मेरी पाँच बातें

पिछले दिनों अमित को उनके मित्र ने ‘टेग’ करके उनके कुछ राज बताने के लिये कहा, उन्हें अपने स्कूल की बातें याद आ गई और फिर टेग के नियम के अनुसार उन्होंने कुछ और चिट्ठाकारों को ये काम करने के लिये कहा.हमें भी कहा गया. अब राज तो कुछ हैं नहीं, यूँ ही अपने अन्दर झाँक कर देखा तो कुछ बातें मिल गईं–

१. सबसे पहले तो बात उसी की कर लें, जिसके द्वारा आप मुझे जानते हैं यानि मेरे लेखन की. दरअसल पिछले कुछ सालों मे मेरा लिखना मेरे लिये भी एक खोज ही है! जिन्दगी में कई बातें अजीब से इत्तफाक से हो जाती हैं वैसे ही मेरा लिखना शुरु हुआ. एक बार मेरी छोटी बेटी को स्कूल के किसी समारोह में दुल्हन बनाया था. तैयारी तो सारी कर ली गई और मेरा ये मानना था कि भारतीय दुल्हन चुप ही रहे तो ज्यादा अच्छी लगती है, लेकिन मेरी मित्र की जिद थी कि उससे कुछ बुलवाया जाय. उसने कई सारी फिल्मी पन्क्तियाँ सुझाई लेकिन मुझे इतनी छोटी बच्ची से वो सब बुलवाना ठीक नही लगा. थोडा सा सोचा तो ये पन्क्तियाँ बन गईं-

मै नई सदी की दुल्हन
नहीं रही मैं ऐसी वैसी
नहीं परीक्षा सीता जैसी
अब ना मुझको कोई बन्धन
मै नई–

कम्प्यूटर है मुझको आता
फास्टफूड है मुझको भाता
उडती हूँ मैं पवन पवन
मै नई–

और फिर मैं लिखती ही चली गई..कई कविताएँ लिख लीं.ज्यादातर बिना किसी मेहनत के एक ही बार में लिखी है और लिखने के बाद बहुत ही कम बार ऐसा होता है कि मैं उसमे कुछ फेर बदल करती हूँ..

लेकिन मेरे भाई बहन, जिनके साथ मैं पली बढी और जिस तरह की बचपन से मेरी रुचियाँ रहीं, वो मानने को तैयार ही नही थे कि मै लिख भी सकती हूँ!! बहुत परीक्षाएँ लीं उन्होंने मेरी और तभी जा कर वे माने की ये सब मैंने ही लिखा है और मुझे अपने घर में किसी की कोई पुरानी डायरी नही मिली है!!

२. लिखने के बाद बात पढने की आती है..पढती तो मैं बहुत हूँ लेकिन कहानी या उपन्यास पढने में ज्यादा रुचि नहीं रही…. बहुत ही कम पुस्तकें पढी हैं वे भी ज्यादातर आत्मकथाएँ..बडा सा उपन्यास पढने का बिल्कुल भी धर्य नहीं है.. लेकिन लिखती हूँ तो कई बार यह स्वाभाविक प्रश्न मुझसे पूछा जाता है कि मेरे पसँदीदा साहित्यकार कौन हैं और मेरे लिये ये दुनिया का सबसे कठिन प्रश्न साबित होता है!!

३. जब मै चिट्ठाजगत से परिचित हुई तब मुझसे कहा गया था कि आमतौर पर यहाँ भी ग्रुप्स होते हैं..लेकिन मेरी प्रतिक्रिया थी कि आम जिन्दगी में तो हम तमाम भागों में जाति, स्टेटस, सम्पन्नता आदि के आधार पर बँटे हुए हैं ही कम से कम इस जगह तो ऐसा कुछ न हो! मुझे कभी भी किसी ग्रुप मे शामिल होना पसन्द नही रहा या कहें कि मै हर ग्रुप मे शामिल होना चाहती हूँ…..मेरी बहुत अच्छी मित्रों मे एक की उम्र ७५ वर्ष है और एक की १७ वर्ष!

मै किसी तरह कि ‘ब्लाईंड फेथ’ पर यकीन नही करती, बल्कि मैं आँखें खुली रख कर आस्था रखने पर विश्वास करती हूँ…किसी तरह के निर्णयों पर पहुँच कर अडियल हो जाने के बजाए मै विचारशील रहना पसँद करती हूँ.. क्यों कि कोई भी निर्णय अपने आप में सही या गलत नही होते बल्कि परिस्थितिनुसार होते हैं…

 

४. मुझे दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कोई भी ‘के’…’एक्स’, ‘वाय’,’ज़ेड’! धारावाहिक पसँद नही हैं. उसमें भारतीय औरतें करोडों के बिसनेज़ करने वाली कम्पनीयों की सी.ई.ओ. होने के साथ ही अपहरण, हत्या और न जाने किन किन कामों में माहिर होती हैं! और पुरुष! मानों उन्हें तो इन महिलाओं के झमेलों मे उलझने और बाहर आने के सिवा दूसरा कोई काम ही नही आता है!

मुझे ‘क्विज’ वाले प्रोग्राम पसँद है, टेनिस, क्रिकेट देखना पसँद है. और हाँ अपनी मेरी बेटी के साथ “मैड” और “ओसवाल्ड” देखना भी पसँद है!

मुझे ‘सुडोकू’ और ‘शब्द या वर्ग पहेली’ हल करना बहुत पसँद है! रोज कम से कम एक करती हूँ!

पिछ्ले २० सालों मे मैने शायद ३० हिन्दी फिल्म देखी होंगी! ओह इसका मतलब ये नही कि मै अन्ग्रेजी फिल्म देखती हूँ!! वो तो मुझे समझ ही नही आती!!!

 

५. मै अपनी गलती जल्दी से मान लेती हूँ (अगर मैने की हो तो!!), लेकिन मेरी बेटी ऐसा नही मानती!!

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अब मै इस टैग को थोडा बदल कर आगे बढाना चाहती हूँ. ये मेरे पाँच सवाल हैं–

१. आपके लिये चिट्ठाकारी के क्या मायने हैं?

२. यदि आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है?

३.क्या आप यह मानते हैं कि चिट्ठाकारी करने से व्यक्तित्व में किसी तरह का कोई बदलाव आता है?

४.आपकी अपने चिट्ठे की सबसे पसँदीदा पोस्ट और किसी साथी की लिखी हुई पसँदीदा पोस्ट कौन सी है?

५.आपकी पसँद की कोई दो पुस्तकें जो आप बार बार पढते हैं.

ये प्रश्न इनके लिये हैं–

 

१.समीर जी. २.अनूप जी. ३.मनीष जी. ४.उन्मुक्त जी. ५.जीतू भाई.

 

(*मुझे खुशी होगी यदि आप लोग इसके जवाब देंगे*)

** जानती हूँ, आप सभी वरिष्ठ और सम्मानित चिट्ठाकार हैं, शायद आपके अपने चिट्ठों के लिये कोई मानक भी निर्धारित होंगे..यदि आप अपने चिटठे पर न लिखना चाहें तो कोई बात नही*

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Published in: on फ़रवरी 16, 2007 at 10:03 अपराह्न  Comments (29)  

फर्क

** नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक भारत मे जितने बच्चे हैं उनमे से लगभग ५०% बच्चे कुपोषण का शिकार हैं **

खून तो सबका एक सा है,
फिर इतना फर्क है क्यूँ रहता?
तुम नीदों तक की दवा खाते,
वो छोटे मर्ज से मर जाता.
वो भी मानव, तुम भी मानव,
फिर तुमको क्यूँ न रहम आता?
तुम कम्बल ओढ कर सो जाते,
वो ठंडी मे ठिठुरा करता.
उसका भी तन है तुमसा ही,
फिर मन व्याकुल क्यूँ ना होता?
तुम कमरे मे बंद हो जाते,
वो बारिश मे भीगा करता.
बच्चे तो सबके एक से हैं,
फिर उनको प्यार न क्यूँ मिलता?
तुम अपनो को सुविधा देते,
वो बेचारा तकता रहता.
उसके अधिकार भी तुम से ही,
फिर वो ही क्यों पिछडा रहता?
तुम जरूरत से ज्यादा पाते,
वो हक से भी वंचित रहता.
हैं धरती अम्बर सबके ही,
फिर वो ही क्यूँ डरकर रहता?
तुम उसको ना उठने देते,
वो मूक बना सहता रहता…..
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Published in: on फ़रवरी 12, 2007 at 11:32 अपराह्न  Comments (5)  

सपना

… पिछली कुछ बातें हमारी यादों के रूप मे हमारे साथ साथ रहती हैं..यानि हमारे ‘आज’ मे कुछ सपने भविष्य के और कुछ बीती यादें समाहित रह्ती हैं..पिछली पोस्ट मे मैने आपको भविष्य के सपनों की बातें बताईं थी…..आज मिलवाती हूँ अपने पुराने सपने से…..

एक दिन देखा था एक सपना,
मेरे जैसा, मेरा अपना
हम दोनों थे साथ मे रहते,
कुछ सुनते, कुछ अपनी कहते
दुख ना कुछ थे, बस थीं खुशियाँ,
ऐसी न्यारी थी वो दुनिया!
बचपन बीता, बडी हुई मै,
वो भी मेरे साथ बढा था
मेरा साथ न छोडेगा वो,
इसी जिद पर खूब अडा था
फिर नियती की बारी आई,
वो मेरे सपने पर छाई
उस सपने से साथ था टूटा,
मै आगे, वो पीछे छूटा
कुछ बदला था जीवन मेरा,
नये थे रिश्ते, नया बसेरा
हर बात का अर्थ हो गया,
सपने बुनना व्यर्थ हो गया
बुद्धि आगे पीछे था मन,
यूँ ही भाग रहा था जीवन
जब जीवन से फुर्सत पाई,
फिर वो बीती यादें आईं
बीती बातें सोच रही थी,
उस सपने को खोज रही थी
कुछ न बदला सब वैसा था,
सपना जैसा का तैसा था!
उसे देखकर मन हर्षाया,
जब उसको पहले सा पाया!
मेरी प्यारी अलमारी से,
चुपके-चुपके झाँक रहा था!
वहीं बैठ वो बडे मजे से,
मुझको अपलक ताँक रहा था!!
फिर उसने अपना मुँह खोला,
धीरे से हँस कर यूँ बोला
‘मुझे पता था तुम आओगी,
मुझको भूल नही पाओगी’!
हम दोनो फिर साथ हो गये,
हाथों मे फिर हाथ हो गये!
उस टूटे-फूटे सपने ने
अब तक मेरा साथ दिया है,
जीवन के हर दुख और सुख को
उसने मेरे साथ जिया है!
कई आँधियों तूफानों से,
वो भी मेरे साथ लडा है,
इतनी ठोकर खा कर भी वो
अब तक मेरे साथ खडा है!!!
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Published in: on फ़रवरी 9, 2007 at 4:03 अपराह्न  Comments (11)  

भविष्य समाचार..

जब हमे आज की समस्याएँ बहुत ज्यादा सताने लगे तो हमे दूर के (आज से कुछ २०-२५ साल बाद के!)सपने देखने शुरु करने चाहिये, ये तात्कालिक राहत के लिये कारगर साबित होता है! समस्याओं वाला आज  सपने देखते देखते आराम से गुजर जाता है.समय के साथ धीरे धीरे समस्यायें अपने आप कम हो जाती हैं.कुछ तो इसलिये की उनकी जगहों पर दूसरी ज्यादा गम्भीर किस्म की समस्याएँ आ जाती है और कुछ अन्य तरीकों से..जैसे २०२५ तक किसान ही नही बचेंगे तो उनसे जुडी समस्या कहाँ रहेगी? शायद इतना सारा पानी भी न रहे कि उस पर झगडा हो! और मुझे नही लगता कि बिजली की भी कोई समस्या रहेगी क्यों कि योग स्वामीयों और उनके अनुनायियों की बढती तादाद  (यहाँ तक कि चिट्ठा-जगत भी इससे अछूता नही है, यहाँ भी एक लोकप्रिय महाराज समीरानन्द जी हैं!!) के हिसाब से जल्दी ही लोगों की दिनचर्या सुबह ४ बजे से शुरु होकर रात ९ बजे खतम हो जाया करेगी!
तो मै आपको सपनों वाले भविष्य २०२५ के समाचार सुनाती हूँ—
६ फर. २०२५

मुख्य समाचार———–

१. शिक्षा मन्त्री ने घोषणा की है ‘आई आई एम’ तथा‘आई आई टी’ में पिछडे वर्ग के लिये अब ८०% आरक्षण होगा.

२. ‘आई आई एम’ के दो और ‘आई आई टी’ के दो प्रोफेसर ने अपना इस्तीफा दिया.

३. मन्त्री जी ने मान लिया है कि उस घोटाले के लिये वे ही जिम्मेदार थे. वे आगे अपील करना नही चाहते और सजा भुगतने को तैयार हैं.

४. हमारे प्रधानमन्त्री जी ने अमेरिका से कहा है कि वो दूसरे देशों के मसलों मे दखल देना बन्द कर दे अन्यथा उसे भारत की ओर से दी जाने वाली विभिन्न सहायतायें बन्द कर दी जायेंगी!

५. पाकिस्तानी प्रमुख ने कहा कि पूरा कश्मीर भारत का ही अंग है! और कश्मीर से उसका कोई लेना-देना नही है!

६. चीन में, भारत में बने खिलौनो की माँग़ तेजी से बढ रही है!

७. फ्रांस और रशिया ने भारत मे बनी अत्याधुनिक मिसाइल खरीदने की इच्छा जाहिर की है!

८. ओलम्पिक पदक तालिका में भारत पहले स्थान पर!

९. आस्ट्रेलिया में हुए एक दिवसीय मैच मे भारत ने आस्ट्रेलिया को १० विकेट से हराया!

१०. १. आज राज्य के अन्तिम किसान की मौत के साथ ही महाराष्ट्र देश का पहला ‘किसान रहित’ राज्य घोषित हुआ..राज्य में किसानों की आत्महत्या का सिलसिला सन २००६ से चला आ रहा था.

Published in: on फ़रवरी 6, 2007 at 11:45 अपराह्न  Comments (14)  

तुम जहाँ कहीं भी हो..

…..कई बार व्यवस्था के प्रति जब हम सवाल उठाते हैं तो जाहिर है एक सवाल खुद अपने लिये भी होता है कि हम क्या कर रहे हैं! अपने आप को देने के लिये तो मेरे पास जवाब होता है लेकिन किसी और को बताने का औचित्य नही लगता क्यों कि जो मै और मेरा परिवार करते हैं वो बिल्कुल अनियोजित तरीके से( यानि जब जैसी मर्जी हो तब जितना हो सके वैसा कर दिया),बिना किसी योजना के तहत होता है मतलब जरूरत के महा सागर मे एक बूँद (या आधी ही समझ लें) भर! मेरे पिताजी कहा करते थे कि यदि  कुछ अच्छा काम कर पाओ तो उसका हिसाब मत रखो और जितनी जल्दी हो सके भूल जाओ.वे हमेशा एसा किया भी करते थे. उनके असामयिक निधन के बाद कुछ  अनजाने लोग हमारे घर आये तभी हमे इसका पता चला.
हममे से कई लोग शायद अपने अपने स्तर पर कुछ न कुछ करते हैं कुछ दिनो पहले आशीष और अनुराग ने अपने चिट्ठों पर इसका जिक्र किया भी है…
….सीमा मेरी एक छोटी मित्र थी. वो मेरे घर मे काम करने वाली कमला बाई की १२/१३ वर्षीय बेटी थी.उसके पिताजी नही थे और घर मे उससे और छोटे दो भाई थे.हमारे नये घर मे पहले दिन जब वो मुझसे पूछने आई कि मुझे काम वाली की जरूरत है क्या? तभी मुझे उसने आकर्षित किया और मैने उसे हाँ कहा.हालाँकि मेरी पडोसिनो ने मुझे उसे नही रखने की सलाह दी थी, कुछ तो जाति का चक्कर था और कुछ उसकी माँ के बीमार होने से होने वाली कभी कभी की छुट्टीयाँ थीं. लेकिन मैने उसे ही रखा क्यूँ कि जाति का मसला मेरे घर मे कोई मायने नही रखता था और मुझे लगा कि उन्हे बहुत जरूरत है पैसों की. हर दिन स्कूल जाने से पहले वो अपनी माँ के साथ काम करती..उसे पढाई करने मे रूचि थी और काम करने से भी कोई शिकायत नही थी..जीवटता से भरपूर मेहनती लडकी थी वो
…दो तीन दिनों की छुट्टियों के बाद एक दिन जब वो अकेली आई, तो उसने बताया कि उसके दोनो छोटे भाई कहीं गुम हो गये हैं और वो और उसकी माँ उन्हे ढूँढने मे लगे थे इसीलिये काम पर नही आ पाये थे..माँ रोती रहती है और काम पर कुछ और दिन नही आयेगी…दूसरे लोगों ने अब उनसे काम नही करवाने का तय किया है..और क्या मै अब भी उससे काम करवाना चाह्ती हूँ या नही…मुझे भी लगा कि मना कर दूँ लेकिन फिर सोचा कि उसे कुछ तो करना ही होगा..शायद पढाई छोडनी पडे और पता नही कैसी मुश्किलों मे काम करेगी…
वो मेरे घर आती रही…कुछ दिनों बाद उसका एक भाई वापिस आ गया..पता चला कि उन्ही के किसी रिश्तेदार के साथ वो सब ट्रेन से मुम्बई भाग गये थे वहीं स्टेशन पर सब अलग अलग हो गये,पोलिस की मदद से ये तो वपिस आ गया लेकिन छोटा भाई वहीं गुम हो गया.सीमा को सबसे ज्यादा जो बात दुखी करती थी वो ये कि उसके भाई को मुम्बई मे भिखारी बना दिया जायेगा!!
…. मैने उसे हर सम्भव मदद की..अन्ग्रेजी और गणित मे उसे दिक्कत रह्ती तो मै उसे पढा देती…उसकी परिक्षाओं के समय मेरी तरफ से उसे छुट्टियाँ मिल जाती और उसके पास हो जाने पर उपहार भी….वो कभी फेल नही हुई थी और उसकी इच्छा थी कि वो बडी होकर शिक्षिका बने….मै उसकी ज्यादा मदद नही कर पाई क्यों कि दो वर्ष बाद हमने वो घर और फिर शहर भी छोड दिया था…पता नही वो फिर वो अपनी पढाई जारी रख सकी या नही..मुझे अफसोस है कि मै उसे अब मदद नही कर सकती…पता नही है वो कहाँ और कैसी है..सिर्फ उसके लिये प्रार्थना कर सकती हूँ….
…”सीमा तुम जहाँ कहीं भी हो मुझे याद आती हो!जितनी हिम्मत तुममे तब थी उतनी ही बनाये रखना….एक दिन तुम जरूर शिक्षिका बन जाओगी!!”

Published in: on फ़रवरी 5, 2007 at 5:12 अपराह्न  Comments (9)