बचपन

वो निर्मल कोमल सुन्दर तन,
वो लापरवाह सा चन्चल मन,
कितना अच्छा था वो बचपन!
कितना अच्छा था वो बचपन!

खाना खेलना और सोना,
थोडा हँसना, थोडा रोना,
लडना, कुछ देर मे फिर मिलना,
कुछ पाकर के फिर से खोना,
वो सब कुछ था कितना पावन!
कितना—-

फिर आशाएँ सपने जागे,
हम पीछे, इच्छाएँ आगे,
हम तृष्णा के पीछे भागे,
तोडे सब बन्धन के धागे,
यूँ दौड रहा था अब यौवन!
कितना—

फिर जाँत-पाँत, ऊँचा-नीचा,
छल-कपट और झूठा-सच्चा,
ये हमने दुनिया से सीखा,
कुछ हारे हम और कुछ जीता,
अब प्यारा है पैसों का धन!
कितना—-

गुम सारे प्यारे मित्र हुए,
पशु-पक्षी मानो चित्र हुए,
मानव मानो कि यंत्र हुए,
रिश्तों के जर्जर तंत्र हुए,
किसको फुर्सत? सब व्यस्त हुए,
सब अपने मे ही मस्त हुए,
बिल्कुल बदला है अब जीवन!
कितना—–

वो निर्मल कोमल सुन्दर तन,
वो लापरवाह सा चन्चल मन,
कितना अच्छा था वो बचपन!
कितना अच्छा था वो बचपन!!

—————-
बच्चोँ के लिए कुछ पँक्तियाँ—

‘बालक’

“माँ की खुशियोँ का पल बालक,
उसके सपनो का कल बालक,
माँ के जीवन का बल बालक,
उसकी मुश्किल का हल बालक.”

“ना सुख जाने ना दुख जाने,
झूठ ना जाने, सच्चा है!
गलती करता, शिक्षा पाता,
पका नही अभी कच्चा है!
बेफिक्र है वो, बेखोफ भी है,
ना कपटी है,ना लुच्चा है!
कुछ नटखट है, कुछ भोला भी,
वो बडा नही अभी बच्चा है!!”
———-
और अन्त मे एक कविता जो मैने अपनी बेटी के लिये लिखी थी—

SONG OF A LITTLE GIRL

I am a little tiny girl,
Bright and fresh like a pearl.
I want to sing a beautiful song,
But sister says the lyric is wrong.
I like to watch the cartoon show,
But papa wants the news in a row.
Sometimes study is just enough,
But to convince mummy is very tough.
With my friend I have friendly fight,
But teacher says to be calm and quiet.
I want to do a swinging dance,
But who will give me a mere chance?
This I should do and that I should not,
Can I do once what I want!
I would like to be very frank,
I just don’t like grade and rank.
I am ready to study hard,
But I hate the report card.
I love to play the whole day,
It may be doll, ball or clay.
To growing old is no more fun,
I want to be always little one!

Published in: on नवम्बर 14, 2006 at 3:17 पूर्वाह्न  Comments (13)  

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13 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. बहुत ही सुन्दर तथा मासुम रचनाएं, एकदम बालक सी.

  2. बहुत ही सुंदर रचना जी – हम बूढे होने कि बजाए वापस अपने बचपन मे चले जाते – काश ऐसा सिस्टम होता

  3. रचना जी,

    लालच दे रही हैं आप! अच्छी अच्छी बातें गिना कर! लेकिन एक महा कष्ट वाली बात तो आपने बताई ही नहीं – मुआ होमवर्क बहुत परेशान करता था!🙂

    रचनायें बच्चों की ही तरह मासूम और प्यारी हैं. बधाई!

  4. बहुत ही अच्छी रचनाएँ ।

  5. फिर से आईना दिखा दिया उस सूरत को जो बिसराई
    सहसा ही छूटी गलियों की यादें फिर ताजा हो आईं
    फिर से बीते दिन हाथ बढ़ा कर कहते हैं उंगली थामो
    पर बीत चुके कल की सीमा,करती है मन को दुखदाई

  6. रचना जी
    सभी रचनाएं मासूमियत भरी है। बधाई।

  7. बहुत ही मासूम और कोमल रचनायें हैं रचना जी के द्वारा:
    बधाई.

  8. आप सभी लोगों की टिप्पणीयाँ पढकर लगा कि हम सभी मे एक ‘बालक’ अब भी है, जो सादगी और सहजता पसंद करता है!! बहुत धन्यवाद आप सभी का टिप्पणी लिये.आशा है आपसे भविष्य मे भी स्नेह मिलता रहेगा.

    @ अनुराग भाई, फिर भी हम आज के बच्चों से ज्यादा सुखी थे!!

    @ राकेश जी, बहुत सुन्दर पन्क्तियाँ लिखीं है आपने.धन्यवाद.

  9. बहुत अच्छा लिखा है आपने। पहली रचना सबसे ज्यादा पसंद आई ।

  10. अच्छा है बचपन का चित्र.

  11. Hi

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  12. रचना जी
    आपका ईमेल id भेजें. sameer.lal AT gmail.com

  13. @ मनीष जी और अनूप जी, बहुत धन्यवाद.

    @ समीर जी, मेल किया है आपको.


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