जान-पहचान

मै कुछ महीनों से चिट्ठे लिख-पढ रही हूँ.आमतौर पर ये होता है कि मै कुछ लिखती हूँ फिर कुछ लोग टिप्पणी के रूप मे अपनी प्रतिक्रिया लिख देते है, लेकिन कल मैने देखा कि ‘अबाउट’ वाले पेज पर पहले ही से दो टिप्पणियाँ हैं जो मेरे लेख का इन्तजार कर रही हैं. अगर वे टिप्पणियाँ किसी ‘अनाम’ ने लिखी होती तो उसके लिये मेरा जवाब होता-‘भैया,आप खुद तो अपने नाम तक के बारे मे कन्फ्यूज्ड हो मेरे बारे मे जान कर क्या कर लोगे?”
लेकिन टिप्पणियाँ थी समीर जी की और श्रीश जी (परिचर्चा के नये मास्टर जी!) की, सो मैने सोचा कुछ लिख देती हूं.बहुत खोजा मैंने लेकिन अपने बारे मे लिखने को ‘मनभावन’ कुछ मिला ही नही!

मेरा नाम आप सब जानते ही हैं और हम दुनिया में कहीं भी रह्ते हों ‘यहाँ’ या ‘वहाँ’ या फिर ‘झुमरी तलैया’ में (बशर्ते वहाँ अन्तरजाल की सुविधा हो!), इससे क्या फर्क पडता है! हम हमारे चिट्ठों पर ही मिलते रहते हैं और उस लिहाज से सब एक दूसरे से सिर्फ दो ‘क्लिक'(अगर ‘फेवरिट’ मे ‘एड’ हों तो!!) या फिर तीन या चार ‘क्लिक’ दूर हैं.

मै चिट्ठों की दुनिया मे इत्तफाक से आई, ये शब्दों और विचारों की दुनिया मुझे अच्छी लगी सो मै यहाँ हूँ.वैसे पढ़ने को अच्छी किताबें, पत्रिकाएँ, और अखबार भी हैं लेकिन यहाँ एक संवाद या वार्तालाप है जो मुझे पसंद है. हमारी भारतीय संस्कृति की कई विशेषताओं में से एक यह भी है कि हम लोग बहुत कुछ ‘कहना-सुनना’ पसंद करते हैं. जनता की सरकार से, वृद्धों की बच्चों से, बीबियों की पतियों से कई बार शिकायते इतनी सी ही होती है कि वो उनकी सुनते नही हैं. हम इमानदारी से अपनी समस्या का समाधान चाहते भी कहाँ हैं, कोई हमारी बात सुन ले हम इसी से संतोष पा लेते हैं.

मै चिट्ठों को हर गाँव, कस्बे या शहर में गली के किसी नुक्कड़ पर हर दिन होने वाली चर्चाओं का ही परिष्कृत रूप मानती हूँ जहाँ खेल, राजनीति या सामाजिक विषयों पर चर्चाएँ होती हैं.फर्क सिर्फ यह है कि चिट्ठा जगत के लोग कुछ ज्यादा पढ़े-लिखे और विचारक किस्म के होते हैं (मै उनमें से एक नही हूँ!!).यहाँ हम शब्दों और विचारों से एक दूसरे को जानते है और पसंद या नापसंद करते हैं. कई बार हमारे शब्दों से हम वो बताते हैं जैसे कि हम हैं, लेकिन कई बार हमारे शब्दों से हम वो कहते हैं जैसा कि हम होना चाहते हैं.

आपकी जानकारी के लिये कोशिश करके यहाँ कुछ लिख दिया है.पहचानना चाहते हैं तो कुछ दूर इस चिट्ठे के साथ चलियेगा.वैसे कुछ लोग यहाँ हैं जो मुझे पहचानते भी हैं, उनसे गुजारिश है कि अगर वे मेरे या इस चिट्ठे के बारे मे कुछ कहना चाहें तो जरूर कहें.सिर्फ दो बातों का ध्यान रखें-

१. मै किसी भी मजाक का बुरा मान सकती हूँ!!
२. मैं किसी भी बात को मजाक मान सकती हूँ!!!

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Published in: on नवम्बर 30, 2006 at 2:41 अपराह्न  Comments (9)  

हम हारते क्यों हैं?

जी हाँ! मै क्रिकेट के बारे मे ही बात कर रही हूँ. ठीक है मैने कभी क्रिकेट खेला नही, लेकिन देखा, सुना और पढा तो है! और फिर मै भारतीय नागरिक हूँ, ‘अभिव्यक्ति’ की पूरी स्वतंत्रता है मुझे, जिस बारे मे बहुत कुछ नही जानती, जिस बारे मे मै कुछ कर सकती नही, उस पर भी बहस कर लेना, राय जाहिर करना मेरे भारतीय होने को और मजबूत करता है!
मेरा मानना है कि हमारी टीम और दूसरी टीमों (खासकर आस्ट्रेलिया)मे कुछ बुनियादी बातों का अन्तर है जिसकी वजह से ही हम हारते और वे जीतते रहते हैं, जैसे–
१.हमारे लिये हारना कोई दुनिया के खतम होने की बात नही.. अच्छा करने के लिये हमेशा ही एक ‘कल’ होता है हमारे पास.उनके लिये मानो जीतने के लिये दूसरा कल होता ही न हो!
२.हमारे हर खिलाडी के पास ‘ऑफ डे’ या ‘ऑफ टूर’ जैसी सुविधा होती है. उनके पास ये सुविधा कम ही होती है.
३.हमारे किसी खिलाडी ने 8000 से ज्यादा रन बनाये हों या फिर किसी एक या दो टूर्नामेन्ट मे एक-दो चमत्कारिक पारियाँ खेलीं हो तो ७-८ टूर्नामेन्ट मे उसे फेल होते रहने का पूरा हक है. जबकि उन्हें हर मैच मे “प्रूव्ह” या “इम्प्रूव्ह” करना होता है.
४.ऑस्ट्रेलिया के कोच को हार मानों बर्दाश्त ही नही.(याद है ऐडीलेड(शायद) मे भारत से हारने पर उनके कोच ने चिट्ठी द्वारा कैसे फटकार लगाई थी और होशियारी से वो जानकारी मीडीया मे दे दी गई थी.)
हमारे कोच और कप्तान का एक ही बयान चलता रहता है- “बाॉयज आर वर्किंग हार्डॅ”!! अब जब सबको “हार्ड वर्क” का फल मिलता है तो इन्हे क्यो नही?
५.हमारे खिलाडियों को क्रिकेट के सिवा रेस्तराँ,हेयर सलून चलाना, विज्ञापन आदि दूसरे काम भी तो हैं!
६.हमारे देश मे क्रिकेट धर्म है!!(अब ये बात समझ से परे है,क्या पहले से मौजूद इतने धर्म कम हैं,जो समय समय पर परेशानी का सबब बने हैं हमारे लिये? जो खेल को भी धर्म मान लिया जाये?)

तो बताइये आप सहमत हैं या नही हार के इन कारणों से?

अब हमारे नये कोच भी लगे हुए हैं नये प्रयोगों मे.इसी के तहत उन्होने एक आस्ट्रेलियन दाँव अपनाया और वेस्ट इंडीज दौरे पर जाते ही घोषणा कर दी कि वेस्ट इंडीज की टीम ‘जीतना’ भूल गयी है! अब बेचारे खुद ये भूल गये कि वे जीतना भूल गये तो क्या हुआ, हम हारना थोडी भूले हैं!!और फिर वो ये भी नही जानते की हमारी टीम मे टीम भावना कूट कूट कर भरी हुई है, एक नही चला तो कोई भी नही चलेगा!!

मै उस परिवार से हूँ जहाँ खेल जीवनशैली का एक हिस्सा रहे हैं. माँ के घर संयुकत परिवार मे लडके ज्यादा और लडकियाँ कम थीं तो हम सब मिलकर ही खेला करते थे.जब हम बहुत छोटे थे तब बडे भाइ हमसे फिल्डिंग करवाते, बदले मे हमे कुछ देर के लिये बल्ले और बाल को छू लेने दिया जाता.घर मे पिताजी और भाई टी वी पर क्रिकेट मैच का मजा लेते तो हम भी उसमे शामिल होते.दो भाईयों के पसंदीदा खिलाडी अलग अलग होते और उनमे से किसी के चलने या नही चलने पर भाईयों मे हुई बेवजह की बहस के हम साक्षी होते.
अब शादी के बाद भी हमे सपोर्टिव रोल अदा करना पड्ता है. मसलन कुछ वर्षों पहले तक जब मोबाइल या नेट ज्यादा प्रचलित नही था तब दिन मे मैच देखकर ‘उन्हे’ स्कोर बताना पड्ता.या फिर जब सुबह बच्चों से वादा किया जाता कि उन्हे शाम को घूमने ले जायेंगे और शाम को पता चलता कि आज कोइ खास मैच है तो बच्चे हमारे जिम्मे होते .भारत कोइ “नेट वेस्ट सीरीज” या फिर पाकिस्तान से मैच जीते तो आधी रात मे हलवा हमे ही बनाना पडता है….. अब बताइये जिसके लिये हम इतना कुछ करें उस पर बोलें क्यूँ नही?

Published in: on नवम्बर 24, 2006 at 6:25 अपराह्न  Comments (10)  

नन्हे दिमाग और मासूम तर्क

छोटे बच्चों के किसी काम को करने या नही करने के अपने तर्क होते हैं.कई बार वे अपने उत्सुकता भरे सवालों से अपने माता-पिता को स्तब्ध कर देते हैं.हर दिन सोने के पहले बच्चे के पास माँ के लिये कुछ सवाल जरूर होते हैं, और माँ के लिये सबसे कठिन काम होता है बच्चे को ये समझा पाना कि दुनिया मे कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब उनकी माँ के पास भी नही है! ऐसे ही कुछ सवाल जवाब मेरे और मेरी बेटी के बीच–

बेटी- जब मै बडी हो जाउँगी तब दीदी छोटी हो जायेगी ना? तब वो मुझे दीदी बोलेगी!
मै- नही ऐसा नही हो सकता, उसका जन्म तुमसे पहले हुआ है, तो तुम ही उसे दीदी बोलोगी हमेशा..
बेटी- ये तो गलत बात है! मै ही उसे दीदी बोलूँ?, फिर आपने मुझे आपकी बडी बेटी क्यूँ नही बनाया???
मै———–

बेटी- पापा रोज आफिस क्यूँ जाते हैं?
मै- काम करना पड्ता है….पैसों की जरूरत होती है….
बेटी-क्या?? पैसे हम ‘ए टी एम’ से नही लाते???????

बेटी- आज जी. के. का एक प्रश्न था ना उसके दो सही जवाब थे.
मै- कैसे?
बेटी- प्रश्न था-इनमे से कौनसी चीज ‘वाल्यूम'(*आयतन, ये जानने के लिये वो काफी छोटी थी*) मे बढ सकती है–
१.टी वी २. बुक ३. बलून ४. कम्यूटर.
तो टी वी और कम्यूटर (स्पीकर मे) दोनो मे ‘वाल्यूम’ बढ सकता है ना?

और भी कुछ किस्से देखिये–

एक बार जब मेरी भतीजी अपनी माँ के साथ आपना परिक्षाफल लेकर घर लौट रही थी तब माँ ने उससे पूछा तुमने एक प्रश्न का जवाब छोड क्यूँ दिया?,जबकि वो तुम्हे आता था?’
बेटी का जवाब था-‘हाँ मैने ऐसा किया, क्यों कि मै इस बार ‘–‘ को प्रथम आने देना चाहती थी, एक बार उसे भी तो आने दो! हर बार उसकी मम्मी उसे परिणाम के दिन डाँटती है, इस बार मै डाँट खा लेती हूँ.’

एक बार मेरी बेटी ने बैंगन के चित्र मे लाल रंग भर दिया, जब मैने उससे पूछा क्या उसे नही पता कि बैंगन कैसा होता है?..’हाँ पता तो है, लेकिन मेरे कलर बाक्स मे सबसे गंदा रंग वो ही है ,इसलिये मै उसे कभी नही उपयोग करूंगी!’उसका जवाब था…

दो साल पहले मेरी बेटी का चुनाव उसकी शाला की तरफ से चित्रकला की किसी स्पर्धा के लिये किया गया, जिसे अन्य शहर की कोई और शाला संचालित कर रही थी..उसके शिक्षक ने मुझे बताया कि उसके ग्रुप मे ज्यादातर बच्चे उससे बडे ही चयनित होते हैं..तो मै वहाँ उसे प्रतियोगिता के उद्देशय से कम और दूसरे बच्चों का काम देखने और सीखने के उद्देश्य से ज्यादा, ले गयी…
जैसे ही वो चित्रकारी करके कक्ष से बाहर आई, मैने पूछा- किसका चित्र तुम्हे सबसे ज्यादा अच्छा लगा?
‘मेरा!!’ उसका जवाब था!
चित्र का विषय था – एक अन्धा भिखारी और एक छोटा बच्चा.
उसने चित्र तो अच्छा बनाया लेकिन भिखारी और उसके साथ वाली बच्ची को बढिया कपडे पहनाये और सजे सँवरे बाल बनाये.तर्क था- “मुझे उनको गन्दे कपडे पहनाना पसन्द नही है!”
प्रतियोगिता के अन्त मे वहाँ पुरस्कृत चित्रों की प्रदर्शनी थी….एक चित्र को देख उसकी टीप्पणी थी-“कैसा चित्र बनाया है१ सब औरतें कितनी मोटी बनाईं हैं!”( वो द्वितीय स्थान प्राप्त चित्र था!)
एक ‘माडर्न आर्ट’ के जैसे चित्र को देखकर बोली–‘क्या बनाया है!! कुछ समझ ही नही रहा!!!
मेरी बेटी को वहाँ कोई इनाम तो नही मिला, लेकिन हम वहाँ से उसके चित्र और टीप्पणीयों कि लिये खूब सारी तारीफ लेकर लौटे!

Published in: on नवम्बर 21, 2006 at 6:10 अपराह्न  Comments (15)  

बेटी

कल मनीष जी के चिट्ठे पर एक मार्मिक गीत पढने को मिला..गीत ‘उमराव जान’ के जमाने का है, लेकिन आज इतने सालों के विकास के बाद भी समाज की कई बेटीयों की कहानी वही पुरानी है…उन्होने इस पर अपने विचार भी लिखे हैं….उसी बात को मैने कुछ इस तरह कहा है—-

मत रोको उसे पढने दो,
मत बाँधो उसे बढने दो,
पत्नी होगी, माँ भी होगी,
उसका जीवन तो गढने दो!

मत खीचों उसे चढने दो,
मत थामो उसे गिरने दो,
आसमानों को छू भी लेगी,
कुछ उसको भी उड लेने दो!

मत टोको उसे हँसने दो,
मत छेडो उसे रोने दो,
सबका तो वो सुन ही लेगी,
कुछ उसको भी कह लेने दो!

तुम जहाँ बढे वो वहाँ बढी,
तुम जहाँ रूके वो वहाँ रूकी,
अपनी मन्जिल पा लेगी वो,
कुछ उसको भी चल लेने दो!

जग सो भी गया वो जगी रही,
कर्तव्यों से वो डगी नही,
सबका जीवन महका देगी,
खुद उसको तो खिल लेने दो!

सब कामों को वो कर लेगी,
सब मुसीबतें वो हर लेगी,
सबके सपने सच कर देगी,
उसके सपने तो बुनने दो!!!

Published in: on नवम्बर 17, 2006 at 4:45 पूर्वाह्न  Comments (13)  

बचपन

वो निर्मल कोमल सुन्दर तन,
वो लापरवाह सा चन्चल मन,
कितना अच्छा था वो बचपन!
कितना अच्छा था वो बचपन!

खाना खेलना और सोना,
थोडा हँसना, थोडा रोना,
लडना, कुछ देर मे फिर मिलना,
कुछ पाकर के फिर से खोना,
वो सब कुछ था कितना पावन!
कितना—-

फिर आशाएँ सपने जागे,
हम पीछे, इच्छाएँ आगे,
हम तृष्णा के पीछे भागे,
तोडे सब बन्धन के धागे,
यूँ दौड रहा था अब यौवन!
कितना—

फिर जाँत-पाँत, ऊँचा-नीचा,
छल-कपट और झूठा-सच्चा,
ये हमने दुनिया से सीखा,
कुछ हारे हम और कुछ जीता,
अब प्यारा है पैसों का धन!
कितना—-

गुम सारे प्यारे मित्र हुए,
पशु-पक्षी मानो चित्र हुए,
मानव मानो कि यंत्र हुए,
रिश्तों के जर्जर तंत्र हुए,
किसको फुर्सत? सब व्यस्त हुए,
सब अपने मे ही मस्त हुए,
बिल्कुल बदला है अब जीवन!
कितना—–

वो निर्मल कोमल सुन्दर तन,
वो लापरवाह सा चन्चल मन,
कितना अच्छा था वो बचपन!
कितना अच्छा था वो बचपन!!

—————-
बच्चोँ के लिए कुछ पँक्तियाँ—

‘बालक’

“माँ की खुशियोँ का पल बालक,
उसके सपनो का कल बालक,
माँ के जीवन का बल बालक,
उसकी मुश्किल का हल बालक.”

“ना सुख जाने ना दुख जाने,
झूठ ना जाने, सच्चा है!
गलती करता, शिक्षा पाता,
पका नही अभी कच्चा है!
बेफिक्र है वो, बेखोफ भी है,
ना कपटी है,ना लुच्चा है!
कुछ नटखट है, कुछ भोला भी,
वो बडा नही अभी बच्चा है!!”
———-
और अन्त मे एक कविता जो मैने अपनी बेटी के लिये लिखी थी—

SONG OF A LITTLE GIRL

I am a little tiny girl,
Bright and fresh like a pearl.
I want to sing a beautiful song,
But sister says the lyric is wrong.
I like to watch the cartoon show,
But papa wants the news in a row.
Sometimes study is just enough,
But to convince mummy is very tough.
With my friend I have friendly fight,
But teacher says to be calm and quiet.
I want to do a swinging dance,
But who will give me a mere chance?
This I should do and that I should not,
Can I do once what I want!
I would like to be very frank,
I just don’t like grade and rank.
I am ready to study hard,
But I hate the report card.
I love to play the whole day,
It may be doll, ball or clay.
To growing old is no more fun,
I want to be always little one!

Published in: on नवम्बर 14, 2006 at 3:17 पूर्वाह्न  Comments (13)  

क्या ये ही विकास है?

कुछ दिनों पहले सुनील जी के चिट्ठे पर एक बच्चे का चित्र देखा था.बच्चा शायद खाना मिलने का इन्तजार कर रहा था.वहीं एक आइसक्रीम बेचने वाले बच्चे का चित्र भी है. भारत मे तो ये सब दृश्य आम हैं ही,दुनिया भर मे भी कई गरीब देशों के बच्चे हैं जिन्हे बुनियादी सुविधाएँ नही मिल पा रही हैं.विज्ञान के सहारे मानव दिन दूनी-रात चौगुनी प्रगती कर रहा है, तब ये कहने को मन करता है ——

खूब किया तुमने जो महल खडे किये,

अब थोडी जगह उसके झोपडे को दो!

खूब किया तुमने, अपने पेट भर लिये,

अब थोडी रोटी उसके लिये छोड दो!

खूब किया तुमने, हर डिजाईन पहन लिये,

थोडा कपडा उसको तन ढँकने को दो!

खूब किया तुमने, निज लक्ष्य पा लिये,

अब थोडे उसके सँघर्ष थमने दो!

खूब किया तुमने, मंगल पर चढ लिये!

अब थोडी धरती उसकी भी होने दो!!!

Published in: on नवम्बर 11, 2006 at 4:24 अपराह्न  Comments (4)  

लक्ष्मी की दीवाली

लक्ष्मी पूजन का दिन था. घर मे पूजा की तैयारियाँ चल रहीं थीं.लक्ष्मी जी की एक बडी सी तस्वीर रखी थी, जिसमे कमल के फूल पर बैठी हुई लक्ष्मी जी हाथ से पैसे बिखरा रही थी.पास ही सरस्वती माँ की एक छोटी तस्वीर रखी थी.लक्ष्मी जी की खूब मेहरबानी थी घर वालों पर.कहते हैं कि लक्ष्मी की भव्यता के साथ रहना सरस्वती कम ही पसंद करती है, तो कुछ ऐसा ही था इस घर मे भी..
घर की ‘गृह-लक्ष्मीयाँ'(दूर्गाएँ??)अपने अपने श्रृंगार मे लगीं थीं..दादी माँ रसोई की तरफ आई और लक्ष्मी के कान मे धीरे से बोली ‘एक बार तुम देख लो बहू ने घर की परंपरा के अनुसार ठीक से तैयारी की है कि नही!’..
दादी माँ को अपनी बहुओं से ज्यादा लक्ष्मी पर भरोसा था..लक्ष्मी, घर की एक बहुत पुरानी नौकरानी की बेटी थी.
बीस वर्षीय लक्ष्मी देखने मे सुन्दर और सुशील थी.. जब से उसकी माँ ज्यादा बीमार रहने लगी थी तब से लक्ष्मी ने इस घर मे उसकी माँ की जगह ले ली थी..लक्ष्मी का दर्जा घर के अन्य नौकर-नौकरानियों की अपेक्षा थोडा ऊँचा था.. वो एक ‘सुपरवाइजर’ की तरह थी..वो घर की हर बात और तौर तरीके जानती थी..उसका सारा दिन इसी घर मे गुजरता..यहीं से उसका और उसकी माँ का गुजारा चलता था..बडे त्यौहारों के दिन उसे नये कपडे मिलते और ‘साहब’ की तरफ से ईनाम भी..इस दीवाली की ‘लक्ष्मी-पूजा’ के बाद भी ‘सफेद’ कपडे पहने ‘काले’ साहब ने लक्ष्मी को आवाज लगा कर कहा-‘ये लो तुम्हारा दीवाली का ईनाम’..लक्ष्मी तेज-तेज चलकर आई और उसने सकुचाते हुए ईनाम कबूल कर लिया…वो जानती है साहब की तरफ से मिले त्योहारों के इन ईनामों की कीमत उसे चुकानी पडती है….कल ही बडी बहू अपने मायके जाने वाली है……
आज लक्ष्मी अनमने मन से अपने घर लौटी..उसने माँ से कहा कि वह अब और इस बँगले पर काम नही करेगी..
मजबूर माँ पहले से ही सब कुछ जानती थी.उसने कहा,”मै भी सोचती हूँ अब तुम्हारी शादी कर दूँ लेकिन देखा है अपनी बिरादरी के लडकों को? जुआँरी या शराबी से शादी करके कैसे मैं तुम्हारा भविष्य खराब कर दूँ? यहाँ से कम से कम तुम्हे खाने-कपडे की तो परेशानी नही होगी.”
लक्ष्मी भी दुविधा मे पड गई..सोचने लगी कम से कम साहब मारता-पीटता तो नही..आखिर सहब की भी ईज्जत का सवाल है……..

Published in: on नवम्बर 9, 2006 at 5:38 अपराह्न  Comments (8)  

सफर…..

पिछले कुछ दिनों से मैं, शब्दों की और पढने-लिखने की दुनिया से दूर रही.कई दिनों बाद अपने ‘चिट्ठा-घर’ मे लौटी हूँ. ऐसा नही है कि कुछ कहने को नही है, बल्कि सच ये है कि कहने को इतना कुछ है कि सूझ ही नही रहा, पहले क्या कहूँ. और फिर मेरी समझ से चिट्ठाकार होने की मायने ही ये हैं कि आप इस बात को लेकर भी बहुत कुछ कह सकते हैं कि कहने को कुछ नही है!!
अपने छोटे से सफर को लेकर जो बिखरे-बिखरे से विचार हैं, वो ही लिख रही हूँ.

“रफ्तारों का नाम सफर है,
धूप से तपती एक डगर है.
थक कर बैठें पेड के नीचे,
सूकून पा लें आँखें मीचें.
अब वो प्यारे पेड कहाँ हैं?
पतरों वाले ‘शेड’ यहाँ हैं!!

पिछ्ले कुछ दिनों के लिये मै मध्यप्रदेश मे थी और फिर कुछ दिनो के लिये मुम्बई मे. म.प्र. की यात्रा तो ‘अवर्णनीय’ होती है. अब भला कोई अपने शब्दों से, खराब सडकों से लगे झटकों का अहसास कैसे करा सकता है??
यात्रा, पर्यटन के उद्देश्य से नही थी बल्कि सामाजिक थी अत: जो मैने देखा वो बस लोग और लोग ही लोग थे!

“अपनो से मुलाकातें थीं,
कुछ यहाँ वहाँ की बातें थीं,
दौड-भाग मे दिन गुजरे,
और थकी-थकी सी रातें थीं!”

म.प्र.मे लोगों की जिन्दगी की रफ्तार बहुत धीमी, इस दोहे की तरह है–

“आज करे सो काल कर, काल करे सो परसों,
इतनी जल्दी क्या करता है,जब जीना है बरसों!!”

लेकिन मुम्बई मे लोगों के सैलाब की बेतहाशा तेज रफ्तार को देखकर लगा कि ये लोग इस पुराने दोहे के अनुसार जीवन जीते हैं–

“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब,
पल मे प्रलय होयेगा, बहुरि करेगा कब!”

मुम्बई मे ‘लोकल ट्रेन’ के प्लेटफार्म पर खडे-खडे ये पन्क्तियाँ लिखी थीं——-

प्लेटफार्म पर छोड दो रूतबा,
ये है ट्रेन का ‘जनरल’ डिब्बा.
खाली जेब हो या हो पैसा,
हर एक है दूसरे जैसा.
तन से तन आपस मे सटे हैं,
तीन की सीट पर पाँच डटे हैं.
तरह तरह की चीजें खाना,
कचरा,छिलके वहीं बिखराना.
कैसा सुख? कहाँ की सुविधा?
सफर कहाँ का? बस एक दुविधा!
इस हालत पर ट्रेन भी रोती,
खुद से तिगुने भार को ढोती.
भारत का आम आदमी पक्का,
उसका सफर है बस एक धक्का!
एक धक्के से अन्दर चढना,
एक धक्के से बाहर आना.
कहाँ की मन्जिल? कहाँ ठिकाना,
उसका काम है चलते जाना!!!

इन अन्तिम पन्क्तियों के साथ, आज के लिये बस इतना ही…

हमारा आना और जाना एक खबर ही तो है,
जिन्दगी क्या है? एक सफर ही तो है………

Published in: on नवम्बर 6, 2006 at 4:25 अपराह्न  Comments (13)