अलविदा नारद जी..

नारद जी,

 

 

आपसे मेरी पहचान इसी वर्ष अगस्त माह मे हुई जब मैने अपना हिन्दी चिट्ठा लिखना शुरु किया था.फिर रोज ही मुलाकातें होती रहीं..

 

……आपके माध्यम से ही कई सारे चिट्ठो से परिचय हुआ..बहुत कुछ पढने, सीखने, समझने को मिलाप्रत्यक्षा जी, मुन्ने की माँ, रत्ना जी, बेजी, घुघुति बासुती जी, आदि कईयों से चिट्ठों पर संवाद हुआसाथ ही इटली, अमेरिका, कनाडा, सिंगापुर, दुबई और भारत के कई कोनो मे रहने वाले भारतीयों से मिलकर जाना कि हम सब कितने अलग फिर भी कितने एक से हैं

 

….दिमाग मे चल रहे विचारों की उहापोह से उपजा क्लिष्ट भाषा का शुष्क लेखन नही बल्कि दिल का गीलापन लिये हुए सरल भाषा का सहज लेखन पढने को मिलासब अपने लिये खुद लिख रहे थे, कोई किसी के लिये किराये से नही लिख रहा था.. लगा कि लोग पहचाने से हैंतब शान्ति थी जब यहाँ कुछ भी उल्लेखनीय नही लिखा जा रहा था!!

 

…… एक समय था जब हमने आपसे जुडे रहने की खातिर लेख लिखना शुरु किया….लेकिन अब बात बदल रही है….अच्छे खासे मौलिक चिट्ठाकार चिन्तक परेशान हैं….हर दिन नये लोग नये विचार जुड रहे हैंबोले तो सर्किट भी चिट्ठा बना रहे हैं ऐसा सुना है….

 

…..ज्यादातर इस तरह का लिखा जा रहा है कि एक चिट्ठा समझने के लिये कम से कम चार अन्य चिट्ठे पढने जरूरी हैं..हम आपके पास आते हैं तो परिचित नामों को ढूँढते ही रह जाते हैं….आप बिल्कुल हिन्दुस्तानी मीडिया की तरह हुए जा रहे हैं जिससे ऊब कर ही हम यहाँ आए थे३० पेज के अखबार और चौबीसों घन्टे की खबर से परेशान होकरमानो खबरों के बाहर जिन्दगी है ही नही….

 

…..सब नये लेखकों (या शायद पुराने लेखक लेकिन नये चिट्ठाकार!)से भी कुछ कुछ  सीखने को मिलेगा ही..लेकिन फिलहाल जितना सीखा उतना ही काफी है..माना कि कम ज्ञान खतरनाक होता है लेकिन अत्यधिक ज्ञान शायद उससे भी ज्यादा खतरनाक!!

 

हम आपका बोझ कम करना चाह्ते हैं, और अब से अपनेफेवरिटकी लिस्ट से ही नये पोस्ट देख लिया करेंगे.

अपनी सेहत का खयाल रखियेगा, आजकल ओवर टाइम काम जो कर रहे हैं !

——

ये पोस्ट मैने इसलिये लिख दी क्यूँ कि रवि जी ने बताया था कि जो लोग जैसा लिखते हैं, उससे जरा अलग लिखें!!

Published in: on अप्रैल 12, 2007 at 11:24 अपराह्न  Comments (30)  

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30 टिप्पणियाँटिप्पणी करे

  1. मैनें आपकी”दर्द भरी पाती” पढी……………………बहुत दुख हुआ………………
    ये देखकर नही कि ‘चिट्ठाजगत” मे अब बकवास ज्यदा हो रही है,बल्कि ये देखकर की”आप”
    अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाह रहे हैं।
    मैं चिट्ठा जगत में बिल्कुल नय़ा हूं और ज्यादा नही जानता लेकिन इतना जरूर कहुंगा की अगर यहां कुछ गलत हो रहा है तो उसे ठीक करने की जिम्मेदारी सब की बराबर है………

    आशा करता हूं कि आप अभी “हम”जैसों को बताने बने रहेंगे…….

  2. 🙂

  3. बहिन जी नमस्कार।
    ‘जाइये आप कहाँ जायेंगे….”

  4. रचना जी, आज बहुत दिन बाद यहाँ आना हुआ,वह भी फुरसत से नहीं । आप ऐसे कैसे अलविदा कह सकती हैं ? नारद अब हम सबका है, इसे आप छोड़कर जा नहीं सकती । हम आपको जाने नहीं देंगे । आशा है आप साथ नहीं छोड़ेगीं ।
    घुघूती बासूती

  5. बड़े बेआबरु हो कर, तेरे कुचे से हम निकले……

    –कहाँ चले?? अरे, ऐसा न कहें. इतना भी बुरा नहीं हुआ है अभी!! 🙂

  6. ऐसा गजब मत ढाना रचनाजी मत जाना छोड के रे
    नारद के थ्रू ही आना और टिप्पणियाना रचनाजी रे

    हमने इतनी खता भी नही की कि आप यूँ आंचल झटक छोड कर चली जायें🙂

  7. रचनाजी
    क्या विदित तुमको अँधेरा ही नहीं दोषी तिमिर का
    दीप की लौ भी ,उसे जो रोशनी दे न सकी है
    हर लहर जिसने डुबोयी नाव, है सहभागिनी उस
    एक ही पतवार की ,धारा नहीं जो खे सकी है
    कूचियों के साथ शामिल व्यूह में हैं रंग सारे
    जो क्षितिज के कैनवस को चित्र कोई दे न पाये
    पुष्प की अक्षम्यता का ज़िक्र करना है जरूरी
    प्रिय अधर के पाटलों पर जो न आकर मुस्कुराये

  8. आशा है कि आप हिन्दी चिट्ठा जगत से विदा नहीं ने रहीं हैं जैसा कि आपने कुछ दिन पहले संकेत दिया था।
    अधिकार तो नहीं है पर फिर भी, मैं केवल यही कहना चाहूंगा कि यदि हिन्दी चिट्ठा जगत से विदा ले रहीं हैं और अंग्रेजी चिट्ठा जगत में जा रहीं हैं तो हम दोनो (मुझे और मेरी पत्नी – मुन्ने की मां) को दुख होगा। हिन्दी में भी लिखती रहियेगा। आपकी कई चिट्ठियों ने मुझे कुछ लिखने की प्रेणना दी।
    ऐसे आपका अंग्रेजी का चिट्ठा भी बहुत अच्छा है।

  9. बहन जी पलायन क्यों?

    किसी ने लिखा था, जिन्हे जेलो में होना चाहिए था, वे राजनीति में है. क्योंकि जिन्हे राजनीति में होना चाहिए वे पलायन कर गए है.

    नारद को कौलाहल के भरोसे न छोड़ कर, स्वस्थ लेखो से भरना है. तो चढ़ा प्रतंचा वार कर. एक मजेदार लेख हो जाय…..

  10. यदि आप केवल नारद की जगह अपने फेवरेट की सूची से चिट्ठों तक पहुँचना चाहती हैं तो ये तो नहीं कहा जा सकता कि आप छोड़कर जा रही हैं- ये सुखद तो नहीं लेकिन इतना बुरा भी नहीं। विस्‍तार भर है।
    लेकिन कभी कभी आती रहिए। वैसे हम भी अक्‍सर अपने फीडरीडर से ही चिट्ठों तक पहुँचते हैं लेकिन नए चिट्ठे देखने के लिए नारद ही बेहतर है

  11. दर्द कहने से कम होता है ।

  12. मैंने जब नियमित चिट्ठालेखन नहीं शुरु किया था तब परिचर्चा पर एक बहस के दौरान आप के विचारों से परिचित हुआ, अच्छा लगा ।अगस्त २००६ से मैंने भी चिट्ठेकारी शुरु की।
    हाल की बाढ़ से प्रभावित हम भी हुए और इस पर भी लिखा। आप से अपील है कि चिट्ठे पर लिखना न छोड़ें ।

  13. अलग हट के अच्छा लिखा है! पता नहीं लोग इसे आपके जाने से काहे जोड़ रहे हैं?
    इसका खंडन जारी करें!

  14. हां ! परिदृष्य बदला है . पर नारद छोड़कर जाना …. यह तो कोई बात नहीं हुई .

  15. अनूपजी की टिप्पणी पढ़ कर आपके चिट्ठे को दोबारा पढ़ा, तो आपके चिट्ठे का गूढ़ार्थ जो मैं समझा वो यह कि आप अपनी फेवरिट सूची से चिट्ठे पढ़ेंगी, इसमें आपके द्वारा आपका लेखन बंद करने की कोई बात नज़र नहीं आती। आपका लेखन जारी रहेगा परंतु आप नारद पर आकर चिट्ठे नही देखेंगी।
    वैसे आपने रविजी के बताए अनुसार ‘जरा’ नहीं ‘बहुत’ हट कर लिखा है।

  16. और ये हिट हो गया है🙂

  17. माना कि भीड़ देखकर बहुतों को एक अजीब सी बैचेनी होती है लेकिन इसका यह उपाय तो नहीं कि भीड़ देखकर पलायन ही कर दिया जाए

  18. आपकी भावनाएँ मैं समझ सकता हूँ. परंतु ये सबकुछ ट्रांजिएंट है. लोगबाग जल्दी ही उकता जाएंगे और नारद का रूप भी – यकीन मानिए, भविष्य में सुधरेगा – उसे सुधरना ही होगा.

    तब तक के लिए बहुत से विकल्प हैं – जैसे याहू! पाइप्स बीटा – जहाँ आप नारद को फ़िल्टर कर सकते हैं – वो वही चिट्ठे दिखाएगा, जिसे आप पढ़ना चाहें – खुदाओं और भगवानों को वह फ़िल्टर कर स्पैम बनाकर अलग कर देगा.

  19. …..ज्यादातर इस तरह का लिखा जा रहा है कि एक चिट्ठा समझने के लिये कम से कम चार अन्य चिट्ठे पढने जरूरी हैं..हम आपके पास आते हैं तो परिचित नामों को ढूँढते ही रह जाते हैं….आप बिल्कुल हिन्दुस्तानी मीडिया की तरह हुए जा रहे हैं जिससे ऊब कर ही हम यहाँ आए थे…३० पेज के अखबार और चौबीसों घन्टे की खबर से परेशान होकर…मानो खबरों के बाहर जिन्दगी है ही नही….

    …..सब नये लेखकों (या शायद पुराने लेखक लेकिन नये चिट्ठाकार!)से भी कुछ न कुछ सीखने को मिलेगा ही..लेकिन फिलहाल जितना सीखा उतना ही काफी है..माना कि कम ज्ञान खतरनाक होता है लेकिन अत्यधिक ज्ञान शायद उससे भी ज्यादा खतरनाक!!

    तो आप नारद से नाराज हैं, हिन्दी चिट्ठा जगत से नहीं। समय के साथ-साथ नारद पर अलग-अलग सोच-समझ रखने वाले चिट्ठाकारों की संख्या बढ़ना तो स्वाभाविक है। जैसा कि आपको भी मालूम है कि नारद पर चिट्ठों के लिए पंजीकरण के लिए एक नियमावली है और जब कोई चिट्ठाकार हद को पार करता तो उसके चिट्ठे को हटाने की कार्रवाई के लिए व्यवस्था है।

    फीडरीडर या फेवरिट या बुकमार्क के जरिए अपने पसंदीदा चिट्ठों को पढ़ने की आदत तो हममें से कइयों को है। चिट्ठा चर्चा से भी ताजातरीन अच्छी प्रविष्टियों के बारे में सूचना मिल ही जाती है। लेकिन नए चिट्ठों की प्रविष्टियों को देखने के लिए नारद पर जाना पड़ता है। वैसे हिन्दी चिट्ठाकार ग्रुपमेल से और परिचर्चा पर भी नए चिट्ठों के बारे में सूचना मिलती रहती है। आने वाले समय में ऐसे बहुत-से नए चिट्ठाकार हिन्दी चिट्ठा जगत से जुड़ेंगे जो गुणवत्ता और विश्वसनीयता के मामले में पुराने चिट्ठाकारों से कमतर नहीं होंगे। जैसे-जैसे कंप्यूटर, इंटरनेट और यूनिकोड के बारे में जागरूकता बढ़ेगी, वैसे-वैसे चिट्ठाकारों की संख्या बढ़ती जाएगी। हां, उनमें से कई कूड़ा-कचरा भी अपने साथ लाएंगे। हमें कचरा और पठनीय के बीच फर्क़ करना आना चाहिए।

    ये छोटे-बड़े विवाद तो होते ही रहेंगे, कुछ लोग संयम भी खोएंगे और शालीनता भी। इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए। हमें, जहां तक हो सके, दूसरों द्वारा लगाई गई आग में घी डालने से गुरेज करना चाहिए और हो सके तो पानी डालने का प्रयास जरूर करना चाहिए।

    वैसे, मुझे विश्वास है कि आपका नाता हमसे पहले की तरह बना रहेगा।

  20. ऐसा मजाक ना किया करें रचनाजी आप, कह दें कि यह एक मजाक है।🙂

  21. मेरे विचार से नारद (जो कि एक सराहनीय फीड एग्रीगेटर) है, उसे छोड़ना कोई बुरी बात नहीं। यह तो नारद का सम्मान है कि उसने इतना प्रेरित किया लोगों को कि कई चिट्ठाकार उससे नये / पुराने चिट्ठों का संकलन देखकर प्रेरित होते रहे और पिछले कुछ महीनों में चिट्ठाकारों (और आलेखों) में अपेक्षित अप्रत्याशित वृद्धि हुई।
    अब जब चिट्ठे और चिट्ठाकार बढ़ेंगे तो लोग अपनी व्यक्तिगत सूची बनायेंगे ही! तो यह तो नारद के लिये और चिट्ठाकारी के लिये भी गौरव की बात ही है। अंग्रेज़ी में कोई एक नारद है क्या? नहीँ। तो यह तो विस्तार की परिणति है ही। वैसे मैं भी कई दिनों तक, और कभी कभी आज भी अपना व्यक्तिगत फीड एग्रीगेटर प्रयोग करता हूँ, उसमें हिंन्दी चिट्ठे भी शामिल हैं, अंग्रेज़ी, तकनीकी व अन्य रुचियों के भी, और इसके लिये मैं गूगल की सेवाओं का प्रयोग करता हूँ।

    इस के बावजूद भी, नारद का अपना अलग ही महत्व बना रहेगा, और है भी – ऐतिहासिक कारणों से भी और अपने उत्तरदायित्व का सम्यक निर्वहन करने के लिये भी।

    तो मित्रों, नारद से आंशिक रूप से जाने को मुक्त विचारधारा और विस्तार की ही परिणति मानें। और एक रहस्य यह भी – जब यह प्रचलित हो जायेगा कि लोग अपने फीड एग्रीगेटर का प्रयोग अधिक करते हैं तो वे चिट्ठे जो नारद पर एक मशीनी रूप में अनवरत प्रवाह के रूप में और मात्र आपसी वार्ता के रूप में प्रकाशित होते रहते हैं, उनकी संख्या भी मर्यादित हो जायेगी। अक्सर हम अपने चिट्ठों को आपसी वार्ता का माध्यम बनाने लग जाते है – जिसके लिये अन्य तंत्र चिट्ठे से अधिक उपयुक्त होते हैं।

  22. भई हम क्या सुन रहे है? रचना जी, जरा विस्तार से समझाओ।

    हाँ एक बात तो हम भी मानते है नारद पर चिट्ठों की भरमार हो गयी है, लेकिन विविधता नही बढी है, वो तब तक बढेगी भी नही, जब तक हम बेवजह की बहसों मे उलझे रहेंगे। अगर किसी जगह नकारात्मक बह रही है तो वहाँ सकारात्मक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। होना ये चाहिए था कि आप कहती कि मै दोगनी गति से अपने चिट्ठों को लिखूंगी। आप देखिएगा अच्छा लिखने वाले को पाठकों की कभी कमी नही होगी। आप कविता लिखें अथवा लेख, हम तो पढने आएंगे ही। ये पक्का है।

  23. @ चन्दन जी, आप नये हैं तो स्वागत है आपका…तमाम जिम्मेदार हैं लोग हैं यहाँ मदद के लिए..आप मेरी पोस्ट देखकर कोई धारणा न बनायें…ज्यादातर सब कुछ बहुत अच्छा ही है..मैने सिर्फ अपनी दुविधा लिखी थी. टिप्पणी के लिये धन्यवाद!

    @ मिश्र जी, दो शब्द भी लिख देते!! चलो आप मुस्कुराए तो सही!

    @ हिमांशु भाई!!! कहाँ गायब थे आप! बहुत खुशी हुई आपको देखकर! आपका चिट्ठा नारद पर नही है क्या?

    @ घुघुति जी, आप मुझे रचना ही कहें. आपके स्नेह के लिये बहुत धन्यवाद..आपके साथ हूँ ही, उसके लिये अब किसी माध्यम की जरुरत नही है..

    @ समीर जी और तरुण जी, हाँ जी इतना बुरा नही हुआ है!! आते रहेंगे जी! टिप्पणी भी करते रहेंगे जी!! धन्यवाद!

    @ राकेश जी, बहुत बहुत धन्यवाद इतनी सुन्दर पन्क्तियों के लिये!! ऐसे ही मार्गदर्शन करते रहें..

    @ उन्मुक्त जी, बहुत धन्यवाद आप दोनो के स्नेह के लिये!! अधिकार क्यूँ नही? यहाँ सबसे अच्छी बात मेरे लिये यही रही कि मै कई लोगों कहने- सुनने के अधिकार दे और ले पाई हूँ!! विदा होने की बात से सिर्फ नारद से ही थी लिखने पढने से नही…और विचारों से तो जुड गये है हीं..

    @ सन्जय भाई, जरूर लिखूँगी अच्छा सा!

    @ मसिजीवी जी,
    //यदि आप केवल नारद की जगह अपने फेवरेट की सूची से चिट्ठों तक पहुँचना चाहती हैं तो ये तो नहीं कहा जा सकता कि आप छोड़कर जा रही हैं- ये सुखद तो नहीं लेकिन इतना बुरा भी नहीं। विस्‍तार भर है।//

    ठीक कह रहे हैं आप..ये बस एक दुविधा से उपजी पोस्ट थी..
    //लेकिन कभी कभी आती रहिए। //
    कभी कभी ही क्यूँ? हमेशा ही आते रहेंगे!!

    @ विवेक जी, टिप्पणी के लिये शुक्रिया.

  24. @ अफलातून जी, आपका चिट्ठा मै पढती हूं! मैने भी ये पोस्ट सिर्फ़ परिस्थितीजन्य दुविधा के चलते लिखी..लिखना फ़िलहाल तो बन्द नही कर रही, पढना तो बिल्कुल ही नही!! आपके माध्यम से कई बाते‍ जानने को मिली‍..धन्यवाद!

    @ अनूप जी, धन्यवाद! खण्डन कर दिया है!

    @ प्रियंकर जी, मैने ये पोस्ट सिर्फ़ परिस्थितीजन्य दुविधा के चलते लिखी. आपका कविता संग्रह पढ्ती रहूँगी! टिप्पणी के लिये धन्यवाद!

    @ अतुल जी, आप ठीक समझे! टिप्पणी के लिये धन्यवाद!

    @ संजीत जी, //माना कि भीड़ देखकर बहुतों को एक अजीब सी बैचेनी होती है//
    भीड़ देखकर बैचेनी?? नही जी! बडे से संयुक्त परिवार मे ही पली बढी हूँ और अब भी संयुक्त परिवार( हालाँकि ये छोटा सा है!) मे ही रहती हूँ! इसीलिये “मै” की जगह “हम” सी सीखा है!.. पलायन नही कर रही..

    @ रवि जी, धन्यवाद जानकारी के लिये! आशा है आपसे मार्गदर्शन मिलता रहेगा!

    @ सृजन जी,
    // हमें कचरा और पठनीय के बीच फर्क़ करना आना चाहिए।
    ये छोटे-बड़े विवाद तो होते ही रहेंगे, कुछ लोग संयम भी खोएंगे और शालीनता भी। इसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए। हमें, जहां तक हो सके, दूसरों द्वारा लगाई गई आग में घी डालने से गुरेज करना चाहिए और हो सके तो पानी डालने का प्रयास जरूर करना चाहिए।
    वैसे, मुझे विश्वास है कि आपका नाता हमसे पहले की तरह बना रहेगा।//

    आप की बात मानते हुए, नाता बनाये रखूँगी..आप भी स्नेह बनाएँ रखेंगे एसी आशा है!

    @ सागर जी, ये मजाक बिल्कुल नही था…सिर्फ दुविधा थी..

    @ राजीव जी, आपके विस्तृत विचार जानने को मिले बहुत शुक्रिया!!
    //इस के बावजूद भी, नारद का अपना अलग ही महत्व बना रहेगा, और है भी – ऐतिहासिक कारणों से भी और अपने उत्तरदायित्व का सम्यक निर्वहन करने के लिये भी। //

    जी हाँ!! और नारद से ही मुझे कई बहुत अच्छे चिट्ठा मित्र मिले.. और अभी तो मुझे बहुत कुछ कहना है! इतने लोग सुनने चाहते हैं, ये जानकर खुश हूँ!

    @ जीतू भाई, शायद मुझे इस तरह नही कहना चाहिये था…आप लोगों को छोड कर कहीं नहीं जा रही..अच्छा लिखने की कोशिश करूँगी..टिप्पणी के लिये बहुत बहुत धन्यवाद!!

  25. पता नहीं आप लोग हर बात के लिए नारद को ही क्यों दोषी ठहराते हैं। अरे भाई नारद एक मशीनी ब्लॉग एग्रीगेटर है वह अच्छी बुरी पोस्टें थोड़े ही छांट सकता है। और वैसे भी हर बंदा अच्छा नहीं लिख सकता अगर नारद सिर्फ प्रसिद्ध अच्छे लिखने वालों के ही चिट्ठे दिखाए तो बाकी लोग कहाँ जाएंगे। अगर नारद न हो तो कई नए उभरते हुए श्रेष्ठ लिखने वालों का पता ही न चले। बल्कि मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि आज की तारीख में कई सुपरहिट चिट्ठे जैसे फुरसतिया, उड़नतश्तरी आदि भी नारद पर न हों तो उनकी भी मार्केट एकदम मंदी पढ़ जाएगी।

    रही बात पसंदीदा चिट्ठे पढ़ने की तो उसके लिए ब्लॉगलाइन्स आदि फीड रीडर का उपयोग करिए, बस।

  26. श्रीश भाई, नाराज क्यूँ होते हो भाई…सब कुछ बुरा थोडे ही लिखा है मैने, अच्छा भी तो लिखा है! सभी को एक मंच की जरुरत होती है और कई बेहतर लिखने वाले लोग जुड रहे हैं… ये तो हमारे ‘नारद’ मित्र को अपनी दुविधा कही है, जिसे हम बहुत चाहते है!..

  27. आप अगली प्रविष्टि प्रस्तुत कीजिये, उस पर बढिया से टिप्पणी करेंगे।🙂

  28. Main yaha bahut naya hun aur bahut alag bhi kyonki main roman mein likhta hu. Maine jindgi ko jo samjha hai wo agar kewal ek line mein kahu to wo hai ki Aap ke dil mein jo aata hai, aap wo kare. Ha! us karne se kisi ka bura na ho. Aur jab us mein lautana chahte hain jaroor laute. Sankoch na kare. Yaha kisi ke liye koi bandhan nahi hai.

    Dhyanwad🙂

  29. नारद तो हिन्दी ब्लॉगजगत की पहचान है । चिट्ठाकारों को एक मंच पर लाने पर इसका बहुत योगदान है। पर आपने जो समस्याएँ बताईं हैं वे बेहद प्रासंगिक हैं,उससे हम सभी जूझ रहे हैं और अपने पसंद की पोस्टों तक जाने के लिए अलग अलग तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं ।
    नारद में अभी भी काफी तकनीकी सुधार की गुंजाइश है खासकर सबकी फीड को शीर्षक के साथ दिखाने की । विषयों और वाद विवाद पर तो नारद कुछ नहीं कर सकता । हाँ एक दिन में बहुत सारी पोस्ट करने वालों पर कुछ नियम अवश्य लागू कर सकता है ।
    आशा है नारद की टीम इस संबंध में यथासंभव प्रयास कर रही होगी ।

  30. @ मिश्रा जी, आपकी बढिया टिप्पणी का इन्तजार करेंगे!🙂

    @ राजेश जी, टिप्पणी का बहुत शुक्रिया..

    @ मनीष जी, अपने विचार रखने के लिये धन्यवाद..


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