
उस गणित मे कुछ और सूत्र भी इस्तेमाल किये जाने चाहिये जैसे कि–

आपने अपने ब्लॊग और अपनी पोस्ट पर कितनी मेहनत की है यानि  उसके लिये कितनी किताबें पढीं, कितना वक्त टाइपिंग मे लगाया और अन्य चीजे जैसे- फ़ोटो, लिन्क, और रंगीन या बोल्ड अक्षर इत्यादि.
यदि बहुत तामझाम के बाद कुछ ही टिप्पणियाँ मिली हैं तो अपने जोड मे से कुछ अंक कम कर लें…..
यदि बिना किसी तामझाम के अच्छी टिप्पणियाँ मिली हैं तो कुछ अंक बोनस ले ले :)

खैर ये सब (और इस पोस्ट का शीर्षक भी!) मजाक की बातें हैं..सच यही है कि टिप्पणियों का कोई हिसाब किताब नही होता, गुणवत्ता होती है!
कुछ लोगों के लेखन और उससे उभरे उनके व्यक्तित्व हमारी निजी पसँद होते हैं (जैसे मेरे लिये बेजी, डॉन और घुघुति बासुति जी आदि. पुरुष वर्ग का नाम नही लूँगी क्यों कि उनमे स्पोर्टिंग स्पिरिट दिखाई नही देती :) ).

कुछ लोगों के प्रति हमारा खास सम्मान होता है और ऐसे लोगों की टिप्पणियाँ अंनमोल होती हैं , तो ऐसी टिप्पणियों को किसी गणित मे न उलझाएँ…..

बेजी ने अपनी टिप्पणी मे सच ही कहा कि मेरी पोस्ट अधूरी है. कई दिनो से मैने कोई भी चिट्ठे और टिप्पणियां पढे ही नही है‍ तो ठीक से विश्लेषण कर पाना सम्भव भी नही था और उचित भी नही. जो बातें मैने कही वे सामान्य मानवीय( चिट्ठाकारीय) व्यवहार के तहत कही है…

बसन्त आर्य जी ने कहा है कि टिप्पणी सफलता का माप दंड नही है, ये सच भी है और नही भी… मेरे सबसे ज्यादा पसंदीदा ब्लॉग मे से कुछ पर ( जिनकी हर पोस्ट  ( पिछले कुछ महीने छोडकर ) मैने पढी है!).मैने आज तक एक भी टिप्पणी नही की है! कई बार चिट्ठाकार की छवि इतनी बडी होती है कि आप कुछ कह नही पाते. एसा लगता है कि जिसने अभी बैट पकडना सीखा हो वो सचिन को कहे कि आप अच्छा खेलते हो! (* कुछ अजीब सी तुलन कर दी है लेकिन अभी और कुछ सूझ नही रहा है तो इसी से काम चला लें!, आशा है आप समझ लेंगे कि मै क्या कहना चाह रही हूँ*)….

कई बार समीक्षात्मक ब्लॉग ( मनीष कुमार), शोधात्मक ( सृजनशिल्पी, अफलातून) तथ्यात्मक ( उन्मुक्त) किस्म के चिट्ठों पर भी कहने को कुछ नही होता…..

कई बार टिप्पणियाँ पूर्वाग्रह से पीडित और एक पोस्ट के बजाए उस लेखक के समग्र लेखन को ध्यान मे रखकर कर की जाती हैं

मै किसी भी चिट्ठाकार की कई सारी पोस्ट पढने की बाद ही उस चिट्ठे पर टिप्पणी कर पाती हूँ…
.

मेरे लिये मेरे चिट्ठे की सारी टिप्पणियाँ अनमोल हैं, क्यों कि जब मै चिट्ठाजगत से परिचित हुई तो उसके पहले अपने घर और परिवार के बाहर की दुनिया ज्यादा नही जानती थी, उतनी ही दुनिया को जानती थी जितनी बातें अखबारों और टी वी से मेरे घर मे आती….अन्तरजाल और चिट्ठाजगत से परिचित होने के बाद एक नई दुनिया को जाना….जब मैने लिखना शुरु किया तब मुझे अपनी जानकारी, शब्द सामर्थ्य और अभिव्यक्ति पर भरोसा नही था  लेकिन कालान्तर मे मैने जाना कि भाषा के सौन्दर्य से ज्यादा जरूरी है उससे सम्प्रेषित होने वाला अर्थ….

बहुत सी बाते मैने यहीं सीखी, जो मै अन्यथा नही जान पाती…दुनिया की कई अच्छी पुस्तकों के बारे मे भी मैने यहीं से जाना….ये भी जाना कि तथाकथित बुद्धीजीवी लोग भी सामान्य मानवीय वृत्तियों से पीडित होते हैं, यानि अवान्छित भाषा का प्रयोग , दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश इत्यादि….

समीर जी और चालीस टिप्पणियां October 31, 2007

Posted by rachanabajaj in अश्रेणीबद्ध.
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हिन्दी चिट्ठाजगत मे सर्वाधिक टिप्पणियां‍ लेने और देने वाले ब्लॊगर सम्भवत: समीर जी ही है. वे इतने ब्लॊग पढना और टिप्पणियां‍ कैसे नियोजित करते है‍ इसका वाजिब जवाब उन्होने यहां‍ पर दिया है. इसकी एक गैरवाजिब वजह मै आपको बताती हूं.

( **समीर जी और उनके निष्ठावान पाठको‍ से माफ़ी सहित  )

असल बात यह है कि अपने ब्लॊगि‍ग के पहले ही वर्ष मे उन्होने कई पुरस्कार जीत कर अपने लिये ऊंचे मानद‍ड स्थापित कर लिय है अब उसी साख को बचाने की कवायद मे उन्हे इतना मेनेजमे‍ट करना पड रहा है. अब बताइये भला आपकी हर पोस्ट पर आपको खुश कर देने वाली एक टिप्पणी समीर जी की हो तो अच्छे ब्ला‍गर के चुनाव के समय आप उन्हे अपना एक अदद वोट दे‍गे या नही? :)
फ़िर समीर जी है‍ भी खुशी से जियो और जीने दो किस्म के व्यक्ति, तो अगर किसी के लिये वे कुछ अच्छा कह सके‍ तभी कहते है अन्यथा नही कहते. वजह जो भी हो समीर जी से गुजारिश है कि वे खूब लिखते रहें और टिप्पणियां देते-लेते रहें!

कुछ अन्य लोग भी है, जिनके टिप्पणी नियोजन मैने जानने की कोशिश की है, जैसे–

अनूप जी किसी को भी ब्लॊगर बनाने के लिये और फ़िर उसका ब्लॊग बन्द होता दिखने पर टिप्पणी करते रहते है‍ अपरोक्ष से वे अपने पाठको‍ को कम नही होने देते क्यो‍ कि ये तो लगभग असम्भव ही है कि आप हिन्दी मे लिखते हों और उनका चिट्ठा न पढते हों! और विवादित मुद्दों पर ’सुलहात्मक टिप्पणी’ करना वे अपना धर्म समझते हैं.

कुछ लोग “रेअरेस्ट ऒफ़ रेअर” केस मे ही टिप्पणी करते है‍

कुछ लोग अविवादित बातों पर टिप्पणी करना पसंद नही करते.

कुछ लोग ’देने और लेने’ की नीति के तहत टिप्पणी करते हैं.

कुछ लोग किसी चिट्ठे के समर्पित टिप्पणीकार होते हैं

कुछ लोग कविताओं वाले ब्लॊग पर “एस अ रूल” टिप्पणी नही करते, अगर कोई कविता उन्हे अच्छी लग जाये तब भी नही कर पाते क्यो‍ं कि वे इस बात की घोषणा कर चुके होते हैं कि कविताएं उनकी समझ मे नही आतीं!.

एक और परिचित नाम जीतू भाई है जिनकी ज्यादातर टिप्पणी अनूप जी के लिये सुरक्षित है. बाकी जगहों पर उनकी टिप्पणी कम ही दिखती है चाहे  ब्लॊग लेखक / लेखिका घोषित तौर पर उनके भाई /  बहन हों, तब भी नही!!!

—-

ब्लॊगि‍ग के एक महत्वपूर्ण भाग, टिप्पणियो‍  की व्यथा कथा कई बार लिखी जाती रही है. टिप्पणियां हमे स‍वाद का मौका देती है‍. क्या नये और क्या पुराने ब्लॊगर सभी को टिप्पणियो‍ की दरकार रहती है.  अलेखक किस्म के ब्लॊगर (यानि जो अपनी कलम की धार तेज करने के लिये या अन्य किसी प्रयोजन के लिये ब्लॊगर नही बने है, बल्कि सिर्फ़ अपनी बात अपने तरीके से कह पाने और २-४ लोगों द्वारा उस बात को सुन और समझ लेने से मिलने वाली थोडी सी खुशी के लिये लिखते हैं ) के लिये टिप्पणियों का खास महत्व होता है.पोस्ट पर मिली टिप्पणियो की स‍ख्या से ज्यादा इसका महत्व होता है कि वे किसकी और कैसी है‍. किसी पोस्ट पर टिप्पणी मिलने से ज्यादा जरूरी ये है कि निरुत्साहित करने वाली टिप्पणी न मिले.

बहरहाल बात समीर जी से शुरु हुई थी तो एक “सुविधा गणित” का जिक्र कर उन्ही पर खत्म करती हूं.
समीर जी उनकी एक पोस्ट पर औसतन चालीस टिप्प्णियां पाते हैं और हम सभी उनकी टिप्पणी पाते है‍ तो हमारा आंकडा हुआ-
१*४०= ४०!!!!

इसी तर्ज पर आपकी पोस्ट पर टिप्पणी करने वालों का टिप्पणी औसत निकालिये और उन सब को जोड्कर हो जाइये खुश!!

विरोधाभासी जिन्दगी…. October 27, 2007

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“कभी खुशी से, या फिर बेमन,
साँस साँस यूँ चलता जीवन,
खोया पाया यहीँ छोड कर,
एक दिन मिट्टी हो जाता तन”

बचपन, यौवन और वृद्धावस्था- जीवन के पडाव हैं,
इन पडाओं के साथ आते अनगिनत घुमाव हैं.

सुख-दुख, खोने पाने के उतार चढाव हैं,
कभी सुकून के हल्के क्षण तो कभी तनाव है.

कभी नफरत तो कभी फिर झुकाव है,
कभी मित्रता का आनन्द तो कभी मनमुटाव है.

कभी विचारों की दृढता तो कभी भावनाओं के बहाव हैं,
कभी आक्रामकता तो कभी फिर बचाव है.

कभी सद्भाव तो कभी दुर्भाव है,
कभी समझौता तो कभी फिर टकराव है.

किसी से जुडाव तो किसी से अलगाव है,
कभी संगठन तो कभी फिर बिखराव है.

गैरों के ताने तो मित्रों के सुझाव हैं,
आपाधापी के इस जीवन मे चैन और शान्ति का ाभाव है…

मै चकित हूँ—
इतने विरोधाभासी और क्षणभंगुर जीवन से हमे आखिर इतना क्यूं लगाव है????/
——

राम से मुलाकात……. September 28, 2007

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आत्मबल September 23, 2007

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हम कितना भी चाहें, लेकिन
वक्त कहाँ रूक जाया करता,
कुछ अनपेक्षित घट जाने से
जीवन कब थम जाया करता.

मानव हूँ ना! चलनशील हूँ!

दुख तो आते जाते रहते
दु:खों से घबराना कैसा,
जो नीयत है वो होगा ही
नियति से टकराना कैसा.

शिक्षित हूँ ना! मननशील हूँ!

खुशी मिले तो उन्हे बाँट दूँ
दु:ख अपने सारे मै पी लूँ,
जितनी साँसें शेष हैं मेरी
उतना जीवन जी भर जी लूँ.

नारी हूँ ना! सहनशील हूँ!

रूकने से कब काम चला है
जीवन मे अब बढना होगा,
खुद अपने से हिम्मत लेकर
बाधाओं से लडना होगा.

कर्मठ हूँ ना! कर्मशील हूँ!

भेंट….. September 17, 2007

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 अभी अभी ‘निर्मल आनंद’ की पोस्ट मे, कल मुम्बई मे हुई चिट्ठाकारों की मुलाकात के बारे मे पढा.वहीं से पता चला कि कल फुरसतिया जी’का जन्मदिन था.उन्हे जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ (देर से ही सही).

 कल सुबह ५.३० पर अनूप जी, आशीष, दीपक और मैने मेरे घर पर साथ ही चाय पी थी. मुझे नही पता था कि अनूप जी का जन्मदिन है और उन्होने खुद भी नही बता कर हमे शुभकामनाएँ देने से वन्चित रखा.

अनूप जी और आशीष से मेरा परिचय चिट्ठाकारी के जरिये ही हुआ, लेकिन जब वे मुझसे और मेरे परिवार से मिलने खासतौर से पूना से नासिक आये और १/२ घन्टे रुकेंगे कहते कहते लगभग एक दिन को रुके तो लगा हमारी बरसों पुरानी पहचान है.

 कुछ दिनों से मै चिट्ठाकारी की दुनिया से दूर हूँ, लेकिन कुछ चिट्ठकार मित्र मेल द्वारा सम्पर्क मे बने रहे और लिखने पढने के लिये कहते रहे. आज ये कविता पोस्ट कर रही हूँ, जो मैने अपनी बेटी के लिये लिखी है.आशा है अनूप जी इसे एक छोटी सी भेंट स्वरूप स्वीकार करेंगे, इसी शिकायत के साथ की उन्होने मुझे सुबह अपने जन्मदिन के बारे मे नही बताया.

स्मृति-शेष….

मुझसे क्यूँकर तुम हुई बडी,
तारों मे जाकर हुई खडी,
मेरी बेटी तुम थी विशेष,
मेरी पूँजी ये स्मृति शेष….

रहती हो तुम वो कौन जहाँ?
कैसे ढूँढू मै तुम्हे, कहाँ?
चिन्ता होती है मुझे यहाँ,
है कौन तुम्हारे सँग वहाँ?
क्या इस जग से बेहतर वो देश?
मेरी पूँजी….

थी सौम्य, शान्त और अति गम्भीर,
आँखों मे डबडब भरा नीर!
थी तुम्हे सदा सादगी पसन्द,
नटने थटने का नही छन्द,
लम्बी चोटी, रेशमी केश!!
मेरी पूँजी…..

कपडों मे ज्यादा सूती पहना,
गहने का धातु बस सोना,
न ‘जन्क फूड’ न ‘फास्ट फूड’,
न चमक दमक, न शोर गुल,
साधा खाना, साधा परिवेश!!

“रो मत आ चल हम तुम खेलें,
मेरी टॉफी भी तू ले ले”
छोटी से ये सब कहे कौन?
है वो स्तब्ध, रहते है मौन.
तुम बिन उसमे है भरा क्लेश.
मेरी पूँजी….

मै लिखती, तुमको दिखलाती,
तुम मुँह बिचका कर यूँ कहती-
“ये पन्क्ति यहाँ पर ठीक नही,
हाँ!दूजी पन्क्ति है खूब कही!”
तुम होती थी पहली पाठक,
तुम होती मेरी सम्पादक!
तुमको न भा जाए जब तक,
तुम पास न करती मुझे तब तक!
अब लेखन है जैसे अवशेष..
मेरी पूँजी….

उस दिन दुकान मे जब देखा,
दुबला-पतला, नन्हा बच्चा,
सहमा सा था, कुछ सकुचाया,
था डरा हुआ, कुछ घबराया.
मजबूरी मे कर रहा काम,
बचपन उसका था यूँ तमाम,
देख उसे तुम दुखी हुई,
नन्हे दिल मे करुणा उपजी-
“माँ!इसको कुछ पैसे दे दो,
मेरा ये पेय इसे दे दो”
त्याग को तुम हरदम तत्पर,
जैसे हो कोई ” सन्त- मदर”!
वो घूँट गले मे ही अटके,
मोती जैसे आँसू टपके.
उस पल ही उस पेय को त्याग दिया,
जीवन भर फिर वो नही छुआ.
जब कर लेती तुम दृढ निश्चय,
फिर ना बदलोगी, ये था तय,
था प्रेम सदा, न कभी द्वेष!
मेरी पूँजी…..

है दुखद बहुत तुमको खोना,
इतनी जल्दी भी क्या जाना,
बातें करती, कुछ कहती तो,
कुछ देर को जरा ठहरती तो,

याद तुम्हारी जब आये
मन मेरा बेहद घबराये
इतना मुझे रुलाओ ना,
इतनी दूर को जाओ ना,
तुम बिन जीना मैं जानू ना,
वापिस आओ, आओ जाओ ना।

तुम चली गई हो किस विदेश?
मेरी पूँजी….

तुम बिन, बोलो कैसे जीना?
कितने आँसू, कब तक पीना?
वक्त के साथ न कम होता,
ये दर्द और भी गहराता…
इस जीवन से अब हुआ विद्वेश..
मेरी पूँजी…….