समाज की खातिर….

** आज कविता से थोडा हटकर, लेख लिख रही हूँ.इसकी वजह ये है कि ‘परिचर्चा’ पर चर्चा चल रही है कि “नारद” पर चिट्ठोँ की श्रेणीयाँ बनाई जाएँगी..अगर ऐसा हुआ तो मेरा चिट्ठा ‘कविता’ श्रेणी मे चला जाएगा..अमित ने मेरी एक कविता पर टीप्पणी की थी कि उन्हे कविता से कष्ट होता है, और फिर कहीँ मैने पढा कि जीतू भाई भी कविता ज्यादा पसँद नही करते!! मैने सोचा कि अगर लेख लिखने वाले मनीष जी कविता लिख सकते हैँ तो मै लेख क्यूँ नही लिख सकती?… और उदय से पहले ही मै अपना अस्त नही चाहती!….
खैर ये सब मजाक की बातेँ है, असल बात ये है कि लेख लिखने का धैर्य मुझमे नही है,अत: मेरी विषय-वस्तु लेख की होते हुए भी मै काव्यरूप मे लिखना पसँद करती हूँ, ताकि जल्दी से और कम शब्दोँ मे अपनी बात कह सकूँ..**

अब मुद्दे पर आ जाती हूँ….

आम तौर पर हम कोई भी काम दो वजहोँ से करते हैँ.
१. हमे वो काम करना अच्छा लगता है(तब हम उससे कोई लाभ नही देखते,सिर्फ अपनी खुशी के लिये करते हैँ.)
२.हमारे परिवार के लिये हमारा ऐसा करना जरूरी होता है(तब चाहे हमे वो अच्छा लगे या न लगे हम वो काम करते हैँ).
कभी कभी हम कुछ काम दूसरोँ की खुशी या समाजिक दस्तूर की खातिर भी करते हँ,,तो ऐसा ही एक काम करने की मैने असफल कोशिश की…
हुआ यूँ कि, मेरे पडॉसी दम्पत्ती ने कुछ समय से घर मे ही ‘ध्यान-केन्द्र’ खोल रखा है..हर रविवार वे वहाँ पर ध्यान और आसन करने से शारिरीक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के बारे मे बताते हैँ..
जैसा कि आप सब जानते ही हैँ ‘बाबा रामदेव जी’ की कृपा से भारत मे स्वास्थ्य के बारे मे एक लहर सी चल रही है..महिलाओँ मे अब,विभिन्न धारावाहिको के विभिन्न परिवारोँ की विभिन्न भाभीयोँ को छोडकर ज्यादातर प्राणायाम और आसन की बातेँ होने लगी हैँ…तो उस केन्द्र मे भी आस-पास के कई लोग जाते हैँ….वृद्ध -युवा,सेहतमन्द-दुबले,महिला-पुरुष,कामकाजी-अ-कामकाजी सभी तरह के….मुझे इन सब बातोँ मे खास रुचि नही है,क्यूँ कि,एक तो भगवान की कृपा से(और मेरी दिनचर्या की कार्यशैली से भी!!) कभी वसा(फैट्स) के अवान्छित रूप से शरीर मे जमा होने की अब तक नौबत ही नही आयी और दूसरे जीवन से बहुत ज्यादा अपेक्षा नही होने से मानसिक रूप से भी शान्ति ही है!
फिर भी वहाँ जाने वाली महिलाएँ मेरे बारे मे कहीँ ये विचार न बना लेँ कि “पता नही क्या समझती है अपने आपको!”, मै हिम्मत करके एक दिन वहाँ गई…पहले ५ मिनट तो कुछ श्लोक वगैरह हुए,जो मुझे अच्छा लगा.. उसके बाद कुछ नियमित श्वसन के साथ ही ‘ओम’ का उच्चार करना था..यहाँ तक सब कुछ ठीक था लेकिन इसके बाद का काम मेरे लिये कठिन था.आँखोँ को बन्द करने के साथ ही दिमाग को भी बन्द कर देना था,,याने हमे दुनिया भूल कर किसी शून्य मे चले जाना था..फिर शुभ्र प्रकाश को देखना था और उससे मिली नई ऊर्जा को अनुभव करना था….
आँखे बन्द की तो पहले अँधेरा दिखा!फिर हर रँग दिखा लेकिन लाख कोशिश करने पर भी सफेद प्रकाश का कहीँ नामोनिशान नही था और दिमाग मे भी हर वो विचार आया, जो आमतौर पर कभी नही आता!!
और इसी तरह २० मिनट बिताने थे! शान्ति तो दूर, अपने आप पर ही गुस्सा आ रहा था कि यहाँ मै आईही क्यूँ…और भला १० मिनट के लिये भी ये सोचने की क्या जरूरत है कि हमारा कोई नही है और हमे कोई काम नही है..सच यही है कि हमारी समाजिक जिम्मेदारियाँ है जिन्हे हमे निभाना है,तो फिर अपने आप से एक पल को भी झूठ बोलने की क्या जरूरत है?
सारा समय इसी उहापोह मे निकल गया!आँखेँ खोलने का आदेश हुआ तो सब उस ‘अद्भुत’ आनन्द की चर्चा कर रहे थे,मै सिर्फ इतना ही कह पाई कि ‘ये बहुत कठिन है’…फिर एक वृद्ध महिला,जो कई सालोँ से ये सब कर रही थी, ने अपने परिचय मे और ध्यान के बारे मे कहा….जिस तल्खी और दँभ से उन्होने अपने आप की तारीफ की और ये सब नही करने वाले लोगोँ के बारे मे तीखी बातेँ कही तभी मैने निश्चय किया मुझे यहाँ फिर नही आना है क्योँकि आँखेँ बन्द करके बैठ जाने से ना तो हम विनम्र बन सकते,न ही हमे शान्ति मिल सकती है… जो भी जीवन मे हासिल करना है वो हमेशा आँखे खुली रख कर यथार्थ मे जीकर ही करना है…
अब मै वँहा नही जाती,समाज की खातिर भी नही………

Published in: on सितम्बर 20, 2006 at 5:15 अपराह्न  Comments (16)  

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16 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. मैं नहीं जानता कि यह जो बताया जाता है कि आँखें बन्द कर शून्य में ध्यान केन्द्रित करने से कोई लाभ होता है कि नहीं, पर आपकी बात से सहमत हूँ कि यह एक कठिन कार्य है। मैंने कुछ वर्ष पहले अपने नानाजी की पुस्तकों में से एक में इसके बारे में पढ़ा था और तभी से प्रयत्न करने लगा। आपकी तरह ही आरम्भ में काफ़ी कठिनाई हुई, सभी रंग अलग अलग दिखाई देते थे परन्तु श्वेत नहीं दिखता था परन्तु निरंतर प्रयास के बाद वह भी दिखा। अभी 3-4 वर्षों से जब भी मैं अपने को उदास या अति-उत्तेजित महसूस करता हूँ तब इस तरह ध्यान लगाने से दिमाग को शांत करने में सहायता मिलती है। कदाचित्‌ यही कारण है कि मैं अब बिना ध्यान लगाए भी अपने दिमाग को थोड़ा शांत करने में सफ़ल हो पाता हूँ।

    बात यह नहीं है कि आप अपनी सामाजिक और सांसारिक ज़िम्मेदारियों को भूल जाएँ, वरन्‌ यह इसलिए किया जाता है ताकि इन सब चीज़ों के दिमाग से निकलने से दिमाग शांत हो सके ताकि आप अपनी सामाजिक और सांसारिक ज़िम्मेदारियों का भार बिना उत्कंठित हुए उठा सकें।

    आपके साथ दिक्कत यह हुई कि आपने आशय को समझा नहीं, नतीजा तुरन्त सामने न आने के कारण अधीर हो गईं और इसी कारण आपका ध्यान नहीं लग पाया और क्रोध अलग से आ गया। पहली बार में ऐसा होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है, मेरे साथ भी शुरू शुरू में यही हुआ था जब मुझे नीला-पीला सब दिखता था लेकिन श्वेत नहीं दिखता था, परन्तु मैं स्वभाव से जिद्दी हूँ इसलिए लगा रहा!!🙂

    आप भी लगे रहिए, यदि वहाँ जाने का मन नहीं तो अपने घर में भी अभ्यास कर सकती हैं। समय लगेगा लेकिन यदि नियमित अभ्यास करें तो सफ़लता अवश्य मिलेगी और एक दिन आप भी अपने मस्तिष्क को कुछ समय के लिए विचार रहित कर शांत करने में सफ़ल होएँगी।🙂 और रही बात उस वृद्धा की तो उन पर ध्यान मत दीजिए, ऐसे लोगों की दुनिया में कोई कमी नहीं है।😉

  2. मुझे तो लगता है कि कविता लिखना ज्यादा मुस्किल है लेख लिखना आसान। मैं तो इसी लिये लेख लिखता हूं

  3. कोई भी वस्तु खराब या अच्छी नहीं होती, उसे हमारा नजरिया खराब या अच्छा बनाता हैं.
    लेकिन उन वृद्धा जैसे दंभीयो की वजह से अच्छे उद्देश्यों का भी बेड़ा-गर्क हो जाता हैं.
    आप स्वस्थ हैं तो चिकित्सक के पास जाने की क्या आवश्यक्ता हैं?

  4. मुझे भी कविताएं कुछ ज़्यादा सुट नही करती😉 हां अगर कोई कविता अच्छी हो तो ज़रूर पढलेता हूं। इस से पहले भी अपकी कविताऊँ पर टिप्पणी मे “बहुत बढिया” लिखता था – इसका मतलब है के आपकी कविताएं बहुत अच्छी होती हैं तभी तो मैं बहुत बढिया कहता हूं।
    अमित भाई की बात पर गौर करें मैं उनकी बात से सहमित हूं।

  5. मेरा विचार तो यह है कि हम सिर्फ अपने लिए लिखते हैं. बाकी दूसरे पसंद करें या न करें.

    हाँ, लोग पसंद करते हैं तारीफ़ करते हैं तो यह अच्छा ही लगता है.

    परंतु पता नहीं क्यों, मैं कविताएँ और कहानियाँ भी नहीं लिख पाता.

    ग़ज़लों पर हाथ साफ करता हूँ, परंतु लोगबाग (यानी कि उस्ताद शायर) इसे ग़ज़ल ही नहीं मानते, इसी लिए मैं उन्हें व्यंज़ल कहता हूं- व्यंग्य की धार लिए हुए ग़ज़ल.

    लिखते रहें – परवाह किए बगैर कि लोगों को पसंद आते हैं या नहीं.

  6. मैं भी अमित जी से सहमत हूँ कि “आप नतीजा तुरन्त सामने न आने के कारण अधीर हो गईं और इसी कारण आपका ध्यान नहीं लग पाया और क्रोध अलग से आ गया।” वास्तव में ध्यान एक लम्बी प्रक्रिया है, अगर इतनी आसानी से ध्यान लग जाता तो तकलीफ़ ही किस बात की थी, फ़िर तो सब कोई आसानी से ध्यान लगा कर- तनाव मुक्त हो कर सुख को पा लेते।
    ध्यान करने के लिये जरूरी भी नहीं की आप अपने मन को यह आदेश दें कि ” तुम्हारा कोई नहीं है, तुम्हें कोई काम नही है.. आदि।
    ओशो की एक पुस्तक है “तंत्र सूत्र” जिसमें शिव द्वारा पार्वती को बताये गये १२१ ध्यान की विधियाँ है, जिसमें बहुत सारी तो बहुत ही आसान है। एक बार कर देखें……………….
    प्रयोग के लिये ही सही।

  7. जी मैं तो तीन साल में एक कविता लिखता हूँ ।:)
    वैसे नारद में फिलहाल ऐसा कोई वर्गीकरण नहीं हो रहा .
    खैर मैंने भी कुछ दिन के लिये ही सही रामदेव जी के आसन किये हैं और मुझे करना अच्छा भी लगा। अमित जी ने अच्छा विश्लेषण किया है इस बारे में ।

  8. Kavita ya Lekh..inake liye mai sirf yahi kahuNga:

    http://rahi.wordpress.com/2006/09/20/meri-kavita/

    ..English me likhane ke liye mafee …mere laptop me Hindi IME install nahi hai abhi😦.

  9. @ अमित , शुक्रिया इतनी विस्तृत रूप से अपनी बात कहने का! और मेरी जल्दज़्बाजी के साथ ही शायद मेर पूर्वाग्रह भी था..खैर फिर कोशिश करूँगी..

    @ उन्मुक्त जी, टीप्पणी के लिये धन्यवाद..

    @ सन्जय जी, बिल्कुल सही कहा आपने!!!

    @ शुएब भाई, बहुत शुक्रिया हौसला अफजाई का!!

    @ रवि जी, बहुत धन्यवाद अपने विचार बताने का..और “व्यन्जल” अच्छा शब्द है!!

    @ सागर जी, शुक्रिया..आपकी बताई पुस्तक जरूर पढूँगी…

    @ मनीष जी, “quality matters,quantity doesn’t.”
    और मुझे पता चल गया था कि नारद पर एसा कुछ नही हो रहा,लेकिन ये लेख ४ दिन मे पूरा टन्कित कर पाई…सो पोस्ट करने तक बात बदल गई…और आसन की बात आपने कही..तो मेरे दोनो (शादी के पहले और बाद वाले)ही घरों मे कुछ लोग करते हैं तो मुझे लगभग सभी आसन(उनके नामों सहित!!) आते हैं..
    @ राही जी, शुक्रिया लिन्क देने का, आपकी अच्छी कविता पढने को मिली!

  10. रचना जी,
    जब प्रकाश की आकांशा जग ही गयी है तो जीवन खाली नही बीत सकता। प्रकाश की आकांशा बीज है और बीज है तो अंकुरण भी होगा। मै अमित की बात से सहमत हूँ कि आप नतीजा तुरन्त चाहने की बजाय धयान पर अपना धयान लगाइये। अपनी आकांशा को त्वरा और तीव्रता दीजिये।

  11. अब तो बहुत समझा दिया गया है आपको सबके द्वारा, तो फिर देर किस बात की. शुरु हो जाईये ओम के उच्चारण के साथ.

  12. @ प्रभात जी, धन्यवाद टीप्पणी के लिये.फिर से कोशिश करूँगी.

    @ समीर जी, समाज की खातिर न सही, टीप्पणीकारों की खातिर करूँगी!!

  13. रचना जी
    जुगाड़ों की खोज करते समय एक पुस्तक मिली जो शायद आपके लिये फ़ायदेमन्द हो सकती है लिंक दे रहा हुँ, जरूर देखेंनाम है “तनाव से मुक्ति” इस में आपके सारे संशयों का समाधान मिल जायेगा।यह स्वामी शिवानण्द जी की पुस्तक है और .doc फ़ाइल है सो आप इसे डाऊन लोड भी कर सकेंगी।
    http://ildc.gov.in/hindi/DL%20Books/TanavsaMukti.doc

  14. sorry mere comp.me hindi fonts nahi he……
    aap sabako pada. aap sabake apne vicharon ko batane ke kitane pyare shabd he. mujhe padana achchha lagata he…par bahut soch kar bhi likh nahi paati……

  15. @ naahar jee, dhanyawaad pustak bhejane ke liye, padhakar samajhane ki koshish karungi…

    @ varsha jee, koi baat nahi aap koshish karengi to hindi fonts dhundhkar usame likh bhi sakengi..
    aapane jitane shabd yaha likhe hai ,wo achche hai, koshish karengi to likh bhi sakengi!! shubhkaamanaaye!!

  16. […] समय था जब हमने आपसे जुडे रहने की खातिर लेख लिखना शुरु किया….लेकिन अब बात […]


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